रविवार, 24 सितंबर 2017

अच्छे दिन आएंगे!

सरकार 'अच्छे दिन' लाने को 'कृत-संकल्प' है। हर काम में जी-जान से जुटी है। स्वयं प्रधानमंत्री जी भी अपने प्रत्येक संबोधन में 'अच्छे दिन' लाने की अपनी 'भीष्म-प्रतिज्ञा' को दोहराए बिना नहीं रहते। जनता भी यह सोचकर संतोष कर ही लेती है कि आज नहीं तो कल उसके 'अच्छे दिन' आ ही जाएंगे। जबकि यह हकीकत जनता ब-खूबी जानती है कि उसके 'अच्छे दिन' चुनाव के आसपास ही आते हैं। फिर भी, आस का दीप जलाए रखने में क्या जाता है!

जनता तो फिर भी खुद को दिलासा दे लेती है किंतु विपक्ष और बुद्धिजीवि वर्ग सरकार के 'अच्छे दिन' को महज 'जुमले' से अधिक नहीं देखता। दोनों ही लगातार सरकार को 'अच्छे दिन' के नाम पर गरियाने में लगे रहते हैं।

विपक्ष और बुद्धिजीवि आजकल पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने और बुलेट ट्रैन के अस्तित्व में आने के विचार से ही 'हलकान' हुए पड़े हैं। दोनों को देश और आम जनता के लिए 'खतरनाक' बता रहे हैं। पेट्रोल के रेट में बृद्धि को वे सरकार की सर्वोत्तम विफलता बता रहे हैं। और, बुलेट ट्रेन पर यह कहकर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि इतनी महंगी यात्रा भला आम आदमी कैसे कर पाएगा? जनता को बुलेट ट्रेन से कहीं अधिक जरूरी रोटी, कपड़ा और मकान है।

खामख्वाह ही विपक्ष तेल और बुलेट ट्रैन को तूल देने पर अड़ा है। तेल और बुलेट ट्रेन दोनों ही देश के स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं! वैसे भी, तेल की कीमत इतिहास में पहली बार तो बढ़ी नहीं है। पिछली सरकार में हम बहुत अच्छे से तेल की कीमतों के साथ-साथ महंगाई को बढ़ता हुआ झेल चुके हैं।

फिर भी जनता ने 'चू' न कि। हंसती रही। तेल भरवाती रही। कारें खरीदती रही। महंगा प्याज भी खाती रही। महंगा सिलेंडर भी खरीदती रही। सारी कुढ़न और जलन विपक्ष और बुद्धिजीवि वर्ग को ही है। जनता तो सारे गम बहुत जल्द भूलाकर अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाती है।

कोई माने चाहे न माने पर अपने देश में खर्च करने वाले, भगवान की दया से, बहुत हैं। पेट्रोल चाहे 80 रुपये बिके या बुलेट ट्रेन का किराया 3000 से ऊपर हो लेकिन कमी कहीं कोई नहीं आने की। वो जो अपने देश को 'सोने की चिड़िया' होने का तमगा मिला हुआ है न, ऐसे ही नहीं मिल गया था। ख़र्च करने और बचाने के मामले में हम भारतीयों का जबाव नहीं।

और यह कतई न भूलें कि 'अच्छे दिन' लाने के लिए कुछ तो 'बलिदान' जनता, विपक्ष और बुद्धिजीवियों को देना ही होगा। है कि नहीं...!

क्या जाता है तेल की कीमत के बढ़ने या बुलेट ट्रेन का किराया अधिक होने में जनता अपने हिसाब से सब एडजस्ट कर लेगी। महंगाई वगैरह से आम आदमी की सेहत पर अब कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ विपक्ष और बुद्धिजीवियों पर पड़ता है। वो भी अपनी-अपनी विरोध की दुकानें चलाने के लिए।

निश्चिंत रहें। सरकार 'अच्छे दिन' लाकर ही रहेगी। बाकी दुनिया चाहे कुछ भी कहती रहे।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

वंशवाद की जय

पहले मैं वंशवाद और वंशवादियों को ‘हेय दृष्टि’ से देखा करता था। जाने कितने ही लेख मैंने ‘वंशवाद के विरोध’ में यहां-वहां लिख डाले। कितने ही दोस्तों से अपनी दोस्ती सिर्फ इस बात पर एक झटके में ‘खत्म’ कर दी कि वे बहुत बड़े वाले वंशवादी थे। हमेशा वंशवाद के समर्थन में खड़े रहते थे। मेरे वंशवादी न होने पर अक्सर मुझ पर ‘कटाक्ष’ करते थे।

लेकिन वंशवाद पर जब से मैंने ‘उन्हें’ सुना है तब से मेरा नजरिया वंशवाद पर पूरी तरह से बदल गया है! जैसाकि ‘उन्होंने’ कहा था कि मेरे वंशवाद पर सवाल न उठाइए। वंशवाद की परंपरा हमारे यहां सदियों से रही है। इस बहाने कुछ ऊंचे वशवादियों के नाम भी उन्होंने गिनवा दिए।

मैंने काफी गहराई में जाकर सोचा और महसूस किया कि उन्होंने कुछ ‘गलत’ नहीं कहा। हम ‘वंशवाद-प्रधान’ मुल्क ही हैं। राजनीति से लेकर साहित्य, फिल्मों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों तक में वंशवाद गहरी जड़ें जमाए है। वंशवाद को दो-चार तगड़े लेखों या तीखे भाषणों के सहारे कतई नहीं ‘उखाड़ा’ जा सकता।

कहना न होगा, बहुत से सामाजिक एवं राजनीति मसले वंशवाद के जोर से ही ‘स्लॉव’ हो जाते हैं हमारे यहां।

हालांकि कहने वाले वंशवाद को समाज पर ‘काला धब्बा’ बताते हैं। किस्म-किस्म की ‘बुराईयां’ गिनाते हैं। अच्छाईयां न के बराबर बताते हैं। किंतु ‘सूक्ष्म दृष्टि’ से अगर देखा जाए तो वंशवाद से उत्तम कोई विकल्प है ही नहीं। वंशवाद के तमाम फायदे हैं। खासकर, राजनीति तो ‘वंशवादिये लाभों’ से भरी पड़ी है।

अपवाद को किनारे रख दें तो सौ परसेंट देखा यही गया है कि नेता का बेटा आगे चलकर बनता नेता ही है। राजनीति के जिस बीज को कभी उसके परिवार में बोया गया था आगे आने वाली पीढ़ियां अपने-अपने तरीके से उसे पल्लवित करती रहती हैं। वंश एक ही ढाल पर तना बरसों बरस टिका रहता है। लगभग यही हाल सिनेमाई संसार का भी है। कंगना ने इसी वंश-परंपरा पर ही तो तीखे प्रहार किए हैं। पर कंगना क्या जाने ‘वंशवाद की मलाई’ का स्वाद!

जब से वंशवाद पर हंगामा छिड़ा है, देख रहा हूं, अब वो बड़े नेता और बुद्धिजीवि भी लगभग ‘खामोश’ हैं जो गाहे-बगाहे वंशवाद को गलिया दिया करते थे। चूंकि वंशवाद पर बयान एक ‘ऊंचे कद’ के नेता की तरफ से आया है तो लाजिमी है अन्य लोगों का चुप रह जाना। वंशवाद में सबके अपने-अपने (कम या ज्यादा) फायदे निहित हैं तो भला कोई क्यों बोले?

यह देश, समाज और खुद मैं ‘एहसानमंद’ हूं उन वंशवादी नेताओं-फिल्मवालों का जिन्होंने लाख हाय-तौबा के बाद भी अपने-अपने वंशवाद को ‘जिंदा’ रखा हुआ है। वंशवाद को अस्तित्व में रख वे पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर रहे हैं। मैं तो चाहता हूं पूरी दुनिया हमारे देश के वंशवादियों से वंशवाद को चलाए-बनाए रखने की ‘प्रेरणा’ ले।

वंशवाद की सदा जय हो।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

चुप रहने में भलाई

मैंने अब कम बोलना। कम लिखना। बहस में कम पड़ना शुरू कर दिया है। समय खराब है। किसी का कोई भरोसा नहीं। कब में किस बात या असहमति पर कोई मेरा भी काम तमाम कर डाले। तो प्यारे मेरी भलाई इसी में है कि मैं ‘मुंह पर टेप’ चिपकाए रहूं।

लेखक होकर मेरा यों ‘बिदकना’- जानता हूं- बहुत लोगों को ‘अखर’ रहा होगा। कुछ साथियों ने तो मुझे ‘बुजदिल’ और ‘नपुंसक’ तक करार दे दिया होगा। न केवल मेरे लेखन साथ-साथ मेरी कलम पर भी हजार तरह के फिकरे कसे होंगे। मगर मैं किसी के ‘कहे’ की कतई ‘परवाह’ नहीं करता। यों, दूसरों की परवाह करने के चक्कर में अगर पड़ जाऊंगा तो एक दिन अपनी ही जान से हाथ धो बैठूंगा! जबरन क्रांतिकारी या खुले विचारों का लेखक बनने का मुझे कोई शौक नहीं। क्या समझे...।

ये जो अक्सर हम प्रगतिशील सोच, जनवादी विचारधारा, निष्पक्ष लेखन आदि के चक्करों में पड़ जाते हैं न। बस यही जिद एक दिन ‘कबाड़ा’ कर डालती है। क्या जरूरत है मुझे इन सब आजाद-ख्याल ख्यालों में ‘ख्याली पुलाव’ पकाने की? जितना भर अपने दम पर पका पा रहा हूं काफी है मेरे लिए। पानी में रहकर मगर से बैर रखने में होशियारी नहीं। जब तलक बनाकर चला पा रहे हैं, चलाते रहिए न। कौन-सा क्रांतिकारी लेखक बनकर आप समाज या देश में क्रांति लिख देंगे।

मैं साफ कहता हूं। फिर से कह रहा हूं। लेखन या अपने दम पर क्रांति करना मेरे बस की बात नहीं। वो लोग और ही होते हैं, जो अपनी विचारधारा के दम पर दूसरे की विचारधारा से ‘पंगा’ लेने की हिम्मत रखते हैं। माफी कीजिएगा, ये हिम्मत मेरे में बिल्कुल नहीं। जो शख्स दीवार पर बैठी छिपकली को देख कमरे में न घुसता हो उससे किसी ‘क्रांति’ की उम्मीद रखना पानी के मध्य खड़े होकर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करना है।

‘फ्री स्पीच’ का जिगरा रखने वाले लेखक लोग अलग ही होते हैं। एकदम निडर। सहासी। निष्पक्ष। बिंदास। दुनिया क्या दुश्मन तक उनके आगे पानी मांगते नजर आते हैं। लेकिन मैं किसी को भी अपने समक्ष पानी मंगवाने की तमन्ना नहीं रखना चाहता। जिंदगी जिस ठर्रे पर चैन से चल रही है, चलने देना चाहता हूं। चैन से बड़ा सुख मेरे तईं दूसरा नहीं।

बैठे-ठाले समय की निगाह टेढ़ी होते देर ही कितनी लगती है। न न मैं कतई नहीं चाहता समय की निगाह मेरे प्रति टेढ़ी हो। मैं सीधी-सच्ची लाइफ को ‘एन्जॉय’ करने का आदी हूं। खामखा किसी के फटे में अपनी टांग घुसेड़ मैं जन्म-जिंदगी भर को ‘लूला’ नहीं होना चाहता।

उनकी ‘फ्री स्पीच’ उन्हें और मेरी ‘चुप्पी’ मुझे मुबारक!

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

नोटबंदी की विफलता, जीडीपी का लुढ़का और उनका मुस्कुराना

देख रहा हूं। बैंच पर जमे एक शिरिमानजी निरंतर मुस्कुराए जा रहे हैं। अखबार उनके हाथों में है। मुस्कुराते वक्त उनके दांतों को देख पा रहा हूं। कुछ पीलापन है उन पर। उम्र का तकाजा कह लीजिए या पान-गुटखे की छाप जो उनकी मुस्कुराहट के बीच खुलते-बंद होते दांतों पर साफ दिखलाई पड़ रही है।

हालांकि शिरिमानजी मेरे तईं कतई अनजान हैं। तो क्या...? मैं उनके करीब जाकर लगभग बैठ ही जाता हूं। किंतु वे अभी भी अखबार में नजरें डाले संभवता किसी दिलचस्प खबर को पढ़ मुस्कुराए जा रहे हैं। मेरे करीब में बैठने से अननोन टाइप बने हुए हैं।

बहरहाल, मैं यह पूछ कर उनकी एकाग्रता तोड़ने का प्रयास करता हूं कि ‘शिरिमानजी, आप इतना मुस्कुराए क्यों जा रहे हैं? अखबार या खबर में ऐसा क्या है, जो आपको दीन-दुनिया से बे-खबर बनाए हुए है?’ शिरिमानजी ने अखबार से नजर बचाकर अब मुझ पर जमा दी थी। बिना किंतु-परंतु किए तपाक से बोल पड़ते हैं, ‘वाह! क्या धांसू काम हुआ। सरकार की नोटबंदी तो विफल हुई ही साथ में जीडीपी का भी बैंड बज गया। अब आएगी अक्ल सरकार को।‘

शिरिमानजी के थोड़ा और करीब खीसकते हुए मैं उनसे पूछा- ‘ओह! तो यह कारण था आपके निरंतर मुस्कुराते रहने का। मगर सरकार की किसी विफलता पर यों मुस्कुराना उचित नहीं। यह न केवल चुनी हुई सरकार बल्कि लोकतंत्र व जनता का भी सीधा अपमान है।‘

शिरिमानजी मेरी बात सुन अपने माथे पर बल डालते हुए बोले- ‘मुस्कुराऊं नहीं तो और क्या करूं? सरकार ने काम ही ऐसा किया था। भला क्या आवश्यकता थी नोटबंदी की तानाशाही को थोपने की? उसी का परिणाम है कि जीडीपी मुंह के बल गिरी।‘

मैंने कहा- ‘करेंसी के बदलने का जिक्र तो कभी डा. आंबेडकर ने भी कभी किया था। सरकार ने एक प्रयोग करके देखा था। उसका परिणामा अच्छा भी आया और खराब भी। अगर खराब रहा भी तो इसमें मुस्कुराने का कोई सीन नहीं बनता।‘

शिरिमानजी मुझे रत्तीभर सहमत नहीं थे। वे तो निरंतर सरकार की कथित नीतियों को कोसे जा रहे थे। कोसते-कोसते उनकी खीझ इतना अधिक बढ़ गई थी कि उन्होंने बात ही बात में मुझे ‘भक्त’ तक घोषित कर डाला।

हालांकि उनके कहे का मैंने बुरा नहीं माना। लेकिन उनसे बातचीत को यह कहते हुए विराम दिया कि बड़े मुद्दे किन्हीं स्थापित विचारधारों के तहत न देखे जाते हैं न समझे।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

जूली 2 के पोस्टर में छिपे संस्कार

अखबारों में जूली 2 का पोस्टर आया और छा गया। ऐसा छाया कि संस्कारवान लोग भी उतावले हो उठे उसे देखने-समझने को। सुनाई में आया है कि लोगबाग बड़ी तबीयत से जूली 2 के पोस्टर को अपने-अपने व्हाट्सएप पर एक-दूसरे को आगे-पीछे सरका रहे हैं। पोस्टर पर ‘चटकारे’ यों लिए जा रहे हैं मानो कोई चटपटा-तीखा पदार्थ जीभ पर आन गिरा हो अचानक।

बताता चलू, जूली 2 एक ‘सर्वश्रेष्ठ संस्कारवान फिल्मकार’ की फिल्म है। पिछले दिनों उक्त संस्कारवान फिल्मकार अपनी ‘संस्कारवान छवि’ के लिए अच्छी-खासी चर्चे में रह चुके हैं। अपनी संस्कारी सोच के हिसाब से वे पूरे फिल्म जगत को संस्कारों की घुट्टी पिला देने का मन रखते थे। किंतु किस्म-किस्म के विवादों के कारण बीच ही में उन्हें अपने ‘संस्कारशील पद’ को छोड़ना पड़ा।

खैर...। जूली 2 के पोस्टर पर लौटते हैं। पहली ही नजर में मुझे यह पोस्टर अच्छा-खासा ‘संस्कारयुक्त’ नजर आया। इस पोस्टर को देखने के बाद मेरा ‘संस्कार’ नामक शब्द पर ‘विश्वास’ खासा मजबूत हुआ। मैं सोचने लगा- व्यक्ति को अगर इसी तरह के संस्कार हर रोज या हर पल देखने-समझने को मिलने लगें फिर भला वो ‘अश्लीलताओं’ या ‘कामुकताओं’ के जंजालों में क्यों कर उलझे?

अश्लीलताएं तो मनुष्य के दिमाग की ‘भौतिक कुंठाएं’ हैं। किंतु जूली 2 टाइप के पोस्टर और किताब संग लेटी कन्या को देखने के बाद ‘अंदरूनी संस्कार’ खुद ब खुद दिमाग में विकट हलचल मचाने लगते हैं।

यों भी, संस्कारों का पाठ किसी को पढ़ाया नहीं जा सकता। संस्कार मनुष्य के भीतर स्वयं ही पैदा होते हैं। लेकिन समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनका सवेरा ही संस्कार की घंटी बजाने के साथ शुरू होता है। रात-दिन वे तरह-तरह के संस्कारों पर इस उस को भाषण देते रहते हैं। जबकि खुद उनके संस्कार क्या हैं, कैसे हैं, क्या चाहते हैं; ये सब उनके मोबाइल की ‘लॉक्ड गैलरी’ में झांककर देखा जा सकता है।

जूली 2 का पोस्टर बेहद क्रांतिकारी है। दिमाग में संस्कारों का संचार करता हुआ प्रतित होता है। इमेजिन किया जा सकता है- जब पोस्टर ही इतना संस्कारशाली है फिर फिल्म में तो संस्कारों की पूरी पाठशाला ही स्थापित हुई होगी।


फिर भी, जिन अति-भद्र लोगों को जूली 2 के संस्कारी पोस्टर में से ‘अश्लीलता की बू’ आ रही है, उनसे मुझे सिर्फ इतना ही कहना है- किरपिया संस्कारवान बनिए। सोच को संस्कारी करिए। दिमाग में संस्कार डालिए। बिना संस्कारों की शरण में जाए आपको जूली 2 ही क्या सनी लियोनी के वस्त्रों से भी ‘अश्लीलता’ की ही ‘बू’ आएगी ताउम्र।

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताएं

बहरहाल, निजताओं पर चाहे कितने कानून बना लिए लीजिए। कितनी ही बहस कर लीजिए। एक-दूसरे की निजताओं की कितनी ही दुहाईयां दे लीजिए। मगर फिर भी कुछ सवाल न खत्म हुए हैं। न कभी खत्म हो पाएंगे। ये ऐसे गैर-वाजिब सवाल हैं, जिन्हें हम चाहकर भी 'निजी' नहीं बना सकते। समाज एवं घर-परिवार के बीच गाहे-बगाहे इन सवालों को उछाला जाता ही रहता है। रोक-टोके के बाद भी

समस्या यह है अगर इन सवालों पर आप अगर ‘मौन’ रहते हैं। या हंसकर टाल देते हैं। या अनसुना कर देते हैं। या वक्त की भारी कमी का हवाला देते हैं। तो अगला बिना ज्यादा कुछ समझे-बुझे तुरंत आप पर ‘अंदरूनी शक’ करना प्रारंभ कर देता है। यों भी, किसी पर कैसा भी शक करना समाज का हर शख्स अपना ‘मौलिक अधिकार’ समझता है। शक की एक चिंगारी न केवल नाते-रिश्तेदारों के बीच अपितु गली-मोहल्ले में भी ऐसी फैलती है फिर आपके पास मुंह छिपाने के अतिरिक्त और कोई चारा रह नहीं पाता।

इंसान की निजता को ‘भंग’ करने के लिए दो सवाल सबसे अधिक पूछे जाते हैं। पहला- “और सुनाओ...?” दूसरा- “खुशखबरी कब दे रहे हो...?” इन दो सवालों से हम आदिकाल से जूझ रहे हैं। देश, समाज, दुनिया, मनुष्य कितने ही ‘आधुनिक’ या ‘डिजिटल’ क्यों न हो जाएं किंतु ये दो सवाल गांठ की भांति हमारे पल्लू से बंधे ही रहते हैं। इन सवालों पर न आप मुंह चुरा सकते हैं न किसी पर चौड़े हो सकते। अगला आमने-सामने नहीं पूछेगा तो व्हाट्सएप करके पूछ लेगा। पर पूछेगा जरूर। क्योंकि बिना पूछे हमारे यहां लोगों की दाल-रोटी हजम नहीं होती।

“और सुनाओ...।“ बंदा क्या सुनाए। दस-बारहा घंटे की नौकरी। दो घंटे जाम में फंसने के बाद। अगला जब थका-मंदा घर लौटकर आता है तब तक उसकी हिम्मत की बैंड कर कदर बज चुकी होती है फिर वो न कुछ सुनाने न कुछ सुनने के काबिल रह ही नहीं पाता। रात का खाना खाकर अगले दिन की जद्दोजहद के लिए उसे तैयार होना होता है। मगर लोग हैं कि फोन कर-करके, व्हाट्सएप कर-करके एक ही सवाल “और सुनाओ...” “क्या हाल हैं...” “क्या चल रहा है...” “मैसेज का जवाब क्यों नहीं देते…” बंदे की रगों में ‘भस्स’ भरते रहते हैं।

सुनाना न सुनाना बंदे का ‘निजी मसला’ है। कम से कम इतनी निजता तो उसकी झोली में पड़ी रहने दो यारों।

ठीक ऐसा ही मसला ‘खुशखबरी सुनाने’ का है। लुत्फ देखिए, खुशखबरी जानने की इच्छा जितनी परिवार वालों को नहीं, उससे कहीं ज्यादा रिश्तेदारों को रहती है। कुछ तो इतने ‘गजब’ होते हैं कि बहू के घर में पहला कदम रखते ही खुशखबरी जानने को बेताब हो उठते हैं। मानो- जच्चा-बच्चा का सारा खर्च अकेले वे ही उठाएंगे।

इस सवाल पर जब कभी लड़के या बहू की तरफ से ‘आड़ा-तिरछा’ जवाब मिल जाता है तो ऐसे मुंह बिचका लेते हैं जैसे वे उनके खूंठे पर बंधी बकरी खोल लाए हों। अमां, शादी का पहला और अंतिम उद्देश्य सिर्फ खुशखबरी पर ही नहीं टिका होता। आजकल के जमाने में तो बिल्कुल भी नहीं। इतनी विकट महंगाई में दो बंदों का खर्च पूरा पड़ नहीं पाता और लोगों हैं कि तुरंत खुशखबरी की मिठाई चखने को बेकरार हुए बैठे रहते हैं।

हालांकि ये सब इंसान की ‘व्यक्तिगत निजाताओं’ में आता है। पर सामने वाला इसे ‘निजी’ बना रहने दे तब न। मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताओं को तो कुछ लोग अपनी ‘बपौती’ समझते हैं। जब जहां चाहा कुछ भी पूछ बैठे। बिना सोचे-समझे।

निजता जरूरी है। निकट भविष्य में अगर इन ‘बेढंगें सवालों’ से भी ‘मुक्ति’ मिल जाए फिर ‘निजताएं’ और भी ‘खूबसूरत’ लगने लगेंगी हमें।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

उनकी खामोशी का इमोशनल अत्याचार

वो खामोश हैं। इतने खामोश कि उनकी आवाज न जमीन न टि्वटर कहीं पर भी सुनाई नहीं दे रही। देश-दुनिया में इतना कुछ घटते रहने के बाद भी उनका खामोश रहना न केवल मुझे बल्कि उनके चहाने वालों को भी अब खलने-सा लगा है।

पहले जब वे लगभग हर मुद्दे पर बोलते या ट्वीट करते रहते थे तब हमारे दिलों में यह आस जगी रहती थी कि हमारे बीच कोई तो है जो मुस्तैदी के साथ विरोध कर रहा है। उनकी ट्वीटिया विरोधी भाषा अच्छों-अच्छों के पसीने छुड़ा दिया करती थी। सोशल मीडिया से लेकर गली-मोहल्लों के नुक्कड़ों पर जमने वाले जमघट तक में उनके नाम एवं विरोध के चर्चे छाए रहते थे। मजाल है, जो उनके विरोधी तेवरों से किसी ऊंचे या बड़े नेता की पगड़ी न उछली हो। सड़क से लेकर टि्वटर तक पर सबकी बखिया उधेड़ी है उन्होंने।

लेकिन यकायका उनका लंबी खामोशी में चले जाना किसी को रास नहीं आ रहा। लोग परेशान है कि वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे? मुद्दों पर अपना ‘तगड़ा विरोध’ दर्ज क्यों नहीं करवा रहे? वे बोलते थे तो सबका मन लगा रहता था। लेखकों को लिखने व ठलुओं को मौज लेने के अवसर मिलते रहते थे।

सच कहूं तो उनके यों खामोश बने रहने से मेरा भी मन टि्वटर पर नहीं रमता। उनके टि्वटर पेज पर इस उम्मीद में टहलने चला जाता हूं कि शायद उनका कुछ धांसू-सा लिखा हुआ ट्वीट मिल जाए। कभी-कभार एकाध फॉर्मल ट्वीट को छोड़के ज्यादातर उनके टि्वटर एकांउट पर खामोशी ही पसरी रहती है।

उनकी खामोशी के रहस्य को जनाने का प्रयास मैं उनको ट्वीट करके भी कर चुका हूं। किंतु आज तलक वहां से कोई उत्तर नहीं आया। ऐसे थोड़े न होता है कि आप अपनी जनता को अपनी खामोश का सबब न बतलाएं। जबकि आपके बारे में यह मशहूर है कि आप हर काम जनता से बिना पूछे करते ही नहीं। फिर यह खामोशी क्यों?

उनकी खामोशी धीरे-धीरे कर ‘इमोशनल अत्याचार’ टाइप बनती जा रही है। मुझे डर है, उनकी खामोशी अगर थोड़ी और लंबी खींच ली तो यह देश-दुनिया-समाज कहीं उन्हें ‘विस्मृत’ न कर दे!