सोमवार, 15 जनवरी 2018

आधार, फेसबुक और मियां की बेचैनी

मियां मेरे लंगोटिया यार हैं। मोहल्ले में ही रहते हैं। जीवन का अच्छा और बुरा समय हमने साथ बिताया है। दिल में छिपी जो बात अपनी बेगम से न कह पाते, मुझसे कह देते हैं। मैं इत्मीनान से सुन भी लेता हूं। जरूरत पड़ती है तो अपनी तरफ से राय टाइप भी दे देता हूं। हालांकि ऐसा सौ में पांच बार ही होगा।

कल ही की बात रही। मियां हाथ में किसी अंग्रेजी अखबार की प्रति थामे तेज हवा के झोंके की मानिंद घर में दाखिल हुए। पास पड़ी कुर्सी पर जोरदार तशरीफ रखी। अखबार में छपी एक खबर को मेरे सामने करते हुए बोले- 'क्या अब यही दिन देखना बाकी रह गया था? मतलब प्राइवेसी का कोई मोल ही नहीं रह जाएगा! आखिर ये सरकार चाहती क्या है?'

माजरा मेरी समझ में अब भी नहीं आया था कि क्यों मियां इतना भड़क रहे हैं? चूंकि अंग्रेजी में मेरा हाथ और दिमाग बचपन से ही तंग रहा है सो मियां से उक्त खबर के बाबत पूछा। इस भीषण सर्दी में भी चार घूंट ठंडे पानी से गला तर करने और थोड़ा शांत पड़ने के बाद मियां ने खुलासा किया कि 'सरकार अब फेसबुक को आधार से लिंक करने पर विचार कर रही है!'

'तो इसमें इतनी हैरानी और हत्थे से उखड़े वाली क्या बात है?' मैंने मियां से पूछा। 'वाह जी वाह बात क्यों नहीं है? आखिर निजता भी कोई चीज होती है कि नहीं! क्या जरूरत है सरकार या फेसबुक को हमारी निजता पर डाका डालनी की।' मियां ने खासा तैश में प्रतिकार किया।

'न न ऐसा कुछ नहीं है महाराज। बल्कि सरकार और फेसबुक तो हमारी निजता को इस प्लेटफॉर्म पर बचाने की जुगत में हैं। आधार के फेसबुक से लिंक होते ही इना, मीना, एंजल प्रिया, डॉली, बबली टाइप तमाम फर्जी एकाउंट्स पर रोक लग जाएगा। यहां सिर्फ वही टिका रहेगा जो जेनुइन है। समझे न।'

'समझना क्या है? मैं इस मनमानी को चलने न दूंगा। इस मसले को यूएन तक लेके जाऊंगा। सड़कों पर आंदोलन करूंगा। तानाशाही नहीं चलेगी..नहीं चलेगी..।' नारा बुलंद करते हुए मियां अपने घर को निक्कल लिए। मैंने उन्हें पुकारा भी मगर वे न पलटे।

एक बे-किताब लेखक होने की व्यथा-कथा

मैं केवल अपनी ही निगाह में लेखक हूं। अपने लेखक होने पर केवल मुझे ही गर्व है। लेकिन पत्नी मुझे लेखक नहीं मानती। गर्व करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यों, गर्व तो उसे मेरी पत्नी होने पर भी नहीं है। फिर भी, कुछ रस्में समाज को बहलाए रखने की खातिर निभा ली जाती हैं।

बाकी कुछ सोच रहे हों या न सोच रहे हों आप यह तो जरूर सोच ही रहे होंगे कि पत्नी को खुद पर मेरी पत्नी होने का गर्व भला क्यों नहीं है? वैसे तो एक लोकतांत्रिक मुल्क में हर पति-पत्नी को एक-दूसरे पर गर्व करने न करने का व्यक्तिगत अधिकार है। किसी पर किसी की जोर-जबर्दस्ती नहीं। न गर्व करने-करवाने के लिए एक-दूसरे को कोई हड़का ही सकता है। अब पत्नियां पुराने जमाने जैसी नहीं रहीं। अपने पतियों पर अपना जोर उतना ही रखती हैं जितना लेखक अपने विचारों पर रखता है।
तो पति की बेहतरी इसी में है कि वो अपनी पत्नी के कहे पर रिएक्ट कतई न करे। बुझे मन से ही सही यह स्वीकार कर ले कि पत्नी जो कह रही है वो ही दुनिया का अंतिम किंतु शाश्वत सत्य है। यही वजह है कि मैं भी पत्नी के कहे-बोले को बिना ईफ एंड बट किए मान लेता हूं।

अच्छा तो अब बताता हूं कि पत्नी क्यों मुझे लेखक मनाने से इंकार और क्यों मुझ पर गर्व नहीं करती। हालांकि इस वजह का कोई बहुत बड़ा कारण नहीं। कारण केवल इतना-सा है कि इतने बरस लेखक होने के बाद भी अभी तक मेरी कोई किताब क्यों नहीं आई है? हम पति-पत्नी के मध्य बहस और आंशिक झगड़े का कारण सिर्फ किताब है।

पत्नी को लगता है कि किताब आ जाने पर ही लेखक के लेखन और चरित्र को पहचान मिलती है। तब ही वो लेखक होने की गिनती में गिना जाता है। इस बाबत मैंने कई दफा उसे शांति से बैठाकर समझाया कि लेखक की पहचान केवल किताब नहीं बल्कि उसके लेखन को पाठकों से मिला अपार प्यार है। जोकि मुझे सहर्ष हासिल भी है। लेकिन नहीं। उसके तईं न मेरा लेखन मायने रखता है न पाठकों का प्यार। उसे तो मतलब मेरी किताब से है बस।

दरअसल, उसे किताबों के प्रकाशन के पीछे की राजनीति तो मालूम नहीं। न कोई अहसास है लेखक-प्रकाशक के बीच बनी रहने वाली अनबन का। अरे, अपनी किताब ले आना कोई इतना आसान थोड़े न है, जितना वो समझती है। कितनी तरह के दंद-फंद करने-करवाने पड़ते हैं। प्रकाशक कोई इतना सीधा तो होता नहीं कि बिना 'कुछ लिए' वो किताब छाप देगा। अपनी जेब से पैसा देकर अपनी किताब छपवाने का मुझको कोई शौक नहीं।

मैं तो चलो छोटा-मोटा लेखक ठहरा। बड़े और वरिष्ठ किस्म के लेखकों के भी पसीने छूट जाते हैं अपनी किताब को निकलवाने में। आजकल के भीषण बाजारवाद के दौर में अपना माल (किताब) बेचना इतना आसान नहीं। लेखक को भी अपनी किताब की वैसी ही मार्केटिंग करनी पड़ती है जैसे सेल्समैन अपने प्रोडक्ट की करता है। चेतन भगत के अपनी किताब को प्रमोट करने के फंडे देखे हैं न।

पत्नी इतने से भी संतुष्ट नहीं। दो टूक कह देती है, जैसा वे लोग करते हैं तुम भी करो न। क्या हर्ज है। बन जाओ न अपनी किताब के सेल्समैन! क्या मार्केटिंग में एमबीए घुइयां छीलने के लिए किया था!

अरे, मेरी किताब न सही पर इतने अखबारों में निरंतर छप तो रहा हूं न। यह भी तो एक प्रकार का प्रकाशन और मेरे लेखन की पब्लिसिटी है। रोज लिखना इतना भी सरल नहीं होता प्रियवर।

यहां-वहां छपके और रोज लिखके तुम न कोई बहुत बड़ा तीर मार रहे हो न मुझ पर कोई अहसान ही कर रहे हो। लेखक हो क्या इतना भी न करोगे। रोज ठेला लगाने या रिक्शा चलाने वाला कभी कहता है कि मैं ये-ये करता हूं। अपने पेट की खातिर सब मेहनत करते हैं श्रीमानजी। तुम कोई अनोखे न हो। बताइये, ये तो पत्नी का जवाब होता है।
इस मुद्दे पर उससे ज्यादा बहसबाजी करो तो वही चिर-परिचित धमकी 'घर छोड़कर चली जाऊंगी'।

स्साला कभी-कभी तो बड़ी खुंदक आती है खुद पर कि काहे मैं लेखक बन गया! नेता या बिजनेसमैन होता तो सही था। तब कम से कम मेरे ऊपर चौबीस घंटे 'बे-किताब लेखक' होने का ताना तो नहीं मारा जा रहा होता। जिंदगी ठाठ से कटती। न पत्नी के नखरे उठाने को सौ दफा सोचना पड़ता।

खैर, ये सब तो ख्याली बातें हैं। बातों से पेट कहां भरता है पियारे।
अब तो इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ हूं कि कैसे भी करके अपने ऊपर से 'बे-किताब लेखक' होने का कलंक मिटा सकूं। 10-12 न सही कम से कम अपनी एक किताब लाके तो पत्नी को दिखा ही दूँ।  किताब के बहाने हमारे बीच हर वक़्त रहने वाला गतिरोध कुछ तो दूर हो।

जानता हूं, मेरे लिए ये सब जुगाड़-तुगाड़ करना कठिन होगा। पर इसके अतिरिक्त कोई और चारा भी तो नहीं। एक किताब आ जाने से पत्नी की निगाह में 'बहुत अच्छा पति' तो नहीं हां 'कुछ अच्छा पति' होने का सम्मान तो पा ही जाऊंगा।

उम्मीद है, अगले पुस्तक मेला तक मेरे किताब भी होगी मार्केट में।

रविवार, 31 दिसंबर 2017

बदनामियां अच्छी हैं!

बदनामियां अब दाग जितनी ही अच्छी लगने लगी हैं! एक बार बदनाम हो लिए तो फिर जन्म-जिंदगी भर की ऐश ही ऐश। कहीं भी किसी को अपना परिचय देने की आवश्यकता नहीं। नाम के साथ जुड़ी बदनामी खुद परिचय बन जाती है। हालांकि एकाध दिन थोड़ा बुरा टाइप जरूर लगता है मगर जल्द ही आदत में आ जाता है।

कुछ बदनामखोर तो मैंने ऐसे भी देखे-सुने हैं जिनका नाम ज़बान पर आते ही अगला थर-थर कांपने लगता है। आगे-पीछे की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। तब मीडिया भी पूरी दिलचस्पी के साथ बदनाम की कथित बदनामी को अपने तरीके से ग्लोरीफाई करता है। फिर बदनामियां पर्सनल न रहकर ग्लोबल हो जाती हैं। ग्लोबल होने में जो सुख है उसका तो आनंद ही कुछ और है। है न...!

एक वक्त था जब लोग किसी बदमान को अपने पास तो दूर उसकी छाया के करीब जाने से भी घबराते थे। बदनाम के दिखते ही उसके चरित्र पर किस्म-किस्म की लानतें भेजते थे। अपने गली-मोहल्ले में रहने तक नहीं देते थे। मगर अब ऐसा नहीं है! जमाने के बदलने के साथ-साथ लोगों ने अपनी सहनशक्ति को भी काफी स्ट्रांग कर लिया है। चाहे बदनाम हो या अपराधी उनकी हेल्थ पर अब कोई खास फर्क न पड़ता। सब अपने में ही व्यस्त और मस्त रहने लगे हैं। उनके पड़ोस में बदनाम रह रहा है या नाम वाला उन्हें नहीं खबर।

मैंने तो तमाम लोग ऐसे भी देखे-सुने हैं जो अपना काम निकलवाने के लिए बदनाम का दामन थामने में भी गुरेज नहीं करते। पूछो तो तर्क देते हैं, ईमानदार का हाथ पकड़ने से बेहतर है किसी ऊंचे बदनाम और बिंदास व्यक्ति का हाथ थामा जाए ताकि आड़े वक़्त में वो काम आ सके। चरित्र अब कोई बहुत बड़ा मसला नहीं रह गया है पियारे। देश-दुनिया में सभी बे-चरित्र मौज कर रहे हैं।

लुत्फ तो यह है कि लोग समाज से कहीं अधिक अब सोशल मीडिया पर बदनाम हो रहे हैं। और तो और सोशल मीडिया पर मिली बदनामी को फुल-टू एन्जॉय भी कर रहे हैं। 'आ बैल मुझे मार' वाली कहावत यहां पूरी तरह फिट बैठती है। और, जो सोशल मीडिया पर बदनाम नहीं है वो कतई हाशिए पर है।

सोशल मीडिया से मिली बदनामी के तमाम ऊंचे फायदे हैं। ये बदनामियां बहुत तेजी से ग्लोबलता को प्राप्त होती हैं। अमेरिका से लेकर चीन-जापान-युगांडा तक आपको नाम से कम बदनामियों से ही अधिक जाना जाता है। रात भर में बदनामियों की ख्याति इतनी बढ़ जाती है कि दूसरे लोग भी प्रेणना लेना शुरू कर देते हैं। इतिहास गवाह है, लोग नेकियों से कम अपितु बदनामियों से अधिक सीखते हैं।

खुद को बदनाम होने देने में फ़िल्म स्टारों का जबाव नहीं। जो फ़िल्म स्टार जितना बदनाम हो लेगा उसकी फ़िल्म भी उतनी ही चलनी है। ये प्रमोशन-फिरमोशन तो महज बहाना है असल मकसद तो खुद से जुड़ी बदनामी को मार्केट करना है। अभी हाल मार्सल को जिस प्रकार बदनाम किया गया, फ़िल्म सुपर हिट का रूतबा पा गई।

दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर कुछ भी कह-लिख या पहनकर बदनाम हो लो फिर ट्रोलर्स आगे की बदनामी का काम आसान कर ही देते हैं। फ़िल्म में एक दफा हिट का तड़का लगा नहीं कि सारी बदनामियां काफूर! तब न कोई पूछने वाला मिलेगा न कहने वाला कि क्यों और किस बात पर बदनाम हुए थे महाराज।

आज के जमाने में जिसने अपनी बदनामी को भुना लिया उसकी पौ बारह। बदनामी से हासिल हुए नाम से ही सफलता का रास्ता निकलता है। यही वजह है कि अब लोग अपनी बदनामियों पर शर्मसार नहीं बल्कि गौरवान्वित टाइप फील करते हैं।

मानना पड़ेगा, चरित्र निर्माण में बदनामियां ही सार्थक भूमिका निभा रही हैं। बाकी आदर्शवाद पर झड़े रहिए कलेक्टरगंज...!

ढोल-नगाड़े की सार्थकता

ढोल-नगाड़ों से मुझे बहशत-सी होती है। आस-पास बज रहे ढोल-नगाड़े की आवाज भी अगर कानों में पड़ जाए तो मैं घंटों घर से बाहर नहीं निकलता। ऐसा लगता है कि कोई बहुत दूर खड़ा होके मेरी बर्बादी का जश्न टाइप मना रहा है। आप यकीन नहीं करेंगे, इसी डर से मैंने अपनी शादी में ढोल-डीजे का झंझट ही नहीं रखा था। हालांकि काफी लोग मुझसे नाराज भी हुए लेकिन मैंने किसी की न सुनी।

अरे, शादी ही तो करने जा रहा था कोई माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने नहीं। कि, अपनी कथित विजय का जुलूस ढोल-नगाड़े बजाकर निकालूं। लोग ऐसा स्वीकार नहीं करते किंतु मेरी निगाह में शादी-बियाह एक ऐसा जुआ है कि दांव लग गया तो जीवन भर आनंद ही आनंद नहीं तो उम्रभर का कर्ज। तो फिर क्यों ढोल-नगाड़े बजवाकर अपनी जग-हंसाई करवाना!

कल को लोगों को कहने का मौका ही क्यों दो कि जनाब ने शादी तो बड़े ढोल-नगाड़े बजाकर की थी, पर चार दिन में ही चांद-तारे नजर आ गए। लोगों को कहने से आप रोक थोड़े न लोगे।

कई शादियों में तो मैंने यह तक देखा है कि घोड़ी पर बैठते ही घोड़ी बिदक ली। एकाध दफा तो घोड़ी ने दूल्हे को ही अपनी पीठ पर से नीचे धकेल दिया है। मतलब अपशकुन...! फिर भी लोग केस को नहीं समझते और बैंड-बाजा-बारात करवा ही देते हैं।

मुझे तो ढोल-नगाड़ों का बजना नेताओं की जीत पर समझ आता है। सही भी लगता है। धरती पर असली मेहनत तो नेता लोग ही करते हैं। बेचारे चुनावों में दिन-रात एक कर देते हैं। साम-दाम-दंड-भेद सब आजमा लेते हैं। तब कहीं जाकर उन्हें कुर्सी का सुख प्राप्त होता है।

हम समझते नहीं किंतु ये सब इतना सरल नहीं होता। चुनाव लड़ना और जीतना एक प्रकार से अपने जीवन को ही दांव पर लगाना होता है। ऐसे चुने हुए नेताओं की जीत पर ढोल-नगाड़े बजें तो उसकी बात ही कुछ और है। इससे ढोल-नगाड़े की सार्थकता का पता चलता है!

शादी की कथित खुशी और नेता की जीत में यही फर्क है कि शादी में बाजी बमुश्किल पलटती है जबकि राजनीति में बाजी को कभी भी कितनी बार पलटा जा सकता है।

खैर, मुझे क्या? मुझे तो ढोल-नगाड़े वैसे भी आतंकित करते हैं।

घोटाले होते ही नहीं!

इस बात का यकीं तो मुझे बचपन से था कि घोटाले नहीं होते! अभी 2 जी पर आए फैसले ने मेरे यकीं और अधिक पुख्ता कर दिया कि वाकई, घोटाले जैसा कुछ होता ही नहीं। ये तो हमारा मति-भ्रम है, जो एंवई घोटाले के अस्तित्व पर यकीं कर लेते हैं!

न केवल 2 जी बल्कि अब तक देश में जितने भी प्रकार के कथित घोटाले प्रकाश में आए हैं, सब के सब हमारे खाली दिमागों की उपज थे। विपक्ष ने अपना चुनावी माइलेज लेने के लिए उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर हाईलाइट किया था। न कोई नेता न मंत्री न अफसर किसी भी घोटाले में शामिल नहीं था। वो तो उनकी कुछ दुष्ट-आत्माएं उनके शरीर में प्रवेश कर गईं थीं, जिन्होंने- उन्हें बदनाम करने की खातिर- ये कांड कर डाले थे। वरना, देश का नेता तो छोड़िए, आम आदमी तक घोटाले का 'घ' नहीं जानता!

एक बात कहूं, देश की अर्थव्यवस्था को रत्तीभर चूना किसी घोटाले से नहीं लगा है! न ही देश के आम नागरिक का टैक्स का पैसा जाया हुआ है! वो तो कुछ मायावी टाइप की भ्र्ष्ट-ताकतें थीं जिन्होंने अदालत के साथ-साथ मीडिया का भी टाइम खोटी किया। तमाम चुनाव भ्रष्टाचार और कथित घोटालों के नाम पर लड़े-जीते गए। यही नहीं, मुझ जैसे कितने ही लेखकों ने घोटालों और उनमें संलिप्त नेताओं-मंत्रियों पर न जाने क्या-क्या लिख डाला। आज जब उस सब के बारे में सोचता हूं तो मुझे खुद पर भयंकर गुस्सा आता है कि हाय! ये सब मैंने क्यों लिखा? किसी को यों कलम के दम पर बदनाम करना उचित नहीं था!

तो क्या मैं यकीं कर लूं कि हमें '2 जी' बनाम 'अच्छे दिन' का झांसा दिया गया था? 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का भावनात्मक जुमला गढ़ा गया था? हर खाते में लाख रुपए भी क्या चुनावी स्टंट ही था? अगर ये सब सही था! 2 जी जैसा घोटाला अगर हुआ ही नहीं था तो इसका मतलब पिछली सरकार 'सच्ची' और 'पवित्र' थी! थी न...!

ओह! बड़ा ही विकट कंफ्यूजन है पियारे! जो दिख रहा है वो है नहीं। जो है वो हम देख नहीं पा रहे हैं। दिमाग है कि लोड ले लेके ट्रक बना पड़ा है।

राजनीति के खेल भी निराले हैं। यहां कब किस पल कौन-सा ऊंट किस करवट बैठ जाए कोई नहीं जानता।

फिलहाल तो शाश्वत सत्य यही है कि 2 जी जैसा घोटाला हुआ ही नहीं था!

मैंने तो अब तय कर लिया है कि कभी किसी नेता-मंत्री को घोटाले में नाम पर बुरा-भला कहूंगा ही नहीं! यह मानकर चलूंगा कि अगले के खिलाफ 'पॉलिटिकल साजिश' रची जा रही है! भ्रष्टाचार देश से जाने कब का विदा ले चुका है। यह सत-युग है। यहां हर कोई सच बोलता है। सच के अतिरिक्त कुछ बोलता ही नहीं।

और हां यह बात मैं पूरे होशोहवास में लिख रहा हूं कि मैं 'वाटरगेट' से लेकर 'व्यापम' तक हर घोटाले को भूल चुका हूं। बल्कि अपने दिमाग की डिक्शनरी में से 'घोटाले' और 'भ्रष्टाचार' जैसे शब्दों को ही निकाल बाहर फेंका है। न होगा सांप न लाठी टूटेगी।

देश, समाज, संसार में सब भले हैं! न कोई भ्रष्टाचारी है न घोटालेबाज! मैं तो कहता हूं कि हमें घोटाले की परिभाषा ही बदल देनी चाहिए। इसे 'घोटाले जैसा कुछ होता ही नहीं' कर देना चाहिए। सच कह रहा हूं, ऐसा कर देने और मान लेने से देश की अदालतों और जजों पर से बहुत बड़ा बोझ उतर जाएगा। नेता, मंत्री और राजनीति के प्रति लोगों का सम्मान बढ़ेगा सो अलग!

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

एक न हुए घोटाले की पटकथा

घोटाला अदृश्य होता है। किसी को होता हुआ कभी दिखाई नहीं देता। सब हवा में तीर छोड़ते रहते हैं कि फलां घोटाला हुआ, फलां नेता-मंत्री दोषी है। अपने मन के वहम को कभी इस पर तो कभी उस पर थोपते देते हैं।

देखिए, सच्चाई आ गई न सामने। जज साहेब ने स्पष्ट कह दिया, 2 जी घोटाले जैसा कुछ हुआ ही नहीं। जब कुछ हुआ ही नहीं तो दोषी भी किसी को क्यों माना जाए। सो सभी कथित आरोपियों को छोड़ दिया गया। लेकिन बेचारों को इतने साल बदनामी का जो घूंट पीकर रहना पड़ा, उसका क्या! खामखां मीडिया और जनता के बीच इतनी किरकिरी हुई सो अलग। चलिए खैर न्याय तो मिला, यही बहुत है।

उधर विपक्ष चौड़ा हुआ घूम रहा है तो इधर सरकार के मंत्री सफाई दे देकर परेशान हैं। कौन सही है, कौन गलत। यह समझ पाना उतना ही कठिन है, जितना बीवी के मन की बात तो पढ़ पाना। दोनों तरफ से शाब्दिक घमासान जारी है। 'तू डाल डाल, मैं पात पात', वाला हाई-वोल्टेज ड्रामा चल रहा है।

मीडिया खुश है। उसे एक और मसालेदार मसला हाथ आ गया। खबरिया चैनलों पर बहसों का दौर जारी है। हर पार्टी का प्रवक्ता अपने नेता को बचाने में लगा है। वो तो प्रवक्तागण दूर-दूर बैठते हैं, आस-पास बैठें तो जूतम-पैजार चैनलों पर ही चालू हो जाए। 2 जी पर दोनों ओर से इतना-इतना ज्ञान एक-दूसरे को बांटा जा रहा है कि अगर घोटालों पर शोध करने वाला शोधार्थी देख-सुन ले तो उसे भरपूर सामग्री मिल जाए।

बता दूं, सबसे अधिक दिलचस्प और शोधपरक घोटाले अपने ही देश में हुए हैं। चाहे तो घोटालों से जुड़े इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए। बड़ा या छोटा घोटाला करने के बाद भी कभी नेता, मंत्री या अफसर की शक्ल देखकर लगेगा ही नहीं कि अगले ने कोई भ्रष्टाचार किया भी होगा। हमेशा की तरह अल-मस्त घुमता हुआ ही दिखाई पड़ता है।

घोटाले का कॉन्सेप्ट हमारे दिलोदिमाग में ऐसा रच-बस गया है कि बहुत दिनों तक जब किसी विभाग से घोटाले की कोई खबर सुनने में नहीं आती तो शक-सा होने लगता है कि देश की राजनीति में क्या सतयुग लौट आया है? क्या भ्रष्टाचार कहीं हो ही नहीं रहा?

हालांकि राजनीति में कदम रखने से पहले नेता-मंत्री लोग कसम भ्रष्टाचार को न करने की ही खाते हैं पर क्या कीजिएगा जब खुद पर कंट्रोल कर पाना मुश्किल हो जाए!

घोटाला है ही इतनी लाजवाब चीज कि न चाहते हुए भी हो ही जाता है।
मुझे तो रह-रहकर अब अफसोस हो रहा है कि पिछले दिनों मैंने कितना कुछ 2 जी के बहाने नेताओं-मंत्रियों के खिलाफ लिख डाला था। जबकि वे तो बहते नाले में गंगा की तरह पवित्र निकले! सब के सब दूध के धुले! हाय! ये कैसा पाप कर डाला मैंने।

अब तो मैंने उन तमाम खबरों को सिरे से नकारना शुरू कर दिया है, जिनमें घोटालों का जिक्र रहता है। जब घोटाला कुछ होता ही नहीं तो क्यों खाली-पीली मैं इस या उस नेता-मंत्री को गरियाऊं!

घोटाले अदृश्य व पवित्र होते हैं। इनको करने से कभी किसी तरह का कोई पाप नहीं लगता। किस्म-किस्म के घोटालों के बीच रहकर भी भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकती है। बल्कि यह कहूं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी कि भ्रष्टाचार पर जितनी लगाम हमारे देश में कसी जाती है, अन्यत्र कहीं नहीं। देश का प्रत्येक नेता चुनाव प्रचार के दौरान और सरकार बन जाने के बाद सबसे पहले भ्रष्टाचार को खत्म करने का ही प्रण लेता है। घोटालेबाजों को तुरंत जेल में डालने का आश्वासन जनता को देता है। ये बात और है कि कुर्सी पर बैठ जाने के बाद नेता की मसरूफियत बढ़ जाती है। पर उसकी सरकार में घोटाले न हों इसके वास्ते वो हमेशा तत्पर रहता है।

फिर भी, देश में एकाध घोटालेबाज तो रहना ही चाहिए ताकि न्याय-व्यवस्था अपना काम कर सके। उसको कड़ी सजा देकर जनता के समक्ष एक नजीर पेश कर सके। हालांकि एक अदृश्य सी चीज को पकड़पाना इतना आसान नहीं होता तब भी न्याय-प्रिय लोग लगे ही रहते हैं।

चलिए खैर यह अच्छा ही रहा कि 2 जी बे-दाग निकला। पूर्व सरकार के कथित दागी मंत्री पवित्र निकले। न्याय पर लोगों की आस्था और मजबूत हुई। कई एंवई उछाले गए जुमले खोखले साबित हुए। हालांकि कुछ की इज्जत की बे-इज्जती जरूर हुई। पर ये गम भी जल्द ही भर जाएगा।
मामला चाहे कोई हो पर विश्वास रखिए जीत हमेशा सत्य की ही होती है। जैसा- 2 जी मसले में हुआ। आइए हम सब मिलकर सत्य की इस जीत का जश्न मनाएं। और हां घोटाले कुछ नहीं होते, इस बात को हमेशा के लिए अपने जहन में रखें।

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

डिजिटल बदनामियां

इस भीषण डिजिटल जमाने में आप पर हर पल निगाह रखने वालो की कमी नहीं। किसी न किसी बहाने वो आप की हर बात जानने को उत्सुक यों रहते हैं मानो उनका आप पर कोई किताब लिखने का विचार हो! तमाम ऐसे किस्से भी सामने आए हैं कि जब किसी को किसी की जासूसी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। डिजिटल युग में जासूसी कोई खास बड़ा मुद्दा न रही अब। हैकर्स की तो रोजी-रोटी ही इस पर टिक कर चला करती है। कई हैकर्स ने तो सेलिब्रिटियों के ट्विटर, फेसबुक एकाउंट कहकर हैक किए हैं। इतिहास के पन्नों में जा चुकी खबरें इस बात की गवाह हैं।

हालांकि मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं फिर भी कोशिश मेरी यही रहती है कि मैं अपने सोशल मीडिया से जुड़े एकाउंट्स को बचाए रखूं। कुछ ऐसा न लिखूं कि अगला मेरे एकाउंट पर गिद्ध दृष्टि डालकर बैठ जाए। यहां पर न्यूट्रल बने रहने में ही फायदा है। न काऊ से दोस्ती न काऊ से बैर।

मैं यह भी बहुत अच्छी तरह से जानता हूं कि खुदा-न-खास्ता मेरा एकाउंट अगर हैक होता भी है तो मुझे बदनामी जो मिलनी है सो तो मिलेगी ही पर नाम भी बहुत होगा। रातभर में मैं सेलिब्रिटी टाइप बन जाऊंगा। न केवल इंडियन बल्कि विदेशी मीडिया भी मुझे हाथों-हाथ लेगा। ट्विटर और फेसबुक पर मैं ट्रोल किया जाऊंगा। डिजिटल युग में सोशल बदनामी से मिला नाम ऊंची हैसियत रखता है।

ऐसे जाने कितने ही नाम जिन्हें कल तक कोई न जानता था न पहचानता- एक दफा वे सोशल मीडिया में बदनाम क्या हुए, रात भर में बादशाह बन गए। बच्चा-बच्चा तक उनके नाम और काम से यों परिचित हो गया मानो- उन्होंने कोई ऊंची रिसर्च की हो! कई बदनाम नाम आज राजनीति में अपना सिक्का जमाकर चला रहे हैं।

उनकी कथित बदनामियों को देखकर कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है जरा-बहुत यहां मैं भी बदनाम हो लूं। क्या जाता है? बाकी जो होगा सो होगा ही पर डिजिटल वर्ल्ड में नाम तो पा ही जाऊंगा। दुनिया में नाम का ही खेल है सारा। जिसका नाम है उसी के ठाठ हैं। ये इज्जत और आदर्शवाद सब बेकार की किताबी बातें हैं। जिनसे न फेम मिलना है नेम।

रही बात दुनिया की तो उसी फिक्र ही कौन करता है। यों भी, ये दुनिया कौन-सी दूध की धुली है! उसके गिरेबान में भी हजार दाग लगे पड़े हैं। ईमानदार और नेक लोगों के साथ इसने क्या किया, बताने की आवश्यकता नहीं। दुनिया से तो वो डरे जिसे इसकी गुलामी पसंद हो।
ये तय तो कर ही लिया है मैंने कि सोशल वर्ल्ड में एक बार बदनाम तो जरूर होना है मुझे। हर चीज का अनुभव लेना चाहिए। जहां इतने बरस इज्जत का मजा लिया अब थोड़ी बदनामी का लुत्फ भी ले लेंगे, क्या चला जाएगा। हो सकता है, किस्मत का सितारा यहीं से चमक जाए। अच्छे दिन आते देर ही कितनी लगती है।

बदनामी के रास्ते मिला नाम अब लोगों की इज्जत का सिंबल बन चुका है। उन्हें पूजा जाने लगा है। उनके चाहने वाले बड़े ध्यान से उन्हें सुनते हैं। मौके का फायदा उठाने में कोई हर्ज नहीं। कोशिश बस यही होनी चाहिए कि डिजिटल बदनामी जीवन में फेम लेकर आए। ठीक है न...!