रविवार, 13 अगस्त 2017

दुनिया मुठ्ठी में

कई साल पहले की बात है। देश की एक आला कंपनी ने देशवासियों को कर लो दुनिया मुठ्ठी में का मंत्र दिया था। मंत्र को हमने न केवल स-हृदय स्वीकारा बल्कि स्वागत भी किया। फिर तो देश के प्रत्येक आमो-खास की मुठ्ठी में एक बे-तार का यंत्र नजर आने लगा। आलम यह था- जिस ओर निगाह दौड़ा दो, उस ओर कर लो दुनिया मुठ्ठी में के इश्तिहारों से दीवारें पटी पड़ी रहती थीं। बे-तार के उस यंत्र पर हम इस कदर ‘मोहित’ थे कि मोहल्ले के नुक्कड़ और गांव-देहात की चौपाल पर उसी की धुनें और चर्चाएं छाई रहती थीं।

सही मायनों में मोबाइल फोन के प्रति हमारे भीषण आकर्षण या कहें दीवानगी की शुरुआत यहीं से हुई थी।

करो लो दुनिया मुठ्ठी में से शुरू हुआ सफर फिलहाल फ्री-हैंडसेट पर आकर टिका है। लेकिन यह अंत नहीं है। अंत हो भी नहीं सकता क्योंकि इंसान की खोपड़ी हर पल कुछ न कुछ नया और अद्भूत इस दिशा में ला रही है। देश में बाकी क्रांतियां का तो नहीं मालूम हां मगर ‘डिजिल-क्रांति’ बहुत तेजी चल रही है। हर घर का तो छोड़िए हर व्यक्ति के हाथ में एक-दो मोबाइल फोन मिल जाना अब सामान्य-सी बात है।

अपने काम-धंधों के बाद लोग कहीं और अगर व्यस्त रहते हैं तो अपने-अपने मोबाइल फोनों में ही। टच-स्क्रीन पर ऊंगलियां हर वक्त कुछ न कुछ या तो खोजती रहती हैं या फिर मैसेजिस लिखती रहती हैं। दीवानगी का आलम यह है कि राह चलते हुए भी लोगों ने अब निगाहें ऊपर कर चलना छोड़ दिया है। फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप हमारी जिंदगी के वो जरूरी हिस्से बन चुके हैं कि अब अपनों को इग्नोर करते जाना हमारी आदत में शामिल हो गया है। हममें से बहुत लोगों को शायद इसका गम न हो। रिश्ते ही तो हैं।

हाल में, नहले पे दहला जियो ने अपने हैंडसैट को आंशिक फ्री कर दीवानगी का एक औ झुनझुना हमें थमा दिया है। मुफ्त डाटा बांटने की होड़ तो चल ही रही थी कंपनियों के बीच अब शायद मुफ्त के हैंडसेट बांटने का अभियान भी चल निकले।

जो हो पर ग्राहक सर से लेकर पैर तक फायदे ही फायदे में है। कभी ऐसा समय भी था जब मात्र ‘हैलो’ कहने के ही दस रुपए झट्ट से कट जाया करते थे। अब वो समय है कि लोग एक-दूसरे से घंटों वीडियो चैट कर लेते हैं वो भी बहुत ही मामूली खर्चे में।

दुनिया जितनी तेजी के साथ डिजिटल हो रही है, उतनी ही तेजी से इंसानों के बीच नजदीकियां बिखर रही हैं। महीनों गुजर जाते हैं हमें एक-दूसरे से मिले या शक्लें देखे हुए। तो क्या...। मुफ्त का हैंडसेट और पर-डे वन जीबी डेटा है न दूरियों को नजदीकियों में बदलने के लिए!

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

निफ्टी, तुम्हें अभी बहुत ऊपर जाना है

मैं सेंसेक्स और निफ्टी दोनों का समान प्रसंशक हूं। यह बात सही है कि मैंने जिस प्रखरता के साथ सेंसेक्स पर लिखा, उतना निफ्टी पर नहीं लिख पाया। निफ्टी पर न लिखने के पीछे किसी प्रकार का किंतु-परंतु नहीं है। पर इससे मेरा निफ्टी के प्रति स्नेह कम नहीं हो जाता। मेरा बचपन से मानना रहा है कि स्टॉक मार्केट में जितना ‘पोटेंशल’ सेंसेक्स का है, निफ्टी का भी कम नहीं।

तमाम बाधाओं को दुलत्ती मार निफ्टी ने जिस वीरता के साथ दस हजार के पहाड़ को पार किया है, वाकई, काबिले-तारीफ है। निफ्टी ने न केवल स्टॉक मार्केट, दलाल स्ट्रीट का मान बढ़ाया है अपितु अपने निवेशकों के दिलों में भी महत्तवपूर्ण जगह बनाई है। वरना, तो अब तलक हर जीत पर सेंसेक्स के ही ‘जयकारे’ लगा करते थे। उसे ही ‘बधाईयां’ दी जाती थीं।

देखा जाए तो स्टॉक मार्केट में सेंसेक्स के मुकाबले निफ्टी का सफर भी इतना आसान नहीं रहा। न जाने कितनी दफा वो सेंसेक्स की भारी-भरकम गिरावटों के बीच दबी-कुचली गई। खूब ध्यान है, आज से कोई 18-19 साल पहले निफ्टी 800-900 के बीच झूलती रहा करती थी। जहां कोई निगेटिव खबर आई नहीं कि निफ्टी सिकुड़कर और छोटी हो जाती थी। हालांकि ऐसी ही चोटें सेंसेक्स ने भी खूब खाईं हैं। पर वजन में वजनदार होने के नाते सेंसेक्स फिर भी झेल जाता था।

बावजूद तमाम दबावों के संघर्ष दोनों करते रहे। संघर्ष का सुफल आज हमारे सामने है।

मेरे लिए निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही न केवल ‘वंदनीय’ बल्कि ‘प्रेरणास्पद’ भी हैं। जीवन में मुझे जब भी प्रेरणा लेने की आवश्यकता महसूस होती है, मैं किसी महा या सिद्धपुरुष से नहीं बल्कि निफ्टी से लेता हूं। निफ्टी ने मुझे एक बहुत ही छोटे लेबल से ठीक-ठाक ऊंचाई पर जाने का मार्ग बताया-दिखाया है।

ध्यान रहे, दस हजार का आंकड़ा निफ्टी के लिए आदि-अंत नहीं है। हालांकि मार्केट में तो चर्चे पंद्रहा से बीस हजार तक जाने के भी हैं। ये तो खैर जितने मुंह उतनी बातें वाला हिसाब-किताब है। मगर सच यही है कि अभी निफ्टी को बहुत ऊपर बहुत ही ऊपर जाना है। देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेशकों के पोर्ट-फोलियों में भी चांद-सितारें लगाने हैं। दुनिया को यह बता देना है कि मुकाबले में निफ्टी भी किसी से कम नहीं।

बहरहाल, उस लेबल तक पहुंचने के लिए निफ्टी को मेरी अग्रिम शुभकामनाएं रहेंगी।

रविवार, 6 अगस्त 2017

यारी-दोस्ती की टशनबाजियां

दोस्तों की किल्लत मुझे बचपन से कभी नहीं रही। लाइफ में एक से बढ़कर एक दोस्त बनाए। जमकर दोस्तबाजियां कीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों की दोस्तियों ने नए मुकाम हासिल किए। मोहल्ले में मैं पतंगबाजी के लिए तो खासा बदनाम था ही, नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ मजमा लगाने के चर्चे भी कम न थे। इस बाबत जाने कितनी दफा मुझे मोहल्ले से बरखास्त किए जाने की चालें चली गईं। मगर मैं न माना। यारबाशियों का दौर यों ही चलता रहा।

मगर हां यारी-दोस्त में इस बात का मैंने खास ख्याल रखा कि कोई भी पढ़ा-लिखा या बुद्धिजीवि टाइप का दोस्त न बने। हालांकि काबिल लौंडों की तरफ से कोशिशें तो बहुत हुईं मुझसे दोस्ती गांठने की किंतु मैंने ही कभी भाव न दिया। वो क्या है, पढ़े-लिखे या काबिल लौंडों से दोस्ती करने के अपने लफड़े हैं। वो या तो हमेशा पढ़ाई-लिखाई की बातें करेंगे या फिर दुनिया-जहान का ज्ञान बांटेंगे। फिल्म, रोमांस, पतंगबाजी, गुल्ली-डंडा, आवारागिर्दी का चेप्टर न उनकी लाइफ में होते हैं न किताबों में। ऐसी महान आत्माओं से मैं दोस्ती के पेच लड़ाना नहीं चाहता, जहां दोस्तीबाजी में मस्तियां- बदमाशियां न हों।

दोस्त ऐसे हों जिनके साथ आप जिंदगी का हर आनंद उठा सकें। जिंदगी के वो पाठ जो आप किताबें पढ़कर न जान पाए, दोस्त लोग हंसते-खेलते सीखा दें। किस्म-किस्म की बदमाशियां दोस्ती की पहली निशानी होती हैं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि जरूरत के वक्त पढ़े-लिखे दोस्तों से कहीं ज्यादा काम बदमाश (बिंदास) टाइप दोस्त आते हैं। पढ़ा-लिखा दोस्त हर मसले में दिमाग पर लोड लेने लगता है। मगर बिंदास दोस्त ‘भाई तू चिंता न कर। जो होगा देखा जाएगा’ कहकर दिली-हौसला बढ़ा देता है।

खूब ध्यान है, स्कूल-कॉलेज में ऐसे कितने ही विकट वाले सीन बने पर बचाया हमेशा बिंदास दोस्तों ने ही। इंटीलेक्चूअल किस्म के दोस्त तो दूर बैठे तमाशा देखते रहे। बाद में जब मिले तो ऊंची-ऊंची नसीहतें और दे गए। नसीहतों से जिंदगी कभी चली है भला। वो तो खुदा का शुक्र रहा कि मैंने कभी पढ़े-लिखे लौंडों की नसीहतों को दिलो-दिमाग पर नहीं लिया। नहीं तो किसी भी सूरत में मैं आज लेखक नहीं बन पाता। मेरे लेखक बनने में मेरे बिगड़ैल टाइप दोस्तों का बहुत बड़ा हाथ है।

न न चौंकिए नहीं। यह हकीकत है। बचपन में- जितना भी बिगड़ैल किस्म का साहित्य मिला उन्हीं दोस्तों की मदद से सब पढ़ डाला। जब ढंग से अक्ल आई भी न थी, तब ही खुशवंत सिंह की चार-पांच किताबें पढ़कर चट्ट कर चुका था। कहने को वो सड़क किनारे बिकने वाला अश्लील या लुगदी किस्म का (काबिल लोगों की नजर में) साहित्य था पर आज भी उन लेखकों की तूती प्रगतिशील या जनवादी लेखकों-साहित्यकारों से कहीं ज्यादा बोलती है। उनसे कहीं अधिक रॉयल्टी पाते हैं। बेस्ट-सेलर हैं। आज भी जमकर पढ़े जाते हैं।

अपना तो शुरू से मानना रहा है कि लेखक बनने के लिए बदमाश और बिंदास टाइप दोस्तों का साथ बेहद जरूरी है। लाइफ का लेसन तो वे ही लोग ढंग से बता पाते हैं। डर को भीतर से बाहर निकाल फेंकने का माआदा रखते हैं।

मगर आजकल की दोस्तियां और दोस्त हमारे बचपन से काफी अलग हैं। अब दोस्तियां ‘जमीनी’ कम ‘डिजिटल’ ज्यादा हैं। दोस्तियां फेसबुक पर गढ़ी जाती हैं। उस बंदे को सम्मान की निगाह से देखा जाता है, जिसकी फ्रेंड-लिस्ट की संख्या चार-पांच हजार के पार निकल चुकी हो। अगला यह कहते फुला नहीं समाता कि आज उसने फेसबुक पर दस-पचास दोस्त बनाए या बीस-पच्चीस को फ्रेंड रिक्यूस्ट भेजी।

डिजिटल दोस्ती का सबसे बड़ा लुत्फ यह है कि आड़े वक्त में ये दोस्तियां पता नहीं किस कुंए में मुंह छिपाए आराम फरमाती रहती हैं। यहां इन-बॉक्स में आकर लंबी-चौड़ी बातें हांकने वाले तो खूब टकराते हैं किंतु साथ में मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पिलाने या गली में गुल्ली-डंडा खेलने वाला कोई नहीं मिलता। आमने-सामने दोस्तों की शक्लें देखे या आवाज सुने ही महीनों-सालों बीत जाते हैं। डिजिटल समय में दोस्त-दोस्तियां औपचारिक-सी होती जा रही हैं।

फिर भी, मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने अब भी वही दोस्त हैं, जिनके साथ बचपन और जवानी किस्म-किस्म की शरारतों और बदमाशियों के साथ गुजरी। मौका मिलता है तो हम आज भी अपने उसी पुराने दौर में लौट जाते हैं। जरा-बहुत सही मन तो ‘बहल’ ही जाता है।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

माफ कीजिएगा, मेरे घर में टमाटर नहीं है

क्या आपके घर में टमाटर है?

यह प्रश्न आजकल मुझे इतना ‘असहज’ किए हुए है कि मैं रातों को सो नहीं पा रहा। निगाहें हर वक्त दरवाजे की देहरे पर टिकी रहती हैं कि कहीं कोई पड़ोसी या रिश्तेदार टमाटर मांगने न आ धमके। आलम यह है कि दफ्तर भी न के बराबर ही जा पा रहा हूं। वहां भी यही डर सताता रहता है कि कोई कुलीग टमाटर की डिमांड न कर दे।

पत्नी को सख्त हिदायत दे रखी है कि मेरी सब्जी में टमाटर का एक छिलका भी नहीं दिखना चाहिए। इस मुद्दे पर कई दफा पत्नी से ‘मुंहजोरी’ हो चुकी है। जो न कहना चाहिए वो सबकुछ वो मेरे बारे में कह चुकी है। इक टमाटर की खातिर वो मुझे दुनिया का सबसे ‘कंजूस पति’ तक मोहल्ले में ‘घोषित’ कर चुकी है। मगर कोई नहीं...। सब मंजूर है। टमाटर की खातिर मैं अपना ‘अपमान’ सहने को ‘स-हर्ष’ तैयार हूं। लेकिन मैंने भी ‘प्रण’ कर रखा है कि चाहे जो हो जाए घर में टमाटर खरीदकर नहीं लाऊंगा तो नहीं ही लाऊंगा।

मानता हूं, टमाटर खाने के तमाम लाभ हैं। टमाटर सलाद की शान है। टमाटर गोरे लाल गालों की खूबसूरत पहचान है। किंतु सिर्फ सेहत की शान की खातिर इतने महंगे टमाटर को खरीदना- मेरी निगाह में- फिजूलखर्ची ही नहीं बल्कि अव्वल दर्जे की मूर्खता है। माफ कीजिएगा, मैं ऐसी मूर्खता करने के पक्ष में कतई नहीं हूं।

यह तो टमाटर की बात रही। ऐसा मैंने तब भी किया था, जब पिछले दिनों दाल और प्याज की बढ़ी कीमतों ने आंखों में पानी ला दिया था। तब भी पत्नी मेरे सिर को आ गई थी। न केवल मोहल्ले बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच कंजूस कहकर मेरी ‘खिल्ली’ उड़ाई गई थी फिर भी मैंने न दाल खरीदी न ही प्याज। हां, काफी दिनों तलक खाना बे-स्वाद टाइप ही रहा। पत्नी ने घर में खाना बनाना न के बराबर कर दिया। मगर मैं न हारा। दाल और प्याज से समानांतर लड़कर मैंने दिखा दिया- महंगाई के आगे समझौता न करने में ही जीत है।

बात बहुत सिंपल-सी है। किंतु हम समझना नहीं चाहते। थोड़े दिनों के लिए अगर हम टमाटर नहीं खाएंगे तो कौन-सा चीन बुरा मान जाएगा? या सब्जीवाला हमें लौकी देने से मना कर देगा? या बॉस दफ्तर से बाहर कर देगा? न जी न। ऐसा कुछ नहीं होगा। दुनिया अपने ठिए पर यों ही चलती रहेगी। चाहे आप टमाटर खाओ या न खाओ। डिसाइड तो हमें करना है कि हमारी जेब टमाटर खाना अलाऊ करती है या लौकी-तुरर्ई।

वैसे, पूरी कोशिश में हूं कि टमाटर की दहशत से खुद को बचाकर रख सकूं। लेकिन फिर भी मुंह के आगे कोई अगर पड़कर मुझसे टमाटर मांग भी लेता है तो मैं दोनों हाथ जोड़कर उससे इतना भर कह देता हूं- माफ कीजिएगा शिरिमानजी, मेरे घर में टमाटर नहीं है।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

बुद्धिजीवि होने के खतरे

मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता जरूर हूं मगर खुद बुद्धिजीवि नहीं हूं। उनसे हमेशा दस-बीस कदम की दूरी रखता हूं। उन्होंने कई दफा कोशिश की कि मैं उनकी बुद्धिजीवि मंडली में शामिल होकर उन जैसा बन जाऊं लेकिन हर दफा मैंने खुद को उनसे बचाया ही लिया। साफ शब्दों में उनसे कह दिया- मुझे बुद्धिजीवि बनने का तो शौक है कोई हसरत। बुद्धिजीवियों जैसी ऐलीट टाइप जिंदगी मैं नहीं जीना चाहता।

हालांकि बुद्धिजीवि होना बड़ा 'साहस' का काम है। मगर साथ ही उसके 'खतरे' भी हैं। साहस और खतरों से मैंने हमेशा बचने की कोशिश की है। बुद्धिजीवि 'शाब्दिक लफ्फबाज़ी' में बेहद सहासी होता है। अपने नेताओं को ही देख लो। मैं देश के प्रत्येक नेता को बुद्धिजीवि मानता हूं! नेताओं की कथनी-करनी में अंतर होने के बावजूद उनमें इतना साहस होता है, जिसके बल पर वो सत्ता में पांच साल तक आराम से टिके रहते हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि नेता नोट और वोट से चुनाव जीतते हैं, मगर मेरा इसपिछड़ी मान्यता’ में कतई विश्वास नहीं। नेता केवलबुद्धि’ के बल पर ही चुनाव जीतते हैं। जनता को रिझाने के लिए किसी नोट या वोट की नहीं सिर्फ बुद्धि की आवश्यकता होती है। किस जरूरी मुद्दे पर जनता को अपनी ओर खींचना है। कैसे उनमें अपने प्रति विश्वास को जीवित रखना है। कैसे उनकी रोटी खाकर उनके झोपड़े में सोना है। इस सब 'त्याग' के लिए बुद्धि की ही जरूरत पड़ती है, नोट की नहीं।

अगर आप बुद्धिजीवि हैं तो वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। आतंकवाद, भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ, खेती-किसानी जैसे मुद्दों पर सेमिनारों में जाकर खुलकर वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजियां करें, कोई आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं, क्योंकि आप बुद्धिजीवि हैं। बुद्धिजीवि बनकर आप कैसे भी वैचारिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि खतरों पर 'सिर्फ चिंता' व्यक्त कर सकते हैं। ध्यान रखें, बुद्धिजीवि कभी सड़कों पर नहीं निकलते। वे ठंडे कमरों में बैठकर ही गर्म योजनाएं बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। 

दूसरी तरफ, हमारे साहित्यकार राजनीतिक बुद्धिजीवियों से दो-चार कदम हमेशा आगे रहते हैं। नेता चाहे जितना बड़ा या छोटा हो पांच साल में एक बार जनता के बीच उसे जाना ही होता है, वोट मांगने। लेकिन साहित्यकार पांच साल तो क्या पचास साल में एक बार भी जनता के बीच जाना पसंद नहीं करता। बात भी सही है, साहित्यकार जनता के बीच क्यों जाए! जनता शायद जानती नहीं कि साहित्यकारों को सामाजिक जनहितैषी मुद्दों को उठाने के लिए किस कदर 'वैचारिक जमा-खर्च' करना पड़ता है। इस काम में बुद्धि तो खर्च होती ही है ! आखिर वे वैचारिक बुद्धिजीवि जो ठहरे। जनता अपनी फिक्र खुद करे। उनकी समस्यों से किसी साहित्यिक बुद्धिजीवि का भला क्या लेना-देना?

इसीलिए मैं हर दम यही गुज़ारिश अपने तमाम पाठकों-मित्रों से करता रहता हूं कि मुझे न 'बुद्धिजीवि' समझें, मानें।


मैं 'साधारण व्यक्ति' के तौर पर ही रहना और मरना चाहता हूं। बुद्धिजीवि बनकर कैसा भी 'पाप' मैं अपने सिर नहीं लेना चाहता। बुद्धिजीवि होना कितना ख़तरनाक है, इसे नेताओं-साहित्यकारों से बेहतर भला कौन जान-समझ सकता है!

सोमवार, 31 जुलाई 2017

अच्छे दिनों में सेंसेक्स

सेंसेक्स प्रसन्न है। सेंसेक्स के आंगन में बहार लौट रही है। सेंसेक्स की मजबूती का सहारा पाकर अर्थव्यवस्था भी चहकने के मूड में दिखती है।

दलाल पथ पर भी चहल-पहल पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। वहां से गुजरता हर शख्स एक नजर उठाकर सेंसेक्स के बोर्ड पर जरूर डालता है ताकि बढ़त का भरोसा कायम रह सके। स्टॉक मार्केट में भरोसा बड़ी चीज है। भरोसा और उम्मीद के दम पर ही तो निवेशक शेयर बाजार के समंदर में निरंतर गोते लगाते दिख जाते हैं। हालांकि कड़वा सच तो यही है कि इस समंदर में जो एक दफा डूबा फिर बचकर बाहर न आ पाया फिर भी ऐसा कभी हुआ है कि राह से गुजरने वाला शराबी मैखाने का पता न पूछे।

कहने वाले कह रहे हैं कि सेंसेक्स के चेहरे पर प्रसन्नता की असली वजह जीएसटी का लागू होना है। जीएसटी सेंसेक्स के लिए रामबाण साबित हुई है। असर देखिए कि निफ्टी दस हजार के पार निकल चुकी है। और, सेंसेक्स का टारगेट पचास हजार का आ रहा है।

हालांकि ये सब खबरें हैं। खबरें अफवाह बनकर अपना थोड़ा-बहुत असर तो दिखाती ही हैं। खबरें तो तब ये भी आईं थीं- जब चांदी ने पिचत्तर हजार का आंकड़ा पार किया था- कि अब इसे एक लाख होने से कोई नहीं रोक सकता। बाद में फिर क्या हुआ जग-जाहिर। वैसे, सट्टाबाजार को चलाने में खबरें बड़ी मारक भूमिका निभाती हैं। मामला पल में अर्श पर, पल में फर्श पर टाइप हो जाता है।

मगर सेंसेक्स की इस बार की बढ़त कुछ कहती है। ऐसा लगता है, आम आदमी से कहीं ज्यादा प्रोजीटिव मोड में सेंसेक्स ने जीएसटी को लिया है। पूरे हिंदुस्तान भर में एक सेंसेक्स ही है जिसे जीएसटी पूरा समझ आया है। वरना, हम जैसे कु-पढ़ तो जीएसटी का ‘जी’ ही समझ-समझ कर हार गए।

चलिए खैर कोई नहीं। इंसान को न सही एक निर्जिव को ही जीएसटी के अर्थ-मायने समझ आ गए। बड़ी बात है। सेंसेक्स के चेहरे पर बनी खुशी का लाभ इंसानों को भी मिले असली बात तो तब है। वरना, ये तो अपनी ढपली, अपना राग टाइप मामला बैठेगा।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

आइए, प्रेमचंद को याद किया जाए

मेरी आदत है। हर रोज मैं किसी न किसी लेखक-साहित्यकार को याद कर लेता हूं। याद करने में कोई बुराई नहीं। दिल का दिल बहल जाता है। लेखक-साहित्यकार भी प्रसन्न हो लेते हैं। कि, इस भीषण डिजिटल समय में किसी ने हमें याद तो किया। यों, ईश्वर, खुदा, गॉड को तो हम 24X7 याद करते ही रहते हैं।

आज सुबह से थोड़ी दुविधा में था। समझ नहीं पा रहा था। किस महान साहित्यकार को याद किया जाए। जिन बड़े साहित्यकारों के नाम मानस-पटल पर तैर रहे थे, उन सबको पहले ही याद कर चुका था। याद करने का मेरा एक उसूल है। मैं उन लेखकों-साहित्यकारों को दोबारा याद नहीं करता, जिन्हें पहले याद कर लिया गया है। सबको बराबर का सम्मान मिलना चाहिए। चिटिंग नहीं।

टाइम गुजरा जा रहा था। किंतु कोई ऊंचा नाम दिमाग नहीं घुस रहा था। खैर, मैंने अपने दिमाग को कुछ देर के लिए शांत और अकेला छोड़ दिया। अन्य कामों में व्यस्त हो गया। तभी अचानक से मशहूर कहानीकार प्रेमचंद का ध्यान हो आया। जुलाई अंत में प्रेमचंद हमें यों भी ध्यान आ ही जाते हैं। बिना देरी किए मैंने अपने ध्यान को तुरंत प्रेमचंद की याद में तब्दील कर दिया। और प्रेमचंद को याद करने बैठ गया।

बचपन से लेकर अब तक जितनी भी प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ा या उनके बारे में जाना-समझा धीरे-धीरे कर सब याद आता चला गया। प्रेमचंद पर छिड़ी तमाम साहित्यिक बहसें याद आईं। अखबारों-पत्रिकाओं के प्रेमचंद अंक/विशेषांक याद आए। बीच-बीच में प्रेमचंद पर लिखा खुद का भी याद कर लिया। उन्हें भी याद किया जो प्रेमचंद के धुर विरोध रहे। हर वक्त इसी बात का रोना रोते रहे कि प्रेमचंद का साहित्य दलितों के प्रति अनुकंपा भरा रहा। प्रेमचंद का साहित्य सवर्ण लॉबी को बिलोंग करता था। आदि-इत्यादि।

प्रेमचंद को याद करने का सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक ऐसा महसूस टाइप हुआ कि कान में कोई बोला- मैं प्रेमचंद। याद करने के बीच कोई टोक-टाक दे तो बड़ी खीझ होती है। खैर, मैंने एवॉइड किया। होगा शरारती कोई। कुछ क्षण बाद वही आवाज पुनः कानों में गुंजी- मैं प्रेमचंद। अब तो टू मच हो गया था। गुस्सा सातवें आसमान पर। याद का ध्यान स्थागित कर आंखें खोलीं, देखा साक्षात प्रेमचंद सामने। भले ही आत्मा के तौर पर हों। आंखें खुली की खुली रह गईं। याद और ध्यान घुईयां के खेत में घुस गए।

इतने ऊंचे साहित्यकार को सामने पाकर भला किसके होश फाख्ता न होंगे। फॉमर्ल हुए बिना मैंने उनसे डाइरेक्ट पूछ लिया- ‘सर, आप यहां? वो भी मेरे सामने?’ प्रेमचंद थोड़ा मुस्कुराए। फिर बोले- ‘क्यों? मैं नहीं आ सकता यहां?’ मैंने कहा- ‘नहीं। नहीं। सर। आपका घर है। जब चाहें तब आएं। मुझेखुशी ही  होगी।‘

फिर हम दोनों के बीच बातचीत चल निकली। प्रेमचंद ने पूछा- ‘क्यों, मुझे याद कर रहे थे?’ मैंने कहा- ‘हां। आप ही को।‘ वे पुनः थोड़ा मुस्कुराए। बोले- ‘अच्छा है। यों भी, साहित्यिक और सभा-गोष्ठियों वाले मुझे मेरी जयंती पर ही याद किया करते हैं। याद भी क्या करते हैं। रस्म-अदायगी टाइप को जाती है मेरे नाम और काम को लेकर।‘

मैंने कहा- ‘सर, आपका साहित्य में नाम ही इतना बड़ा है कि हर याद आपके सामने बौनी है। जो आप रच गए वो अमिट और अनंत है।‘ चेहरे पर हल्की-सी गंभीरता लाते हुए प्रेमचंद ने कहा- ‘छोड़ो यार। सब बातें हैं। कुछ लोग मेरी जयंती पर मुझे इसीलिए भी याद कर लेते हैं ताकि उनकी साहित्यिक गोष्ठियों की दुकानें चलती रहें। चलो, मैं तो निपट लिया। इस बहाने तुम लोग मुझे याद कर लेते हो। किंतु, जो वरिष्ठ साहित्यकार अभी मौजूद हैं, उन्हें कितना याद किया जाता है? बताओ जरा।‘

कह तो प्रेमचंद सही रहे थे। याद करना तो महज अब रस्म-अदायगी ही है। ‘फिर भी, इस बहाने किसी को याद कर लेने में क्या बुराई है? आजकल लोगों के पास टाइम ही कहां है। खुद के बारे में ही सोच लें तो बहुत है।‘ यह कहकर मैंने मैंने प्रेमचंद को समझाने की कोशिश की।

उन्होंने हमारे द्वारा उन्हें याद करने को ज्यादा दिल पर तो नहीं लिया। मगर थोड़ा दुखी तो थे ही। उनका दुखी होना स्वभाविक था। लेकिन यह भी सच है कि आज सबकुछ ‘उनके समय’ जैसा तो नहीं हो सकता न।


नई-पुरानी तमाम बातें उनके साथ हुईं। टाइम अधिक हो चला था। अब उनके जाने का समय था। जाते-जाते वे इतना जरूर कह गए- ‘रस्मी ही सही तुम लोग मुझे याद कर रहे हो काफी है। मेरी याद को यों ही बनाए रखना आगे भी।‘

सोमवार, 10 जुलाई 2017

खामोश! तोता आजाद हो चुका है

तोता अब आजाद है। पूरी आजादी से अपने काम को अंजाम दे रहा है। तोते की आजादी बहुत लोगों को बेइंतहा खल रही है। रह-रहकर तमाम सवाल और आरोप तोते की आजादी पर वे लगा रहे हैं। अपने वक्त का हवाला दे रहे हैं। अपनी ईमानदारी पर सवाल खड़े करने वालों को आड़े हाथों ले रहे हैं। बयान दिए जा रहे हैं कि वर्तमान सरकार विकट द्वेष की भावना से काम कर रही है। चैन से जीने नहीं दे रही।

मगर तोता राजनीतिक बयानों और नेताओं की भपकियों से बेअसर अपने काम में व्यस्त है। दुम पर जब पैर रखा जाएगा तो अगला चीखेगा ही। सो, नेता लोग भी चीख-चाख मचाए हुए हैं।

कहिए कुछ भी, रस्सी के इतना जल जाने के बाद भी बलों का पड़ना कम नहीं हुआ है। बल्कि बल और भी ऐंठ गए हैं। अब ऐंठे या रूठें पर मजा निश्चित ही बहुत आ रहा होगा जनता को।

देखा है, पिछले कई सालों से घोटाले राजनीति और नेताओं के पूरक बन चुके थे। नेताओं के जहन में एक बेफिक्री-सी थी कि चाहे कितने ही घपले-घोटाले करते रहो न तोता कभी कुछ बोलेगा न सरकार के मालिकान सवाल पूछेंगे। जितना और जिस हद तक जनता को लूट सकते हो, लूट लो। न दूर न पास कहने-सुनने वाला कोई नहीं है। ज्यादा कुछ दवाब पड़ा तो चार-छह दिन हवालात की हवा खा थोड़ा और तंदुरुस्त हो लेंगे।

यह विडंबना क्या कम बड़ी है कि वे खुद को गरीब-गुरबों का मसीहा घोषित कर रहे हैं। मोह-माया से खुद को दूर बता रहे हैं। रेड को विरोधियों की साजिश करार दे रहे हैं। तिस पर भी प्रतिष्ठनों से इतना धन, इतनी बेनामी संपत्ति निकल कर बाहर आ रही है। क्या खालिस जन-नेताओं के ठाठ ऐसे ही होते हैं? कल तलक मामूली-सा दिखने वाला नेता कुछ ही सालों में लाखों-करोड़ों का मालिक बन बैठता है। किसी सरकारी या प्राइवेट नौकरी या व्यापार से कहीं ज्यादा पैसा और रूतबा तो नेता बनने में है। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।

जब ऊपर के भ्रष्टाचार और घोटालों के हाल ये हैं फिर नीचे वालों का क्या कहिए। वहां तो सरल लेन-देन के लिए टेबल है ही।

वैसे, दो का चार बनाने में जितनी तिकड़में चोर न भिड़ता होगा, उससे कहीं ज्यादा तो नेता लोग भिड़ा लेते होंगे। हालांकि चोर दोनों ही हैं किंतु स्टैंडर्ड अलग-अलग हैं। हां, पकड़े जाने या रेड पड़ने पर शर्म दोनों को ही नहीं आती। बल्कि तब तो और भी ‘शेर’ से हुए जान पड़ते हैं। तुरंत ‘प्रताड़ित’ बन जाती हैं। मानो- दुनिया की तमाम तरह की प्रताड़नाएं अकेले वे ही सहन कर रहे हैं।

खैर...।

तोते की आजादी एक हल्का-सा ‘शुभ संकेत’ तो लेके आई है। मगर ये आजादी कितनी और कहां तक ‘तटस्थ’ रह पाती है, अहम बात तो देखना ये है।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

अ-संस्कारी व्यंग्यकार

मेरे व्यंग्य में ‘संस्कार’ नाम की चीज ‘न’ के बराबर है। ऐसा नहीं है कि मैंने कभी कोशिश नहीं की अपने लेखन में संस्कारों को डालने की। किंतु क्या करूं, हर बार मात खा जाता हूं। जब भी संस्कार का ताबिज पहनकर व्यंग्य लिखा, व्यंग्य न बनकर ‘सुभाषित’ टाइप बन गया। तमाम संस्कारशील व्यंग्यकारों को भी पढ़कर देख लिया लेकिन अपने व्यंग्य में संस्कार मैं फिर भी पैदा नहीं कर सका।

इस बाबत पत्नी जाने कितनी ही दफा मुझे वॉर्न चुकी है कि तुम्हारे व्यंग्य में संस्कार न होने के कारण न खुद पढ़ती हूं न अपने मायके वालों से पढ़ने को कहती हूं। अपने लेखन को सुधारो। इसमें संस्कार डालो- संस्कार। तुम्हारे अ-संस्कारी व्यंग्य बड़े ही भद्दे और उज्जड़ किस्म के होते हैं।

पत्नी की आपत्ति पर बायकॉट भला कैसे कर सकता हूं? अतः सुनकर चुप रह जाता हूं। ज्यादा साफ-सफाई इसलिए नहीं देता कहीं दोनों वक्त का खाना-पीना ही बंद न हो जाए। यों भी, पत्नियों के मूड का कोई भरोसा नहीं होता। आज मेरे व्यंग्य उसे ‘अ-संस्कारी’ लग रहे हैं, हो सकता है, कल को ‘तुलसीदास की चौपाईयां’ लगने लगें!

वैसे, कहिए कुछ भी ये संस्कार बड़ी ही ‘कुत्सित’ चीज होती है। इन्हीं संस्कारों का खामियाजा मंटो को किस-किस रूप में अपने जीवन और लेखन में झेलना पड़ा। पूरी दुनिया ने उसे 'बदनाम लेखक' घोषित कर दिया। खुशवंत सिंह के साथ भी तो यही हुआ। लोग जाने क्या-क्या गलत-सलत खुशवंत सिंह के लेखन के बारे में कहते रहे। उन्हें घोषित तौर पर अ-संस्कारी लेखक तक बता दिया। हद है। लेखन में औरत, सेक्स, ग्लैमर या पीने-पिलाने का जिक्र करना क्या अ-संस्कारी परंपरा है? बताएं। बताएं।

कहने को रह हम 21वीं सदी में रहे हैं मगर बातें आज भी वही 16वीं-17वीं सदी की करते हैं।

क्या करूं, जो अपने व्यंग्य में मैं संस्कार की चाश्नी नहीं घोल पाता। संस्कार के अतिरिक्त बाकी सब तो है न मेरे व्यंग्य में। वैसे भी, व्यंग्य संस्कार की कसौटी पर नहीं, मार्केट और करेंट मुद्दों की डिमांड पर लिखा जाता है। यह नए दौर का व्यंग्य लेखन है। इसमें ग्लैमर भी है। मार्केट भी है। मस्ती और पंच भी।

पर यह हकीकत न पत्नी को समझ आती है न किसी और को। संस्कार के चक्कर में अगर पड़ा रहूंगा तो अभी जो लिख रहा हूं उससे भी हाथ धो बैठूंगा। फिलहाल, मैं ‘अ-संस्कारी व्यंग्यकार’ बने रहकर ही खुश हूं।

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

साहित्य के तईं नया राज्य

मुझे भी एक अलग राज्य चाहिए। राजनीति करने के लिए नहीं, साहित्य के लिए। हां, मुझे साहित्य के लिए नए राज्य की दरकार है। साहित्य के नए राज्य में मैं आपने हिसाब से चीजें बनाना व करना चाहता हूं। इस राज्य में सिर्फ और सिर्फ मेरी ही चलेगी। राज्य का ‘राजा’ मैं ही बनूंगा। अपनी पसंद के किस साहित्यकार को मैं साहित्यिक पुरस्कार देना-दिलवाना चाहता हूं किसे नहीं; इस पर मेरा निर्णय ही मान्य होगा।

नए साहित्यिक राज्य में मैं साहित्य की नहीं बल्कि पुरस्कारों की सेवा करने वालों पर अधिक बल दूंगा। मेरा मानना है- साहित्य की सेवा तब तक नहीं हो सकती, जब तक पुरस्कार की अशर्फियां लेखक-साहित्यकार की झोली में न आन गिरें। साहित्य व लेखन को अगर अच्छे से चलाना या संवारना है तो पुरस्कार की राजनीति पर ध्यान ज्यादा लगाना होगा।

मेरा दावा है कि नया साहित्यिक राज्य सम्मानों व पुरस्कारों के लिए तमाम नए अवसर लेकर आएगा। जो वरिष्ठ साहित्यकार ‘लिखने’ से ज्यादा ‘बोलने’ में ‘विश्वास’ करते हैं उन्हें पुरस्कृत करने पर खास ध्यान दिया जाएगा। आखिर वे हमारे साहित्य की जीवित मगर बोलती हुई धरोहरें हैं। धरोहरों की चिंता करना हर साहित्य-प्रेमी का पहला फर्ज होना चाहिए। क्या नहीं...?

मैं अपने नए साहित्यिक राज्य में किसी लेखक-साहित्यकार को यह अधिकार नहीं दूंगा कि वो ‘सृजन’ करे। लेखन के प्रति ‘गंभीर’ बना रहे। प्रगतिशील आलोचकों को मेरे राज्य में कहीं कोई जगह नहीं मिलेगी। हां, वहां ‘समीक्षकों’ का हर दम स्वागत होगा। समीक्षा लेखन सबसे खूबसूरत विधा है। बिना किसी दिमागी ताम-झाम के एक बने बनाए खांचे के तहत आप मनचाही समीक्षा लिख व लिखवा सकते हैं। मेरी निगाह में समीक्षा लेखन सबसे सरल और वक्त बचाऊ पेशा है।

नए साहित्यिक राज्य में इस बात पर तव्वजो ज्यादा देने का प्रयास किया जाएगा कि शाब्दिक क्रांतियों को जितना हो सके चारदीवारी के भीतर ही निपटा लिया जाए। क्रांतियां जब सड़कों-चौराहों का रूख कर लेती हैं तब यथास्थितिवादी व्यवस्था में खदबदाहटें पैदा होने लगती हैं। मैं नहीं चहूंगा कि मेरे नए साहित्यिक राज्य में कोई भगत सिंह की तर्ज पर क्रांति-फ्रांति करे। मुझे क्रांतियों से सख्त नफरत है। इसीलिए तो नए साहित्यिक राज्य को बनाने का संकल्प मैंने बिना किसी सामाजिक क्रांति के लिया है।

बेशक, मैं साहित्य की सेवा करना चाहता हूं मगर अपने तरीके से। मेरा प्रयास रहेगा कि अपने राज्य में बात प्रेमचंद या मुक्तिबोध पर नहीं मेरे ऊपर ज्यादा हो। मेरे साहित्यिक कर्म व वैचारिक धर्म का गहनता से विवेचन किया जाए। मुझे मिले प्रत्येक छोटे-बड़े साहित्यिक सम्मान-पुरस्कार पर अधिक से अधिक लिखा जाए।

मेरी सरकार से गुजारिश है कि वो मुझे नए साहित्यिक राज्य को बनाने का समूचित अधिकार दे ताकि मैं साहित्य को यशोगान और पुरस्कार का अखाड़ा बनाकर कुछ अजूबा और अनूठा कर सकूं।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

जीएसटी पर कविता

कवि परेशान है। कुछ समझ नहीं पा रहा कि जीएसटी पर कविता कैसे लिखे? न उसे शब्द मिल पा रहे हैं। न कोई सीन क्रिएट हो पा रहा। कवि बार-बार जीएसटी के रहस्य को समझने की कोशिश कर रहा है मगर हर बार गच्चा खा जाता है। 5, 12, 18, 28 का फेर उसे समझ नहीं आ पा रहा। झुंझलाहट में कभी वो खुद को गरियाता है तो कभी सरकार को।
    
मैं कवि की परेशानी को समझ सकता हूं। अर्थशास्त्र को समझ पाने में हमारे देश के कवि अभी कच्चे हैं। वे ज्यादातर साम्यवाद, पूंजीवाद, अमीरी-गरीबी, कत्ल-आत्महत्या, फूल-पत्ती, नदी-नाले, आकाश-तारे, सूरज-चंद्रमा टाइप कवितओं में ही उलझ रहते हैं। अर्थशास्त्र और बाजार की तरफ न उनका ध्यान जाता है न इसे वे कविता लायक ही पाते हैं। इसीलिए आजकल जीएसटी पर कविता लिख पाने में खुद को ‘बौना’ महसूस कर रहे हैं।

कवियों को भी समझना चाहिए कि अब वो पहले वाला वक्त नहीं रहा। सीन चेंज, बहुत चेंज हो चुका है। चारों तरफ ‘डिजिटल इंडिया’ का ‘कोलाहल’ है। दुनिया और समाज सरपट-सरपट भागे जा रहे हैं। किसी के पास अब इतनी फुर्सत भी नहीं कि ठहर कर शर्ट का कॉलर भी ठीक कर सके। ऐसे में, भीषण संवेदनात्मक कविताएं लिखना तो दूर इस दौर के कवि के लिए सोचना भी जरा मुश्किल है।

पन्नों से कहीं ज्यादा कविताएं अब सोशल मीडिया पर आ रही हैं। लुत्फ यह है कि सोशल मीडिया पर मौजूद अस्सी परसेंट लोग कवि ही हैं। जो जरा-बहुत लिख पाता है, तुरंत अपने फेसबुक पेज पर कविता टांग देता है। कविता अब पूर्णता डिजिटल मोड में ढल गई है।

फिर भी, हमारे बीच कुछ ऐसे कवि हैं, जो खुद की खुशफहमियों से बाहर निकल ही नहीं पा रहे। सत्तर के दशक में जी रहे हैं और सोशल मीडिया के नए कवियों को कोस रहे हैं। उन्हें जीएसटी पर कविता न लिख पाने का मलाल तो हैं पर अपना दर्द साझा करें किससे? नया कुछ सीखना नहीं चाहते, पुराना अब चलन से बाहर हो चुका है। दिक्कत विकट है फिर भी ऐंठ में कोई कमी नहीं।

जीएसटी पर कविता लिखना इतना कठिन नहीं। कुछ शब्दों का हेर-फेर कर मस्त कविता तानी जा सकती है। मगर पुराना कवि शब्दों के हेर-फेर को न सिर्फ कविता बल्कि साहित्य की भी तौहीन समझता है। ऐसे में भला कैसे लिख पाएगा जीएसटी पर कविता?

मगर मैं जीएसटी पर कविता पढ़ने का शौक रखता हूं। बेहद बेसब्री से इस इंतजार में हूं कि कोई वरिष्ठ या आधुनिक टाइप का कवि जीएसटी पर कविता लिखे। देश में इतने सारे कवियों के होते जीएसटी पर एक भी कविता का न आ पाना- किसी और के लिए हो न हो- मगर मेरे तईं बड़ा ही ‘क्षोभ का विषय’ है!

शुक्रवार, 30 जून 2017

जीएसटी और लेखक

कई दिनों से जीएसटी पर अखबारों, न्यूज चैनलों पर कुछ न कुछ आ ही रहा है। कोई जीएसटी के पक्ष में दिख रहा है तो कोई विरोध में। मतलब, जितने मुंह उतनी बातें। बहती गंगा में वे लोग भी हाथ धोने में लगे हैं, जिन्हें जीएसटी का ‘जी’ भी नहीं मालूम! फिर भी, कहने या बोलने में क्या जाता है? ये तो ‘हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा’ वाला हिसाब है।

किंतु, जीएसटी पर मेरी चिंताएं जरा दूजी हैं। जीएसटी के मद्देनजर मैं लेखक के बारे में सोच रहा हूं। रात-दिन मेरे दिमाग में यही कीड़ा उथल-पुथल मचाए रहता है कि जीएसटी से (हम) लेखकों को क्या मिलेगा? या हमारा कितना और कहां तक भला होगा? जीएसटी के आला जानकारों से पूछा एवं दाएं-बाएं से जितना भी मुझे पढ़ने को मिल सका, पढ़ा- इस मसले पर सभी का डिब्बा गोल था। कोई भी यह नहीं बता-समझा पाया कि जीएसटी कैसे लेखक वर्ग के लिए मुफीद टाइप साबित होगा।

तो क्या मैं मान लूं, लेखक वर्ग सरकार की किसी भी आर्थिक श्रेणी में नहीं आता? लेखक को अपने लिखे पर कितना और क्या पारिश्रमिक मिलना चाहिए, ऐसा कोई नियमशुदा कानून नहीं है। लेखक के पारिश्रमिक को जीएसटी की किस दर में शामिल किया गया है? निरंतर बढ़ती महंगाई के साथ क्या लेखक का मेहनताना नहीं बढ़ना चाहिए आदि पर सरकार का रूख क्या है? चंद व्यापारियों या विपक्षियों ने ही जीएसटी पर हल्ला मचाया हुआ है। कोई बंद करने की धमकी दे रहा तो कोई वॉक-आउट करने की।

बेचारा लेखक मौन है। क्या कहे? किससे कहे? न वो अपने लेखन को बंद करने की धमकी दे सकता है, न यहां-वहां लिखने की। अपना-सा मुंह लेके बैठा हुआ है। भीषण गर्मी में बस कलम चलाए जा रहा है।

अच्छा, कमाल की बात यह है कि लेखकों की तरफ से भी किसी ने सरकार को आड़े हाथों नहीं लिया है। इसीलिए सरकारें भी लेखकों के हितों एवं सुविधाओं की तरफ से अपने कानों में तेल डाले रहती हैं। न बजट में लेखकों को कुछ मिलता है, न सरकारी योजनाओं में। न जीएसटी में ही कुछ नजर आ रहा है। लेखक कल भी कलम घिस रहा था, आज भी घिस रहा है, हमेशा ही घिसता रहेगा।

वैसे, मैं इस मसले पर सरकार के खिलाफ जंतर-मंतर पर ‘भूख हड़ताल’ पर बैठने तक को तैयार हूं। बस यही सोचकर कदम वापस खींच लेता हूं कि मैं चौबीस घंटे से ज्यादा भूखा नहीं रह पाता। क्या करूं, मेरे पापी पेट को बहुत जल्द भूख लग आती है। किंतु सरकार की ईंट से ईंट बजाने में मैं कतई पीछे नहीं हूं। अगर मेरी जगह कोई और लेखक भूख हड़ताल पर बैठे तो।

लेखकों के हितों के बारे में अगर मैं नहीं सोचूंगा तो भला कौन सोचेगा? सरकार से मेरी गुजारिश है कि वो जीएसटी में हम लेखकों को क्या मिल रहा है, इस पर अपना नजरिया स्पष्ट करे। वरना आंदोलन के लिए मैं रेडी हूं।

बुधवार, 28 जून 2017

राजनीति के बीच फंसा राष्ट्रपति चुनाव

राजनीति अपना रंग गिरगिट से भी तेज बदलती है। गिरगिट कहीं राजनीति को रंग बदलते देख ले- तो कसम से- ‘आत्महत्या’ ही कर ले। राजनीति में रहकर इसका रंग बदलने वाले नेता अपने करियर में हमेशा कामयाब होते हैं। न वे कभी हारते हैं, न किसी को जीतने देते। सीधा-साधारण आदमी अगर राजनीति में जीत भी जाए तो उसके चरित्र की दुर्गति होते देर नहीं लगती। इसीलिए अति-महत्तवाकांक्षी लोग ही राजनीति के मैदान में अपना सिक्का चला व जमा पाते हैं।

अपने इसी रंग और स्वभाव के कारण ही राजनीति हमेशा चर्चा और बहस में बनी रहती है। ठलुओं का जी बहलाए और विरोधियों का पारा चढ़ाए रहती है। आजकल राजनीति का सारा ‘फोकस’ राष्ट्रपति चुनाव पर आकर टिक लिया है। जहां जिसे देखो राष्ट्रपति चुनाव से नीचे या ऊपर बात करना ही नहीं चाहता। हर कोई पार्टनर की पॉलिटिक्स तो जानना चाहता है किंतु अपनी खोटियां खोलने से डरता है। हालांकि काफी हद तक दलों की खोटियां खुल चुकी हैं मगर फिर भी बहुत कुछ बाकी है अभी खुलना। यों, खोलकर खुलेआम ‘रिस्क’ भला कौन ले? हाइकमान को जवाब भी तो देना पड़ सकता है न।

राष्ट्रपति चुनाव में पार्टियों ने ‘दलित दांव’ क्या चला मुकाबला और भी ‘दिलचस्प’ हो लिया। अब बहस इस पर तनी हुई है कि कौन दल या नेता कितना दलित-प्रेमी और कितना दलित-विरोधी है। हालांकि- ऐसे समय में- दलित-विरोधी कोई दल नहीं होना चाहेगा फिर भी बात होठों के बीच कहां दबी रह पाती है। जुबान पर कुछ, मन की बात में कुछ न कुछ हलचल तो बनी रहती है।

दलों का अलग-अलग तरीकों से दलित-दलित खेलना बेशक दलितों को पसंद न आ रहा हो लेकिन क्या कीजिए- यह राजनीति है राजनीति। यहां दांव दूसरे को पस्त करने के लिए ही खेले-खिलवाए जाते हैं।

मंचों पर खड़े होकर जाति और धर्म पर चाहे कितनी ही ऊंची-ऊंची बातें क्यों न खींच लें पर शाश्वत सत्य तो यही है कि राजनीति में इनकी ‘हेल्प’ लिए बिना न कोई चुनाव लड़ा जा सकता है न जीता जा सकता। जाति राजनीति और नेताओं का वो ‘पिलर’ है जिस पर सत्ताओं की इमारतें बड़ी शान से खड़ी की-करवाई जाती हैं। हमाम में दूध का धुला कोई नहीं। कम या ज्यादा नंगे तो सभी हैं। क्यों हैं न पियारे?

हालांकि जनता को इससे कोई सरोकार नहीं कि उनका नेता या राष्ट्रपति दलित है या सवर्ण लेकिन राजनीति में ये बहुत मायने रखता है। नेताओं की पहली पसंद ‘जातिवाद’ है बाद में ‘जन-हित’। राष्ट्रपति चुनाव कहने को बड़ा ‘प्रतिष्ठित चुनाव’ है लेकिन दलगत और जातिवाद की जुगलबंदी इसे ‘नौटंकी’ बनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रख छोड़ रही। इसी में उन्हें मजा आ रहा है। तब ही तो मैं चुनाव और राजनीति को कभी ‘गंभीरता’ से नहीं हमेशा ‘मनोरंजन’ की तरह लेता हूं। दिल और मन ‘लगा’ रहना चाहिए बस।

दो महान हस्तियों में से राष्ट्रपति कौन बनेगा देश के नेता लोग जानें पर कथित दलित-प्रेम का खेल राजनीति में हमेशा यों ही चलता रहेगा। समझ गए न पियारे।

गुरुवार, 15 जून 2017

अगले जन्म मुझे भूत ही कीजियो

भूत मुझे बेहद पसंद हैं। बचपन से आकर्षित करते रहे हैं। भूतिया फिल्में देखना। भूतों पर आधारित किस्से-कहानियां सुनना। भूतिया जगहों पर जाना। बड़ा आनंद आता है इन सब में मुझे।

अक्सर खुद को मैं इसलिए भी गरियाता हूं कि मैंने मनुष्य-रूप में जन्म क्यों लिया? भूत क्यों नहीं बना? भूत के रूप में जन्म लिया होता तो इंसानी-दुनिया के दंद-फंद से दूर कितना खुशहाल होता। इंसानों के बीच रहने का दिल नहीं करता अब। बड़े लफड़े हैं इंसानी लाइफ में। हर वक्त जाति-धर्म-राजनीति की चीख-पुकार। आपस में मन-मुटाव। पैसे की अंधी दौड़। नौकरी-चाकरी के बेइंतहा झंझट।

मगर भूतिया दुनिया इससे एकदम अलग है। वहां सब एक समान हैं। न उनकी अधिक तमन्नाएं हैं, न आपस में अधिकारों की जंग।

सबसे दिलचस्प यह है कि भूतों के बीच न कोई बुद्धिजीवि है, न नेता, न समाजसुधारक। सब अपने मन के राजा हैं। मैंने कभी उन्हें विचारों या धर्मनिरपेक्षता के मसलों पर लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। खुद इतना ताकतवर होते हुए भी, उनके मध्य कभी जुबानी या हाथ-पैरों का दंगल नहीं छिड़ता। जबकि इंसान अपनी ही बिरादरी वालों से इतना खार खाया रहता है कि कुछ पूछिए मत।

हम इंसानों को ऐसा लगता है कि भूत हमें डराते हैं। हमें मारते या हमारा शोषण करते हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। भूत अपने स्वभाव में बेहद ‘शांतिप्रिय’ होते हैं। उनका उद्देश्य हमेशा- न कहूं से दोस्ती न कहू से बैर वाला होता है। चूंकि हम इंसान हर वक्त एक तरह के ‘भय’ में जीते रहते हैं इसीलिए हम भूतों से डरते हैं। कुछ की तो भूत का नाम सुनते ही पैंट गीली हो लेती है।
इंसान बहुत ही डरा हुआ प्राणी है इसीलिए भूतों के नाम से घबराता है।

लेकिन मैं अगले जन्म में भूत बनने की ही तमन्ना रखता हूं। भूतों जैसा जीवन जीना चाहता हूं। खुद भूत बनके इंसान के भय को अपनी अपनी ‘अदृश्य आंखों’ से देखना चाहता हूं। और यह साबित करना चाहता हूं कि भूत भी उम्दा व्यंग्यकार होता है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि व्यंग्य का जितना मसाला भूतों के पास रहता है, उतना इंसानों के पास भी नहीं।

तो हे! ईश्वर, ऐ! खुद अगले जन्म मुझे भूत ही कीजियो।

शनिवार, 20 मई 2017

व्यंग्य और क्लीवेज

जितना पसंद मुझे व्यंग्य लिखना है, उतना ही क्लीवेज देखना भी। कभी-कभी तो मुझे व्यंग्य और क्लीवेज एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। उत्मुक्तता और उत्तेजना दोनों में एक समान होती है। जैसे- व्यंग्यकार को व्यंग्य लिखे बिना चैन नहीं पड़ता, वैसे ही हीरोईनों को क्लीवेज दिखाए (अपवादों को जाने दें) ‘संतुष्टि’ नहीं मिलती। फिल्मों में क्लीवेज दिखाना कितना कहानी की डिमांड होती है और कितना फसाना यह तो मैं नहीं जानता मगर हां ‘शो-ऑफ’ के लायक अगर कुछ है तो देखने-दिखाने में क्या हर्ज? यह तो निर्भर सामने वाले की ‘मानसिकता’ पर करता है कि वो क्लीवेज को ‘जस्ट एंटरटेनमेंट’ एन्जवॉय करता है या फिर सभ्यता-संस्कृति के मूल्यों पर खतरा।

अक्सर हैरानी होती है मुझे कि इतना आधुनिक और डिजिटल होते जाने के बाद भी हमें क्लीवेज पर बात या चर्चा करना बड़ा भद्दा टाइप लगता है। मानो कोई पाप-शाप कर रहे हों। किसी देसी-विदेशी हीरोईन की क्लीवेज को देखते ही जबान से ‘वाह! क्या कमाल क्लीवेज है’ अगर निकल जाए तो अगला इतनी ‘असभ्य नजरों’ से हमें देखता है मानो हम उसकी शर्ट के बटन खोलने की हिमाकत कर रहे हों। अरे भाई अगर कोई सुंदर क्लीवेज नजर आई और तारीफ कर दी तो इसमें इतना बिफर पड़ने की क्या जरूरत है? अमां, जब खूबसूरत चेहरे की तारीफ की जा सकती है तो मदमस्त क्लीवेज की क्यों नहीं? क्या क्लीवेज इंसान के शरीर से बाहर का पार्ट होती है?

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब हीरोईन दीपिका पादुकोण ने लोगों की यह कहकर कि ‘मेरी क्लीवेज, मेरी मर्जी’ कैसे बोलती बंद कर दी थी। दीपिका को अपनी क्लीवेज पर गर्व है तो उस गर्व की तारीफ करने में क्या जाता है? तारीफें इंसान को हरदम कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती हैं।

क्लीवेज की एक झलक ही इंसान को इतना ‘तृप्ति’ कर सकती है, जितना कि संपूर्ण देह-दर्शन नहीं। उसी प्रकार, व्यंग्य के भीतर छिपे छोटे-गहरे पंच भी एक प्रकार से व्यंग्य की क्लीवेज ही होते हैं। जो काम पूरा व्यंग्य नहीं कर सकता वो पंच कर जाते हैं। वनलाइनर इन्हीं पंच को और ग्लैमरस बनाने के काम आते हैं। व्यंग्य का बाहरी और भीतरी ग्लैमर पंच और वनलाइनर से ही तो निखरता-संवरता है। व्यंग्यकार के पास अगर अपने व्यंग्य के ग्लैमर को साधने का हुनर है फिर तो बल्ले-बल्ले...।

व्यंग्य में क्लीवेज का जिक्र हालांकि शुचितावादियों को अटपटा टाइप जरूर लगेगा, लगने दो। जब तक लगेगा नहीं तब तक वे अपने परंपरावादी दायरों से बाहर निकलेंगे नहीं। सच तो यही है कि बिना पंच (क्लीवेज) का इस्तेमाल किए व्यंग्य रचा ही नहीं सकता। पंच और वनलाइनर का मिक्सचर ही व्यंग्य को ‘हॉट’ बनाता है। एंवई, ‘ठंडे व्यंग्य’ लिखने का अब कोई मतलब न रहा प्यारे। व्यंग्य का जमाना बहुत बदल गया है। ‘माइक्रो-व्यंग्य’ ही आजकल चलन में है। कम शब्द, ज्यादा आनंद।


मेरी तो कोशिश यही रहती है कि मैं अपने हर व्यंग्य में क्लीवेज (पंच) की खूबसूरती बनाए रखूं। ताकि पढ़ने वाले को ‘रस’ मिले। जरूरी है, पढ़ने और लिखने वाले के दिल का जवान रहना, तभी तो व्यंग्य और क्लीवेज की मस्तियां तन में आनंद बरकरार रखेंगी।

गुरुवार, 18 मई 2017

अपने ही फैलाए वायरस से डरता इंसान

सच पूछो तो मुझे वायरस का डर नहीं। हंसी तो मुझे इस बात पर आ रही है कि इंसान अपने ही फैलाए वायरस से खुद डर रहा है। जगह-जगह चेतावनियां देता फिर रहा है कि रेन्समवेयर वायरस से बच कर रहें। ऐसी-वैसी कोई फाइल या इ-मेल न खोलें। जरा-कुछ खतरा दिखे तो तुरंत अपना कंप्यूटर बंद कर दें। हां, फिरौती के लिए मांगी गई रकम तो बिल्कुल भी न दें।

अचानक से इतना डर, इतना भय क्यों और किसलिए? रेन्समवेयर वायरस भगवान का नहीं इंसानों का बनाया एवं फैलाया हुआ है। इसका उद्देश्य भगवान को नहीं केवल इंसानों को नुकसान पहुंचाना है। उंगुली को टेढ़ा कर पैसा वसूलना है। यह सब तिकड़मबाजियां तो इंसान ने ही इंसान को सिखाई-पढ़ाई-बताई हैं। फिर इनसे क्या घबराना?

इंसान खुद को चाहे कितना ही ‘बलशाली’ प्राणी क्यों न कह ले लेकिन होता वो बहुत ‘डरपोक’ टाइप है। खुल्ला कहूं तो जानवरों से भी ज्यादा डरपोक। गीदड़-भभकी का जानवर फिर भी मुकाबला कर लेते हैं किंतु इंसान तो तुरंत इतना दूर भाग जाता है लंगूर को देखकर बंदर।

बताइए, एक वायरस से पूरी दुनिया डरी पड़ी है। कमाल देखिए, इतना आधुनिक और टेक्नो-फ्रैंडली होने के बावजूद वायरस का कोई तोड़ उसके पास नहीं। बैंक, एटीएम, मेल आदि-इत्यादि बंद करवा रखे हैं, कहीं रेन्समवेयर सबकी लंका न लगा दे। हालांकि कई जगह लगा भी चुका है। तो भी क्या...?

अमां, यह कोई पहला या अनोखा वायरस नहीं जो इतना विकट होकर फैला है। इससे पहले भी कई तरह के वायरस हमारे सिस्टम को तबाह कर चुके हैं। वे सब भी इंसानों के ही फैलाए हुए थे। ब्राह्मांड से नहीं उतरे थे। किन्हीं देवताओं या राक्षसों ने उन्हें नहीं बनाया था। तिस पर भी हम हार गए। अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार कर पड़ोसी से कह रहे हैं- भाई, जरा दवा लगा दे। दवा लगते ही थोड़ी-बहुत राहत जैसे ही मिलती है इंसान अपने दर्द को भूलाकर दूसरे किसी बड़े हमले का इंतजार करता हुआ मिलता है। दोबारा हमला होते ही फिर वही रटी-रटाई चिंताएं-सावधानियां हवाओं में दौड़ने लगती हैं।

इन किस्म-किस्म के वायरसों पर अधिक चिंता करने की जरूरत नहीं। ये होते रहे हैं। होते रहेंगे। जिम्मेवार ठहरा कर दोष चाहे किसी भी देश को दे लीजिए मगर इंसान अपनी ‘काली फितरत’ को कभी नहीं छोड़ने वाला। निरंतर आधुनिक या डिजिटल होकर वो किसी न किसी तरीके से खुद को ही नुकान पहुंचा रहा है। कभी वायरस फैला कर। कभी वेबसाइट हैक कर। कभी एटीएम से बेलेंस उड़ा कर। कभी डाटा करप्ट कर।

लुत्फ तो यह है कि इंसान ही इंसान के इजाद किए गए तोड़ को नहीं भेद पा रहा। तमाम सवाधानियों-चिंताओं के बीच खुद भी उलझा रहता है। दूसरों को भी उलझाए रखता है।

आज नहीं तो कल रेन्समवेयर का खतरा टल ही जाएगा। लेकिन इस बात का क्या भरोसा कि अगला फैलने वाला वायरस इससे भी ज्यादा स्ट्रौंग न होगा?

बुधवार, 17 मई 2017

चिप-कांडः इंसानी खोपड़ी का जवाब नहीं

पिछले कई दिनों से अखबार और खबरिया चैनल ‘चिप-मय’ दिख रहे हैं। तेल के खेल में प्रयोग की जानी वाली ‘चिप’ की खबरें खोद-खोद कर छापी-दिखाई जा रही हैं। लोग कभी चिप को तो कभी तेल मालिकों को ‘कोस’ रहे हैं। चिप-कांड ने न केवल सरकार बल्कि चिप-धारकों की नींद भी हराम कर रखी है। क्या तो तेल वाले, क्या तो मोबाइल वाले हर कोई चिपों के लेकर ऐसे ‘डरे-सहमे’ हुए हैं मानो यह कोई ‘चरस-गांजा’ टाइप हो।

कुछ भी कहिए पर ‘दाद’ देनी पड़ेगी इंसानी खोपड़ी की। जाने कहां-कहां से कैसे-कैसे धांसू आइडिया दिमाग में ले आते हैं। पर्दे के पीछे सारा खेल खुल्लम-खुल्ला चलता रहता है। भनक कहीं जाके तब लग पाती है, जब अच्छा-खासा माल पिट लिया जाता है। इंसानी (करतबी) खोपड़ी के आगे कंप्यूटर तो क्या कैलक्युलेटर तक फेल है।

कस्टमर की जेब का गेम चिप के सहारे बजाने का आइडिया जिस भी बंदे का रहा हो मगर था ‘नायाब’। अभी तलक तो हमने चिप का ज्यादा से ज्यादा यूज मोबाइल में या किसी डिजिटल मशीन के भीतर ही देखा-सुना था। लेकिन चिप के सहारे तेल का खेल भी खेला जा सकता है, यह वाक्या पहली दफा ही सामने आया।

कुछ गलत नहीं कहते अगर यह कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है। ऐसे तिकड़मी और घोर-जुगाड़ू मसलों को देख-सुनकर तो यह बात और भी ‘बलबती’ हो जाती है। पूरी दुनिया में इंसानी दिमाग से तेज और बेहतर कोई चीज दौड़ ही नहीं सकती। घपलों-घोटालों के मामलों में तो खासकर। देखिए न, पेट्रोल पंप मालिक बड़ी तत्परता के साथ चिप-कांड करते रहे। न इसकी भनक ग्राहक को कभी लगने दी, न सरकार को। और जब चिप का राज खुला तो ऐसे-ऐसे किस्से सामने आए कि दांतों तले उंगुली भी दबा लो तो भी उंगुली को कोई फरक न पड़े।

चिप बनाने वालों ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि एक नन्हा-सा आइटम इतना बड़ा कांड कर सकता है। डाइरेक्ट दिल पर न लीजिएगा लेकिन प्रधानमंत्रीजी के ‘डिजिटल’ और ‘न्यू इंडिया’ के सपने को ढंग से ऊंचाईयों पर ये लोग ही ले जा रहे हैं। इंसानी दिमाग इतने फितुरों से भरा पड़ा है कि कब कहां क्या खेल खेल जाए कुछ नहीं पाता। कोड पूछकर बैंक खाते से रुपये साफ करने के किस्से तो अब चोरी-चकारियों की तरह आम हो चले हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब फ्रॉड द्वारा किसी बंदे के लुटने की खबर अखबार में न छपती हो। ठग-विद्या में इंसानी खोपड़ी महारत हासिल कर चुकी है। महारत।

आलम यह है कि यहां जिसे ‘ठलुआ’ समझो वो एक दिन बड़ा कांड करने वाला निकलता है। उसके कांड के किस्से जब अखबारों में छपते हैं, तब कहीं जाकर यह एहसास होता है कि दिमाग का असल इस्तेमाल तो ठलुए ही कर रहे हैं। चिप कांड भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। सारा खेल खेल लिए जाने के बाद सरकार और अधिकारी नींद से जाग रहे हैं। वाह!

आगे चिप कांड वालों का तेल पुलिस या प्रशासन कैसे निकालेंगे यह बाद की बात रही फिलहाल तो उनकी खोपड़ी की चपलता पर रश्क कीजिए और अपनी कटी जेबों पर आंसू बहाइए।

काहे के गरीब मुल्क

वो तो एंवई लोग छोड़ते रहते हैं कि इंडिया गरीब मुल्क है। जबकि ऐसा कतई नहीं है। इंडिया राजा-महाराजाओं के जमाने में भी ‘सोने की चिड़िया’ था, अब भी है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अभी सोने की चिड़िया को चंद बड़े लोगों ने हैक कर रखा है। पर कोई नहीं…। कभी-कभी छोटे लोग भी सोने की चिड़िया का लुत्फ अपनी सुविधानुसार ले लेते हैं। किंतु गरीब वे भी नहीं है।

आम लाइफ में किसी आम आदमी को गरीब कह दो तो अगला यों ‘भड़क’ उठता है मानो कोई ‘अश्लील’ टाइप गाली दे डाली हो। गरीब शब्द और गरीबी की परिभाषाएं किताबों या फिर वाम विचारकों के मुंह से सुनने में ही अच्छी लगती हैं। जबकि असल जिंदगी में गरीब तो वे भी नहीं होते।

मैं तो यह कहता हूं कि हम अपने को गरीब माने ही क्यों? जिस देश में बाहुबली-2 एक हजार करोड़ कमा और जस्टिन बीबर का शो सौ करोड़ कूट ले जाए भला वहां की जनता गरीब कैसे हो सकती है? वे तो गरीब शब्द के आस-पास भी कहीं नहीं ठहरते।

सुना कि तीन से लेकर पचहत्तर हजार रुपये तक का टिकट बिका था बीबर के लाइव शो का। क्या सेलिब्रिटी, क्या नॉन-सेलिब्रिटी हर वर्ग का बंदा-बंदी बीबर को देखने-सुनने को बेताब था। विदेशियों के प्रति हमारी बेताबी का आलम तो पूछिए ही मत। किसी ट्यूरिस्ट प्लेस या फिर जहां विदेशी लोग इकठ्ठा हों आम भारतीय जब तलक उनके साथ एकाध फोटू या सेल्फी नहीं ले लेता, उसके हलक से रोटी का गस्सा ही नहीं उतरता। तो बीबर के शो में अगर भारतीयों में पचहत्तर हजार का टिकट खरीद भी लिया तो कौन-सा गुनाह कर दिया?

हां, यह बात अलग है कि बीबर केवल ‘लिप सिंग’ कर हमें ‘मूर्ख’ बनाकर चला गया पर विदेशियों से मूर्ख बनने में हमें ज्यादा आनंद आता है न। अच्छा, कुछ होड़ भी होती है हममें कि अगर सामने वाला बाहुबली या बीबर देखने जा रहा है तो अगला घर पर कैसे रह सकता है। नोट को जेब में पड़े-पड़े सड़ना नहीं चाहिए। बाहुबली या बीबर के बहाने बढ़ने वाली आय से ही तो पता चलता है कि हम अब गरीब टाइप मुल्क नहीं रहे।

सरकार की कोशिश भी यही है कि न्यू इंडिया का हर बाशिंदा टेक्निकली-इकॉनोमिकली संपन्न हो। डिजिटल और कैशलेस होते इंडिया की तरफ बढ़ते हमारे कदम गरीबी से मुक्ति की ही तो पहल है। देश तो नोटबंदी के वक्त भी गरीब नहीं हुआ था। कहीं न कहीं से किसी न किसी के पास से लाखों-करोड़ों रुपये मिलने की खबरें आ ही जाती थीं। जिन्हें नोटबंदी के दिनों में लाइनों में खड़े होने से दिक्कत थी वे बाहुबली और बीबर के लिए बिना किसी तकलीफ खड़े रहे। ये है न्यू इंडिया।

वाम विचारकों को अब अपना पुराना राग छोड़ देना चाहिए। उनका रात-दिन गरीबी-गरीबी चिल्लाना अब काम नहीं आना। मुल्क को गरीब कहने से पहले एक दफा उन्हें बाहुबली-2 और बीबर के आंकड़ों को भी देख ले ना चाहिए।

बाहुबली-2 की अपार कामयाबी के बाद से मैंने तो खुद को गरीब कहना-मानना ही बंद कर दिया है। मैं तो फख्र के साथ कहता हूं कि मैं उस मुल्क का बाशिंदा हूं जहां की जनता ने बाहुबली-2 को एक हजार करोड़ की कमाई करवाई है। फिर काहे के गरीब मुल्क?

सोमवार, 8 मई 2017

थोड़ी सी जो पी ली है

हालांकि चीते को पीते कभी देखा तो नहीं मगर एक ऐड में दिखाया गया था कि चीता भी पीता है। यों, पीने पर किसी के ‘रोक-टोक’ नहीं। इंसान हो या जानवर कभी भी, कहीं भी, कैसे भी पी सकता है। बहुत से तो पीने को अपना ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ मानते हैं। हां, यह बात अलग है कि पीने के बाद वे खुद ‘होश’ में नहीं रहते। लेकिन पीना जरूरी है। ऐसी उनकी ‘दिली-मान्यता’ है।

ऐसा सुना है, इंसान या तो दर्द गलत करने या फिर खुशी को सेलिब्रेट करने के लिए पीता है। उसकी तासीर ही कुछ ऐसी है कि हलक से नीचे जाते है पूरी दुनिया रंगीन टाइप नजर आने लगती है। चलो, इंसान की पीने-पिलाने की दिलचस्पी तो समझ आती है लेकिन चूहों को उस रंगीन पानी में ऐसा क्या खासा नजर आया जो- बिना हिचकी लिए- पूरी नौ लाख लीटर अकेले ही गटक गए। क्या इंसान के साथ-साथ चूहे भी मदिरा-प्रेमी हैं? हां, हो भी सकते हैं। दुनिया में किसी इंसान या जानवर का कोई भरोसा नहीं कब किस तरह का शौक पाल ले। शौक बड़ी चीज है।

वैसे, वैज्ञानिकों के लिए चूहों का इतनी मात्रा में शराब गटकना बड़ा शोध का विषय बन सकता है। पीने के बाद उनका व्यवहार खुद के या अपने साथियों के प्रति कैसा रहा? पीने के बाद वे कितना लुढ़के, कितना संभले, किस टाइप की शायरी उनके मुंह से निकली? हां, कौन सा वाला ब्रांड उन्हें सबसे ज्यादा पसंद आया।

पीने के मामले में अब कोई यह नहीं कह सकता कि चूहे इंसानों से कमतर हैं। इस नाते शराब की डिमांड देश में और अधिक बढ़ जानी चाहिए। फिर भी, पता नहीं क्यों कुछ राज्य शराब-बंदी पर इतना जोर दे रहे हैं। गम को गलत करने का इससे बेहतर साधन कोई नहीं हो सकता। यह बात बिहार के चूहों ने साबित भी कर दी है।

अब तो उस दिन का इंतजार है मुझे जब इंसान और चूहे साथ बैठकर जाम छलकाएंगे। क्या उम्दा जुगलबंदी होगी दोनों के बीच। कभी इंसान चूहे को तो कभी चूहा इंसान को पैग बनाकर देगा। बीच-बीच में दोनों के बीच थोड़ी-बहुत तू तू मैं मैं भी हो जाया करेगी।

पीने की इतनी सामर्थ्य चूहों में होगी किसी से सोचा भी न था। फिर भी, चूहों ने नौ लाख लीटर शराब गटक कर ठीक ही किया। शराब के बेकार चले जाने से तो बेहतर यही रहा कि किसी के काम ही आ गई। भले ही चूहों के आई। भलाई में किसी की क्या जाता है।

मगर चूहों के पीने पर हंगामा खड़ा होना गलत है। उनके जरा से पेट में थोड़ी सी ही तो गई होगी। थोड़ी सी पी लेने में क्या जाता है। शौक बड़ी चीज है। बना रहना चाहिए। बाकी कहने वाले तो जाने क्या-क्या कहते रहते हैं।