मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

प्याज से मोहब्बत

प्याज से मुझे उतनी ही मोहब्बत है जितनी शीरीं को फरहाद से थी। व्हाट्सएप्प चलाए बिना दो पल को फिर भी रह सकता हूं किंतु प्याज बिना एक पल भी नहीं। प्याज मेरा आदि और अंत है। प्याज के बिना न मुझे खाना हजम होता है न लिखने का आईडिया ही आता है। बोते होंगे लोग बाग अपनी जिंदगी में चरस, मैं तो प्याज ही बोता हूं।

प्याज पर जब भी मुनाफाखोरी या महंगाई का संकट आया है, मैं हमेशा प्याज के साथ खड़ा हुआ हूं। मैंने उन लोगों की कड़ी निंदा की है, जिन्होंने प्याज को बुरा-भला कहा है। मैं उन लोगों का भी सख्त विरोधी हूं जो गाहे-बगाहे प्याज न खाने की सलाह देते हुए पाए जाते हैं। अजी, बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद!

कोई मुझे समझाए कि प्याज के महंगा होने का भला प्याज से क्या मतलब? प्याज ने तो किसी से कहा नहीं कि उसे महंगा करा जाए। उसे तो मालूम भी नहीं होता कि ये सस्ता-महंगा होता क्या है? प्याज के कंधे पर बंदूक रखकर चलाए कोई और दोष बेचारे प्याज को भुगतना पड़े। ये कहां की इंसानियत है दया?

और फिर, प्याज अभी इतना महंगा नहीं हुआ है कि एक सामान्य क्लास का आदमी उसे एफोर्ड न कर सके। 60-70 रुपये किलो ही तो बिक रहा है! ये कोई इतना भारी-भरकम रेट नहीं कि सरे बाजार हाय-तौबा काटी जाए। इससे कहीं महंगा तो टमाटर बिक रहा है। तो क्या लोग टमाटर खाना छोड़ देंगे! हद है यार...।

प्याज की अपनी ताकत है। अपनी राजनीतिक हैसियत है। हालांकि उसने कभी अपनी राजनीतिक हैसियत का फायदा उठाना नहीं चाहा। बल्कि नेता लोग ही उससे खेलते रहते हैं। उधर मुनाफाखोर बाजार में उसका रेट बढ़ा देते हैं सुननी उसे पड़ती है। सब कहते हैं कि प्याज महंगा हो गया। कोई यह नहीं कहता कि प्याज को जानबूझकर महंगा किया गया है। करे कोई, भरे कोई!

मैं भी कम शाणा नहीं। जब-जब प्याज महंगा होता है, तब-तब हर रेट पर उसे खरीदता हूं। देखने वालों की आंखें फटी की फटी रहें इसलिए उसे झोले में नहीं पोली-बैग में भरकर लता हूं। ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं जब खाना मैंने बिना प्याज के खाया हो। प्याज के प्रति अपना स्नेह दिखावा नहीं प्योर वाला है।

मैंने तो अपने हर पड़ोसी तक से कह रखा है, जब जरूरत हो मुझसे प्याज मांग ले जाएं। कभी मना नहीं करूंगा। खाने-पीने की चीजों में भला कैसा भेद-भाव।

मैं फिर कह रहा हूं, बढ़ी कीमतों के लिए दोष प्याज को न दें। उनकी गर्दनों को पकड़ें जिन्होंने बेचारे प्याज को जनमानस के बीच बदनाम किया हुआ है। प्याज तो भोला है। उसे क्या मालूम उसका कौन और किस तरह से फायदा उठा रहा है।

प्याज को इज्जत बख्शें। प्याज खाएं और खिलाएं। प्याज के प्रति अपनी मोहब्बत में कमी न आने दें। जय प्याज।

रविवार, 3 दिसंबर 2017

नाक पर भला क्या गर्व करना!

मुझे अपनी नाक पर कभी गर्व नहीं रहा! रहे न रहे। कटे न कटे। नाक ही तो है कोई इतिहास थोड़े ही कि हर वक़्त ध्यान रखता फिरूं- कौन इसके साथ छेड़छाड़ कर रहा है, कौन सम्मान दे रहा है। यह मैं अच्छे से जानता हूं कि दुनिया में चाहे कुछ हो जाए मेरी नाक जहां है वहां सही सलामत ही रहेगी। फिर क्या फायदा बेमतलब की टेंशन लेने से।

एक मुझे ही नहीं दुनिया भर में किसी को भी अपनी नाक के प्रति मोह नहीं पालना चाहिए। नाक को आपके चेहरे से उठकर कहीं नहीं जाना है। वो अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक वहीं जमी मिलेगी। उसे कोई नहीं उखाड़ सकता।

मेरा तो बचपन से यही मानना रहा है कि मनुष्य की लाइफ-लाइन दिल नहीं बल्कि नाक है। ये नाक ही है जिससे सूंघकर हम पदार्थ की कोमलता और तीव्रता का अंदाजा लगा सकते हैं। संसार भर की खुशबूओं का अस्तित्व नाक की वजह से ही तो कायम है। नाक न होती तो कितना ही सैंट-डियो खुद पर डाल लो किसी को महसूस न होता। नाक न होती तो बीवी या बावर्ची के बने खाने की महक का अहसास ही मन में न जागता।

तो फिर नाक के प्रति इतना फिक्रमंद क्यों रहना? क्यों इतना गर्व करना? अरे, ये सब तो नाक के फर्ज हैं जिन्हें उसे हर हाल में निभाना ही निभाना है।

इन दिनों जिस तरह से इस-उस की नाक काटने की धमकियां सुनाई में आ रही हैं, सब कोरी लफ्फबाजियां हैं। नाक कोई आलू-तुरई थोड़े है कि जब मन करा काट ली। नाक काटने के लिए लक्ष्मण जैसी ताकत और हिम्मत चाहिए होती है। वो भी सूर्पनखा के कु-कर्मों के कारण उसकी नाक काटनी पड़ी थी। वरना इतनी नौबत ही न आती। जबकि यहां तो बेवजह ही नाक-गला काटने के फरमान जारी हो रहे हैं।

फरमान जारी करने वालो में आधे से ज्यादा तो ऐसे महापुरुष होंगे जिन्होंने जिंदगी में कभी भिंडी तक न काटी होगी। चले हैं नाक काटने!

यों भी इंसान एक नाक कटा प्राणी ही है। अपने जन्म से लेकर बुढ़ापे तक जाने कितनी दफा किस-किस तरह से अपनी नाक कटवाता रहता है। लेकिन मुंह से कभी स्वीकारता नहीं कि हां उसकी नाक काटी जा चुकी है। नाक को यों बचाता फिरता है मानो वो कोई सोना-चांदी हो!

न भूलिए, जब तलक मनुष्य का अस्तित्व रहेगा, नाक का भी रहेगा। फिर खामखां की चिंता क्यों?

गर्व नाक पर मत कीजिए। गर्व करना ही है तो जीभ पर कीजिए। जीभ कंट्रोल में रहेगी तो नाक भी बची रहेगी। बाकी कहते-गाते कुछ भी रहिए।

बुधवार, 29 नवंबर 2017

पत्नी को चाहिए रोशोगुल्ला

पत्नी को रसगुल्ला बेहद पसंद है। इतना पसंद कि एक दफा बहसबाजी के दौरान उसने रसगुल्ले को मुझसे बेहतर करार दिया था। उसकी मिठास को मेरी मिठास से दस गुना उम्दा बताया था। पसंद चूंकि पत्नी की है, इस नाते मैं उससे अधिक बहस बही नहीं कर सकता। यों भी, पत्नियों से बहस के दौरान बहुत-सी बातों का खास ख्याल रखना पड़ता है।

खैर...!

पत्नी के संज्ञान में जब से रसगुल्ले के बंगाल की झोली में चले जाने की बात आई है उसने लगभग जिद-सी पकड़ ली है कि उसे दास बाबू के यहां का ही रोशोगुल्ला खाना है। अब कहां कलकत्ता और कहां बरेली! सिर्फ रोशोगुल्ला लेने कलकत्ता जाना इतना आसान है क्या! आए दिन ट्रेनों की लेट-लतीफी उसको मालूम नहीं? तब भी एक ही जिद।

हालांकि कई दफा समझा चुका हूं उसको यों बच्चों वाली जिद न करे। रसगुल्ला खाना ही है तो बरेली में रसगुल्ले की दुकानों की भला क्या कमी। हां, ये बात सही है कि यहां के रसगुल्लों में बंगाल के रोशोगुल्लों जैसा स्वाद तो नहीं आ सकता फिर भी जीभ को तो तृप्त कर ही सकता है।

रसगुल्ले के चाहने वालो की उसके प्रति दीवानगी को समझ सकता हूं। यह दीवानगी और प्यार का ही तो असर रहा जो बंगाल वालो ने ओडिशा वालो से रसगुल्ले पर मालिकाना अधिकार को जीत लिया। अच्छा ही हुआ, नहीं तो बेचारा दो राज्यों के आपसी विवाद के बीच पिसता रहता।

मगर मेरे और पत्नी के बीच रसगुल्ले को लेकर विवाद अभी तलक कायम है। इसका फैसला न कोई अदालत कर सकती है न घर-परिवार वाले। मैं भी अच्छी तरह से जानता हूं कि अन्ततः झुकना मुझे ही पड़ेगा। फिर भी मामला जितना और जहां तक लंबा खींच जाए क्या हर्ज है।

पत्नी का कहना है कि वो बंगाल के रसगुल्ले को खाकर उसके स्वाद को 'फील' करना चाहती है। उसकी आत्मा तक घुस जाना चाहती है। मानो, रसगुल्ला कोई आलू हो जिसे मशीन में डालते ही वो सोना उगलने लगे। रसगुल्ले रसगुल्ले सब एक से चाहे बंगाल का हो या बरेली का।

कहीं पढ़ा था कि बनारस में रहने वाले कुछ बंगाली यह तक कहते हैं कि रसगुल्ला उन्होंने बनाया है। और एक दफा जिसने उनका बनाया रसगुल्ला खा लिया तो बंगाल, ओडिशा के रसगुल्ले को भूल जाएगा। अजी, दावा पेश करने में क्या जाता है। कल को अगर मैं यह कहने लग जाऊं कि मैं परसाई जी से बेहतर व्यंग्य लिख सकता हूं। तो क्या मेरे खुशफहमीनुमा दावे पर यकीन कर लिया जाएगा। कभी नहीं...।

फिलहाल तो कोशिश जारी है पत्नी को रसगुल्ले पर मनाने की। कभी मौका पड़ा तो बंगाल का रोशोगुल्ला उसको खिला दिया जाएगा। तब तक वो बरेली के रसगुल्ले का ही स्वाद ले। तिस पर भी नहीं मानती है तो फिर एक ही चारा होगा मेरे कने बंगाल की यात्रा का। वो भी रसगुल्ले की खातिर। 

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

'ऑटो-करेक्ट' के लफड़े

उस कहावत 'इंसान गलतियों का पुतला है' को हमने मोबाइल फोन के 'की-पैड' में मौजूद 'ओटो-करेक्ट' फीचर पर डाल- छोटी-मोटी गलतियों से कम्पलीट मुक्ति पा ली है। शब्दों-वाक्यों में अगर किसी को कहीं कोई गलती मिलती है और उसके लिए अगला हमें टोकता भी है तो हम यह कहकर- 'यार, ऐसा 'ऑटो-करेक्ट' के कारण हुआ होगा'- आसानी से पिंड छुड़ा सकते हैं।

हमारे जीवन में व्यस्तताएं इस कदर बढ़ गईं हैं कि अपने ही लिखे को जांचने की फुर्सत हमारे पास नहीं। 'की-पैड' पर उंगलियां जैसा, जो भी लिख डालें सब मंजूर है। यों, सोशल मीडिया पर 98वें लोग अगर 'अशुद्ध' लिख रहे हैं 99वें अगर आप लो लिए तो कौन-सा पहाड़ खिसक जाना है!

लुत्फ तो ये है कि कभी-कभी 'ऑटो-करेक्ट' खुद ही मनमानी पर उतर आता है। भले ही आप किसी शब्द या वाक्य को एकदम सही लिख रहे हैं लेकिन बीच में वो अपनी टांग घुसेड़कर उसे सही जाने नहीं देता। सही शब्द-वाक्य को भी 'अंडर-लाइन' कर गलत बता देता है। अब चूंकि 'ऑटो-करेक्ट' हमसे शब्द को सही करने को बोल रहा है तो भला हम उसकी बात को कैसे टाल सकते हैं। हम भी वही लिख डालते हैं जो जैसा उसने हमें सूचित किया है। ऐसे में भला हम कैसे 'ऑटो-करेक्ट' की गलती को अपने सिर ले सकते हैं! 'ऑटो-करेक्ट' की गलती ऑटो-करेक्ट ही जाने।

किसी और को दोष क्यों दूं मैं खुद 'ऑटो-करेक्ट' के भ्रमजाल में फंसा हुआ हूं। अपने दिमाग से कम 'ऑटो-करेक्ट' की नसीहत से अधिक चलता हूं। जाने कितनी दफा शब्द का अनर्थ कर चुका हूं। यहां तक कि अपने नाम के साथ भी 'ऑटो-करेक्ट' का खेल खेल चुके हूं। तब भी बाज न आता। 'ऑटो-करेक्ट' की ऐसी लत पड़ चुकी है कि अपने सही लिखे शब्द भी कभी-कभी गलत से नजर आते हैं।

सोने पे सुहागा 'की-पैड' के साथ उपलब्ध होने वाली 'डिक्शनरी' कर देती है। साथ में डिक्शनरी लेके बैठने की जरूरत ही नहीं बची है। लिखे जा रहे शब्द से मिलता जुलता शब्द डिक्शनरी पेश कर ही देती है। उसे चिपकाइये और निश्चिंत होकर लिखते जाइए। सही-गलत का जिम्मा 'ऑटो-करेक्ट' और 'डिक्शनरी' पर छोड़िए।

अपने लेखन में अक्सर निकलने वाली शाब्दिक गलतियों के प्रति अब मैंने गंभीर होना छोड़ दिया है। कोई अगर टोकता भी है तो कहता देता हूं, संभावताः 'ऑटो-करेक्ट' के कारण हुआ होगा!

सोमवार, 13 नवंबर 2017

खुशनसीबी: जिनके नाम 'पैराडाइज पेपर्स' में आए!

कहते हैं, मोक्ष स्वर्ग जाकर ही मिलता है! धरती पर रहकर इंसान कर्म चाहे कैसे भी करे पर अंतिम इच्छा उसकी स्वर्ग जाने की ही रहती है। स्वर्ग से मनुष्य का मोह अब का नहीं आदि काल से है। नरक में जाने की तमन्ना तो चोर-अपराधी भी नहीं रखना चाहते। जो भी हो पर स्वर्ग का हमारे जीवन में अच्छा-खासा क्रेज है। यकीन मानिए, कभी-कभी तो बैठे-ठाले मैं भी स्वर्ग जाने की इच्छा अपने मन में गढ़ लिया करता हूं।
धरती पर रहकर कलयुग का आनंद बहुत ले लिया। एक दफा स्वर्ग का लुत्फ भी तो लेकर देखना चाहिए कि नहीं...! इस बहाने बड़े-बड़े देवी-देवताओं से ही मुलाकात हो जाएगी।

सच पूछिए तो मैं उन महान हस्तियों को 'खुशनसीब' मानता हूं जिनका नाम 'पैराडाइज पेपर्स' में आया! जिस कांड के साथ ही पैराडाइज (स्वर्ग) जुड़ा हो वो भला 'गलत' कैसे हो सकता है? इसे तो साक्षत देवताओं का वरदान माना जाना चाहिए! मानो- ये पैराडाइज पेपर्स उन्हीं सेलेब्रिटीज़ के लिएही  रचा गया हो!

इस 'नश्वर संसार' में भांति-भांति के लोग हैं। यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। 'कुछ भी हो सकता है' के लिए खाली-पीली में टेंशन लेने को मैं उचित नहीं मानता। इससे पहले पनामा पेपर्स में जिन ऊंची हस्तियों के नाम आए थे, सिवाय मियां नवाज शरीफ को छोड़के, बाकी किसी के साथ कुछ भी 'बुरा' नहीं हुआ। वो तो मियां शरीफ राजनीतिक उठा-पटक के लपेटे में आ गए। वरना तो गाड़ी चल ही रही थी।

सिंपल-सा फंडा है, बड़े आदमी की चोरी चोरी नहीं 'वरदान' समझी जाती है जबकि छोटा आदमी अगर चोरी से सांस भी ले ले तो तरह-तरह की धराएं लगाकर उसे निपटा दिया जाता है। इस फर्क को समझें और चिल करते रहें।

दरअसल, घपलों-घोटालों के मामले में हम एक बेहद बेफिक्रे मुल्क हैं। विडंबना देखिए, घपले करने वाले ही अक्सर आदर्शवाद और ईमानदारी पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं। विज्ञापनों में साफ-सफाई व स्वच्छता के उपदेश देने वाले अपना टैक्स दूसरे देश में जाकर बचाते मिलते हैं। जब नाम अख़बारों की सुर्खियों में आ जाता है तो बड़े ही फ़ॉलोसिफिकल अंदाज में 'शांति' का पाठ पढ़ाने लगते हैं। साथ-साथ अपनी बढ़ती उम्र का वास्ता भी दे देते हैं।

वो मशहूर कहावत है न- 'हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं'। तो यही कहावत यहां भी अक्षरशः फिट बैठती है।
फिल्मी या पॉलिटिकल सेलिब्रिटियों का नाम चाहे पनामा पेपर्स में सामने आया हो या पैराडाइज पेपर्स में सेहत और चेहरे पर पीलापन अभी तलक किसी के भी देखने को नहीं मिला है। न ही मिलेगा। बड़े-बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें!

वे तो मन ही मन प्रसन्न हो रहे होंगे चाहे कैसे भी आया चलो नाम तो आया। आजकल हर कहीं नाम का ही बोल-बाला है। नाम चाहे बदनामी से मिले या नेक-कर्म से। बस, नाम होना चाहिए। सेलिब्रिटियों को तो वैसे भी थोड़ा बदनाम होकर मिले नाम को एन्जॉय करने में ज्यादा आनंद आता है। अक्सर बदनामियां ही उनकी फिल्में चला ले जाती हैं। समाज भी ऐसे सेलिब्रिटी को ही महत्त्व देने लगा है जो किसी न किसी स्तर पर कुछ न कुछ बदनाम तो हो ही!

सोशल मीडिया अपनी बदनामियों को वायरल करने का सबसे सशक्त माध्यम है आजकल।

पैराडाइज पेपर्स के जरिए मिले नाम को तो सीधा स्वर्ग से मिला वरदान ही माना जाएगा न!

हालांकि विकास-प्रधान सरकार कह जरूर रही है कि पैराडाइज पेपर्स में आए नामों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी मगर फिर आंखों के सामने 2जी और कोयला घोटाला आ जाता है और खुशफहमी दइमाः पर धीरे-धीरे कर असर जमाने लगती है। कुर्सी पर बैठकर कोई भी राजनीतिक जुमला छेड़ने में कुछ नहीं जाता। बस ज़बान ही तो हिलानी होती है। यों भी, राजनीति ज़बान हिलाने का ही तो खेल है। जिसकी जितनी लंबी ज़बान उसका उतना ही ऊंचा जुमला। क्या समझे...!

कृपया ध्यान में रखें जहां स्वर्ग, धर्म, आस्था आदि का मसला बीच में आ जाता हैं वहां सारी की सारी ऊंची बातें धरी की धरी रह जाती हैं। चूंकि पैराडाइज पेपर्स में ऑलरेडी स्वर्ग घुसा हुआ है, तो इसमें कुछ 'कठोर' होता हुआ दिखाई पड़ेगा, उम्मीद कम ही है पियारे! स्वर्ग-सम्मत किसी मसले में अपने नाम का शामिल होना 'गर्व' की बात मानी जाए! है कि नहीं...!

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

कूड़े पर बहस के बहाने

उस दिन मोहल्ले में दो पड़ोसी आपस में सिर्फ इस मुद्दे पर भिड़ लिए कि तूने मेरे घर के आगे कूड़ा क्यों डाला! दोनों के मध्य बहुत देर तक इस मुद्दे पर हल्की-फुल्की गालियों के साथ विचार-विमर्श चलता रहा। बात कूड़े के रास्ते होती-होती कभी एक दूसरे के खानदान तक पहुंच जाती तो कभी एक-दूसरे के अत्यंत निजी प्रसंगों तक। कुछ देर के लिए यह समझना दुर्लभ जान पड़ता कि दोनों के बीच विमर्श या बहस का विषय है क्या?

अक्सर जब आप किसी 'राष्ट्रीय समस्या' पर आपस में बहस को जुटते हैं तो विषय से इतर दो-चार बातें हो ही जाती हैं। बहस को प्रासंगिक बनाए रखना बहुत जरूरी है ताकि आस-पास के लोग भी इंटरेस्ट के साथ उसमें शरीक हो सकें।

यों भी, कूड़े पर लड़ाई या बहस हमारे देश की अनादि काल से राष्ट्रीय समस्या रही है। शायद ही ऐसा कोई शहर, घर, मोहल्ला, कॉलोनी, सोसाइटी हो जहां इस मुद्दे पर लोग आपस में लड़े-भिड़े न हों। बहुत से मामलों में तो बात थाना-कोतवाली, कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंच चुकी है। तिस पर भी लोग अपने व्यवहार में अंतर न ला पाए हैं।

बात जहां तक आपस में भिड़ने की है तो हम कूड़े तो क्या भूलवश एक-दूसरे से टच हो जाने तक पर भिड़ लेते हैं। भिड़ना हमारी 'लड़ताऊ संस्कृति' का अहम हिस्सा-सा है। इसे हम कदापि नहीं त्याग सकते।

दूसरी तरफ सरकार के तमाम छोटे-बड़े मंत्री जी-जान से जुटे हैं कूड़े की समस्या के निस्तारण के लिए। आए दिन किसी न किसी अखबार में कोई न कोई मंत्री साफ-सुथरी झाड़ू पकड़े नजर आ ही जाता है, कूड़ा (गंदगी) साफ करते हुए। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि मंत्रीजी के जाने से पहले ही कथित जगह पर कूड़े को पहुंचा दिया जाता है। ताकि मंत्रीजी की कूड़े को झाड़ू मारते हुए फोटू टनाटन आ सके।

विपक्षी लोग इसे बेशक पब्लिसिटी का फण्डा मान सकते हैं किंतु है ये खालिस नेक काम है। नेक कामों के लिए पब्लिसिटी का दरवाजा हमेशा खुला रखना चाहिए।

देखिए, सुधरते-सुधरते ही हममें सुधार आ पाएगा। सुधार कोई जादुई छड़ी न होता कि घुमाई और असर चालू।

कूड़े पर झगड़े-टनटें शाश्वत हैं। ये कभी न कम होने। फिर भी, यह उम्मीद तो कायम है ही कि एक दिन कूड़े पर बाजी हम जीत ही लेंगे।

सोमवार, 6 नवंबर 2017

मंदड़ियों से भी सहानुभूति रखिए

मंदड़ियों से 'सहानुभूति' रखने का कोई भी मौका मैं हाथ से नहीं जाने देता। मंदड़ियों से सहानुभूति रख मुझे ऐसी ही 'शांति' मिलती है जैसे भक्त को अपने ईश्वर की उपासना कर। मैं उन 'मतलबी' लोगों में से नहीं हूं जो टेढ़े वक़्त में 'मजबूर आदमी' का साथ छोड़ दे। आजकल मंदड़ियों की स्थिति लगभग मजबूर आदमी जैसी ही हो रखी है।

इधर, सेंसेक्स ने 33 हजार के पार जब से 'जम्प' लगाई है बेचारे मंदड़ियों के 'खराब दिन' आ लिए हैं। सेंसेक्स के गिरने की उम्मीद में बनाया गया उनका हर 'नक्का' लगभग 'फेल' साबित हो रहा है। कल तक वे दलाल पथ पर 'सीना चौड़ा' कर घूमते पाए जाते थे, इन दिनों आलम यह है कि वे अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं। ऐसी विकट मार मारी है सेंसेक्स ने न सहलाते बन रहा है न मरहम लगाते।

सेंसेक्स की महिमा भी अपरंपार है। कब किस करवट, ऊंट की मानिंद, पलट या बैठ जाए कोई नहीं जानता। 2014 के बाद से इसने जो तेजी पकड़ी है अब तक हाथ न आ पाया है मंदड़ियों के। अपवादस्वरूप छोटी-मोटी गिरावटों को अगर परे रखें तो भी सेंसेक्स अपनी रौ में मस्तराम ही बना हुआ है। मार्केट के जानकार लोग बता रहे हैं कि सेंसेक्स में बनी तेजी को अभी कुछ साल और प्रभावी रहना है!

हालांकि स्टॉक मार्केट में कुछ भी 'निश्चित' नहीं है, जैसे कभी क्रिकेट में अंतिम गेंद तक नहीं होता, फिर भी अगर ऐसा हुआ तो मंदड़ियों की तो विकट वाली वाट लग ही जानी है। जाने कितने मंदड़ियों को सदमे में आ जाना है। जाने कितने मंदड़ियों के चूल्हे बंद हो जाने हैं।

मैं तो कभी-कभी मंदड़ियों के खराब दिनों की स्थिति को सोचकर लगभग अवसाद टाइप माहौल में चला जाता हूं। वे मंदड़िये हुए तो क्या हुआ; हैं तो अपने ही भाई लोग न।

देखो जी, क्षेत्र चाहे स्टॉक मार्केट का हो चाहे लेखन या राजनीति का- अपना तो बचपन से यही मनाना रहा है- कि दुकान सबकी चलती रहनी चाहिए। ऐसा कभी न होना चाहिए कि फलां की दुकान में तला पड़ जाए। आज के जमाने में किसी भी टाइप की दुकान को चलाए रखना 'वैवाहिक जीवन' को चलाए रखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है! क्या समझे पियारे...।

एक तरफा तेजी या एक तरफा मंदी दोनों की स्टॉक मार्केट की सेहत और देश की इकोनॉमी के लिए 'घातक' हैं। दोनों के बीच बैलेंस बराबर का बना रहना चाहिए। अच्छा, थोड़ा मंदड़ियों को भी यह समझना चाहिए कि 'सब दिन होत न एक समान'। उनके दिमाग में जब 24x7 मंदी-मंदी ही घूमेगी, तो ऐसे कैसे चलेगा। एक न एक दिन ऊंट को पहाड़ के नीचे आना ही होगा। जैसाकि इन दिनों आया हुआ है। सेंसेक्स का घोड़ा राणा प्रताप का 'चेतक' बना हुआ है। न किसी के रोके रुक रहा है न किसी के ठहरे ठहर।

बेचारे मंदड़िये इस 'खुशफहमी' में फंसे हुए हैं कि बुल नीचे का रूख करे तो बेयर उस पर हावी होए। मगर बुल को तो ऊंचाई का ऐसा चस्का लगा हुआ है कि 33 हजार के पहाड़ पर चढ़ मंदड़ियों के साथ-साथ बेयर को भी चिढ़ा रहा है। सच पूछिए तो अच्छे दिन बुलिश सेंसेक्स के ही आए हैं।

शेयर मार्केट में गुजारे अपने लंबे कॅरियर में मैंने ऐसे तमाम तीसमारखां मंदड़िये भी बहुत नजदीक से देखे हैं जो बार-बार चोट खाकर भी अपनी मंदी की प्रवृत्ति को छोड़ते नहीं। बाजार चाहे कितना ही क्यों न बढ़ जाए उनका नक्का तो सेंसेक्स को गिराने पर ही केंद्रित रहता है। हर आती और जाती सांस के साथ वे यही दुआ करते हैं कि कब बुल घड़ाम हो और वे उस पर चढ़ाई करें। गिरने वाले पर हंसना या ताली बजाना हमारी सदियों पुरानी आदत रही है।

फिर भी, सेंसेक्स में बनी तेजी की इस बेला में हमें मंदड़ियों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। उनसे पूरी नहीं तो 'आंशिक सहानुभूति' तो रखनी ही चाहिए। आखिर वे भी स्टॉक मार्केट की व्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। उनका 'मंदी-प्रूफ नजरिया' यह बताने के लिए काफी है कि आप शेयर मार्केट से गिरावट के समय में भी अच्छा कमा सकते हैं। बस मंदी को सहन करने का जज्बा होना चाहिए भीतर।

वैसे, मंदड़िये (मजबूरी के बाद भी) मजबूत दिल के मालिक होते हैं। इसलिए तो मैं उनके प्रति सहानुभूति रखने का कोई मौका छोड़ता नहीं।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

अबकी दफा गलके ही रहेगी खिचड़ी

तब उस जमाने में बीरबल की खिचड़ी कब और कितनी गली मुझे नहीं मालूम! अकबर के राज में खिचड़ी के कितने अच्छे दिन रहे, इसका भी कोई खास प्रमाण नहीं मिलता। या फिर तब के राजा-महाराजाओं ने खिचड़ी को 'राष्ट्रीय फूड' बनाने के लिए कितने और कहां तक प्रयास किए, ये भी पता नहीं चलता।

पर इतना तो पक्का मालूम है कि खिचड़ी का दबदबा नीचे से लेकर ऊपरी तबके तक टनाटन है। बोले तो सबकी फेवरेट।

मगर हां वर्तमान सरकार जरूर खिचड़ी के 'अच्छे दिन' लाने के प्रति 'कृत-संकल्प' है। सुनाई में आ रहा है कि खिचड़ी को 'राष्ट्रीय फूड' घोषित कराने के प्रयास जोर-शोर से चल रहे हैं। और लग रहा है, इस दफा खिचड़ी गलके ही रहेगी। बीरबल की खिचड़ी की तरह अध-गली नहीं रहने दी जाएगी। आखिर खिचड़ी के सम्मान का सवाल है।

यह खासा दुखद रहा है कि पिछली सरकारों ने खिचड़ी की तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया। उसे लगभग 'उपेक्षित' ही रख छोड़ा। जबकि खिचड़ी की जनमानस के बीच मजबूत पैठ को देखते हुए उसे राष्ट्रीय फूड का खिताब बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। न भूलिए, रसगुल्ला और समोसे के साथ-साथ खिचड़ी भी हमारी 'संस्कृतिक प्रतिष्ठा' का प्रतीक है। खिचड़ी अगर गरीब के पेट का सहारा है तो होटलों-रेस्तरां-ढाबों की खास डिमांड भी है।

जिस प्रकार हर खुशी के लिए मिठाई जरूरी है उसी प्रकार हर टाइप की भूख के लिए खिचड़ी जरूरी है। चाहे हम कितना ही महंगा खाना क्यों न खा लें पर पेट के चूहे तो देसी खिचड़ी खाकर ही शांत होते हैं।

अजी औरों की जाने दीजिए, मैं खुद खिचड़ी का बहुत बड़ा वाला फैन हूं। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि मैंने पैदा होते ही पहला शब्द 'खिचड़ी' ही बोला था। खुशनसीब हूं मैं कि मेरा बचपन खिचड़ी के साये में बीता। तब चॉकलेट या चिप्स की जगह खिचड़ी खाकर ही हम अपनी छोटी-छोटी भूखों को भगा दिया करते थे।

न केवल खाने बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी खिचड़ी ऐसे रची-बसी हुई है जैसे- आजकल मोबाइल और इंटरनेट। शायद ही कोई बात या उदहारण खिचड़ी का नाम लिए बिना पूरी होता हो!

हम सब हर रोज अपने-अपने तरीके से किस्म-किस्म की खिचड़ियां पका-गला रहे हैं। कोई सिर्फ बातों की खिचड़ी पका रहा है तो कोई राजनीति में अपनी खिचड़ी गला रहा है। कुछ तो ऐसे भी हैं जो स्त्रियों के इन-बॉक्स में अपनी खिचड़ी गलाने की प्रतीक्षा में रत रहते हैं।

सोशल मीडिया में तो 24x7 खिचड़ी पकती-गलती ही रहती है।

खिचड़ी को राष्ट्रीय फूड बनाने के वास्ते जोर लगाने के लिए सोशल मीडिया का भी खास रोल रहा है। आलम यह है कि ट्विटर, फेसबुक पर आने वाली हर दूसरी पोस्ट खिचड़ी के प्रमोशन पर ही केंद्रित रहती है। रहेगी भी क्यों नहीं आखिर खिचड़ी हमारी आन-बान-शान जो है।

बुधवार, 1 नवंबर 2017

नेताओं के बिकने पर इतना हंगामा क्यों!

जब दूल्हा बिक सकता है, खिलाड़ी बिक सकते हैं तो नेता क्यों नहीं बिक सकते? समझ नहीं आता- नेताओं के बिकने पर ही इतना हंगामा क्यों खड़ा किया जाता? मीडिया से लेकर समाज-सुधारक तक बिके नेता के पीछे यों पड़ जाते हैं मानो उसने बिककर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो!

जरा-सी बात लोग नहीं समझते, नेता कोई अपने लिए थोड़े ही न बिकता है! वो बिकता है देश, लोकतंत्र और अपनी पार्टी की खातिर! वो बिकता है ताकि चुनावों के दौरान- बरसों से चली आ रही खरीद-फरोख्त की परंपरा को जिंदा रख सके! परंपराओं के साथ जुड़ाव जितना नेता लोग रख लेते हैं उतना कोई न रख पाता!

चुनावी माहौल में तो नेताओं की खरीद-बेच कोई नई बात नहीं होती। तकरीबन हर पार्टी में ये चलता है। नेताओं की खरीद-फरोख्त एक तरह से 'चुनावी शगुन' टाइप होती है। बिना इसको निभाए न चुनावों में मजा आता है न हार-जीत को देखने में।

राजनीति में विचारधाराएं अब बीते जमाने की बातें हुईं। विचारधारा के हिसाब से नेता या पार्टी अगर चलने लगे न तो चार दिन में ही भट्टा बैठ जाएगा। हां, देश, समाज और जनता को दिखाने को हर नेता और पार्टी अपनी-अपनी विचारधारा का गुणगान अवश्य करते हैं किंतु वास्तविकता में यह सब होता नहीं। सिंपल-सी बात है, आज की तारीख में न तो कोई दल दूध का धुला है न ही कोई नेता हमाम में नंगा। हर कोई अपने तरीके से अपनी दुकान चलाने में मशगूल है।

फिर भी हैं बुद्धिजीवि किस्म के कुछ लोग समाज में जिन्हें नेताओं के बिकने-बिकाने पर सख्त एतराज रहता है। पर उनके कहे की चिंता ही कौन करता है यहां? जाहिर करते रहें वे अपना एतराज, खरीद-फरोख्त तो फिर भी चलनी ही है।

राजनीति में कुछ बातें अब इतनी सामान्य हो ली हैं कि जिनके घटने पर- थोड़ा-बहुत समय तो हो-हल्ला होता है- फिर सब अपने-अपने कानों में तेल डालकर ऐसे बैठ जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। बदलते वक्त ने क्या नेता, क्या पार्टी, क्या जनता सबको बदल डाला है।

मेरा तो स्पष्ट मानना यही है कि जो हो रहा है होता रहने दें। समय सबका इतिहास खुद लिख देगा। नेताओं में मची ख़रीद-फरोख्त की भेड़-चाल आंशिक ही सही पर राजनीति का आगे आने वाला समय इससे भी विकट होगा।

सब पर खाक डाल आप तो सिर्फ मौज लीजिए। बाकी वक़्त की चाल पर छोड़ दीजिए।

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

33 हजार पार सेंसेक्स और विकास का चर्मोत्कर्ष

सेंसेक्स 33 हजार के पार निकल गया और आप कह रहे हैं कि विकास होता दिखाई नहीं दे रहा! निफ्टी 10 हजार के शिखर पर चढ़ इठला रही है और आप कह रहे हैं अच्छे दिन कहां आए हैं! वित्तमंत्री जी ने बैंकों को दो लाख करोड़ रुपये का बूस्टर दे दिया और आप कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था खड्डे में जा रही है! कितनी दकियानूसी सोच रखते हैं न आप!

कुछ मालूम भी है, सेंसेक्स का 33 हजार की चोटी पर पहुंचना विश्व भर में हमारे देश की अर्थव्यवस्था की नाक ऊंची कर गया है। दुनिया को अब हमारी अर्थव्यवस्था का लोहा मानने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा। स्टॉक मार्केट की सेहत जिस तेजी से दिन-ब-दिन सुधर रही है इसमें आर्थिक सुधारों की बहुत बड़ी भूमिका है।
सेंसेक्स ने हमें सिरमौर बना दिया है।

मेरा माथा तो सेंसेक्स की सफलता को देखकर गर्व से ऊंचा हो उठा है। कथित मंदड़ियों को सेंसेक्स ने एक ही झटके में पानी पिला डाला है। बड़ा कमजोर कह-कहकर सेंसेक्स का हर समय मजाक उड़ाया करते थे मगर क्या खूबसूरत खामोशी के साथ उसने उन्हें प्रति-उत्तर दिया है।

चाहे कोई माने या न माने पर देश में चमत्कारी विकास तो सेंसेक्स ही लेकर आया है। अपने पिछले सभी दुख-दर्दों को परे रखकर सेंसेक्स ने जिस बहादुरी के साथ खुद को स्टेबलिश किया है, वाकई काबिले-तारीफ है। वरना इतनी गर्त में चले जाने के बाद पुनः उठ खड़े होने में अच्छों-अच्छों के टांके ढीले पड़ जाते है। किंतु अपने सेंसेक्स ने हार न मानी। इसीलिए तो कहते हैं- कर्म किए जाओ फल की चिंता करे बिना।

जनता हूं प्रिये सेंसेक्स की आतिशी सफलता से सबसे ज्यादा दर्द विपक्ष के पेट में ही हो रहा होगा। मन ही मन उसे कोसे जा रहे होंगे। सेंसेक्स की कामयाबी पर उसे बधाई देना तो दूर रहा- कह रहे होंगे, सेंसेक्स ने 33 हजार का स्तर पार कर पूंजीपतियों को ही खुश किया है। ये भी कोई बात हुई भला! सेंसेक्स हमारा है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख टूल है। उसकी जीत को यों इग्नोर करना ठीक बात नहीं।

विपक्ष का बात-बेबात विकास को गरियाना भी कुछ जंचता नहीं। विकास चाहे सेंसेक्स के रास्ते हो या ताजमहल के विकास होना चाहिए। देश-दुनिया में अर्थव्यवस्था का मान बढ़ना चाहिए। यों भी, सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है तो विकास कायम करने में। कर भी रही है।

सौ बात की एक बात तो यह है कि हर समय रोते रहने से कुछ मिलने-मिलाने वाला नहीं। रो-रोकर अपनी आंखें दुखाने से क्या फायदा?

सेंसेक्स ने फिलहाल मस्त गति पकड़ी हुई है। ऐसे ही अगर चलता रहा तो एक दिन 50 हजार के पार भी निकल लेगा। अभी तो चमक ही रहा है तब और अधिक चमका देगा देश की एकोमोमिक्स को।

चिंता बस थोड़ी-सी यही लगी रहती है- सेंसेक्स की कामयाबी को किसी की नजर न लगे।

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

ताजमहल के बहाने

आजकल ताजमहल पर खूब जिक्र छिड़ा हुआ है तो यह किस्सा याद आ गया।

कुछ साल पहले पत्नी ने भी ऐसी ही एक तमन्ना मुझ पर जाहिर की थी कि मैं उसके खर्च होने के बाद उसकी याद में 'ताजमहल' जैसा कुछ बनवाऊं! तब इस मसले पर हमारे बीच तगड़ी बहस हुई थी। बात तलाक के रास्ते होती हुई थाना-कोतवाली तक पहुंच गई थी। न केवल मोहल्ले के पड़ोसियों बल्कि रिश्तेदारों ने भी खूब तमाशा देख फुल-टू मजे लिए थे।

पता नहीं पत्नी के दिमाग में यह बात कहां से बैठ गई थी कि मैं उसके वास्ते ताजमहल टाइप (प्रेम की धरोहर) बनवाने की हैसियत रखता हूं। जबकि मेरी आर्थिक वस्तुस्थिति से वो काफी अच्छी तरह वाकिफ थी। ताजमहल बनवाने को वो बच्चों से भी आसान खेल समझती थी। उसे लगता था मरे कने धन-दौलत का एक ऐसा 'गुप्त पेड़' है, जहां 24x7 पैसे लटके ही रहते हैं। जब जरूरत हो। जाओ और तोड़ लाओ।

वो तो शाहजहां साहब का ही बूता था जो उन्होंने अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल बनवा डाला। वरना, आजकल तो आशिक लोग अपनी महबूबा के लिए मोबाइल रिचार्ज से आगे कहां बढ़ पाते हैं! प्रेशर जब ज्यादा पड़ता है तो अपनी ईएमई पर एक फोन खरीदकर दे देते हैं।
मगर कभी-कभी मुझे लगता है, शाहजहां साहब ने ताजमहल बनाकर देश के आशिकों और मुझ जैसे पतियों को विकट मुसीबत में डाल दिया। अपवादों पर खाक डाल भी दें तो कुछ महबूबाओं और पत्नियों की ख्वाहिश यह तो रहती ही है कि उनका आशिक या पति उनके लिए एक ताजमहल टाइप बनाकर तो दे ही। पर ये सोचने की जहमत नहीं फरमातीं की तब के समय और अब के समय में जमीन-आसमान से भी अधिक अंतर आ चुका है। अगर ईएमई का सहारा न होता तो अब तक तलाक के केसोंं की बाढ़-सी आ गई होती।

चौदवीं का चांद दूर से देखने में ही खूबसूरत लगता है। करीब आने पर तो हजार तरह की मुसीबतें दर-पेश आती हैं।

इधर ताजमहल पर जब से विवाद छिड़ा है पत्नी को याद दिला रहा हूं उसकी वो जिद। बुझे मन से पत्नी भी यह स्वीकार करने लगी है कि अच्छा ही हुआ जो मैंने तब उसकी बात न मानी। वरना, आज मुझे भी कोई उस 'दूसरे ताजमहल' के लिए कोस रहा होता!

वर्तमान में बने रहने में ही हजार सुख हैं। इतिहास के पीछे भागना खुद को दिगभ्रमित करने जैसा ही है। क्या नहीं...!

समस्याएं ही समस्याएं

समस्या देश में नहीं होती। लोगों के 'दिमाग' में होती है। दिमाग से होते-होते समस्या जब ज़बान पर आती है तब वह 'देश की समस्या' बन जाती है। देश की समस्याओं को हल करने के लिए बड़े-बड़े 'दिमागदार' लोगों की सहायता ली जाती है। दिमागदार लोग समस्या को हल करने में अपना अगला-पिछला सारा जोर लगा देते हैं। समस्या का हल खोजते-खोजते कुछ तो खुद अपने लिए ही समस्या बन जाते हैं।

धीरे-धीरे धरती पर समस्याओं का बोझ इस कदर बढ़ता चला जाता है कि हर समस्या एक-दूसरे से पूछती है- 'पार्टनर! तेरी समस्या क्या है? एक समस्या हो तो बताई-समझाई भी जाए। यहां इंसानों से ज्यादा तो समस्याएं हैं। कुछ समस्याएं तो ऐसी भी हैं कि इंसान के मरने के बाद भी उसका पिंड न छोड़तीं। उम्मीद करता हूं, यमराज इंसान को ले जाने से पहले उससे उसकी या दुनिया की समस्या अवश्य ही पूछ लेता होगा!

आजादी से पहले और आजादी के बाद की समस्याएं हमेशा एक-दूसरे के 'काउंटर' में लगी रही हैं। न पहले वाली समस्याएं हल हो पाती हैं न बाद वाली। ऊपर से 'लुत्फ' यह, जब से सोशल मीडिया अस्तित्व में आया तब से समस्याओं का मानो 'अंबार' ही खड़ा हो गया है। मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं, धरती से कहीं ज्यादा समस्याएं सोशल मीडिया पर हैं।

जिसे देखो वो अपने फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप के स्टेटसों पर किसी न किसी समस्या का राग छेड़े बैठा है। हालांकि गाना किसी को नहीं आता। गा मगर सब रहे हैं।

देश की समस्याएं कूड़े का ढेर बनती जा रही हैं। हर कोई अपने घर के एंटरेंस को साफ-सुथरा रखने के लिए दूसरे के घर के आगे कूड़ा डालने में लगा पड़ा है। कूड़े पर झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। झगड़ों के समाधान के वास्ते यूएन तक गुहारें लगाई जा रही हैं। बेचारा यूएन परेशान है कि किस कूड़े (समस्या) से निपटे किसे न्यूट्रल छोड़ दे।

इसीलिए तो मैंने समस्याओं पर सोचना ही बंद कर दिया है। एंवई टेंशन लेने से कोई फायदा नहीं। अपने दिमाग को मैं किस्म-किस्म के 'फितूरों का घर' ही बनाए रहने देना चाहता हूं। मैं उन पुराने लोगों में से नहीं, जो देसी घी खाके अपने शरीर एवं दिमाग को 'मजबूत' रखा करते थे। मैं तो 'रिफाइंड युग' की पैदाइश हूं। जरा-सी समस्या से मेरा कॉलिस्ट्रोल बढ़ जाता है। दिल की धड़कनें मुंह को आ जाती हैं। शुगर का लेबल रॉकेट-लांचर बन जाता है।

समस्या के एग्नोरेंस में ही भलाई है। बाकी जो लोड ले रहे हैं, उन्हें दूर से प्रणाम।

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

शुभकामनाओं का व्हाट्सएप्पीकरण

फेस्टिव सेल सिर्फ ऑनलाइन या ऑफलाइन ही नहीं लगा करती, सोशल मीडिया पर भी लगती है। सोशल मीडिया पर लगी फेस्टिव सेल तरह-तरह के शुभकामना संदेशों से भरी पड़ी रहती है। पांच-सात तरह के शुभकामना संदेश एक-दूसरे को खूब व्हाट्सएप्प किए जाते रहते हैं।

व्हाट्सएप्प युक्त इन संदेशों का सबसे बड़ा फायदा ये है कि व्यक्तिगत रूप से न किसी के घर जाना है न किसी को अपने यहां बुलाना। विश व्हाट्सएप्प कर दी बस छुट्टी। अगला जब चाहेगा अपना व्हाट्सएप्प खोलकर आपका संदेश पढ़ लेगा। आपकी विश पाकर प्रफुल्लित हो लेगा। फिर उसी विश को किसी दूसरे को सेंड कर अपना फर्ज निभा लेगा। एक ही पंथ से दो काज एक साथ साध लिए जाते हैं।

जमाना बहुत तेजी से डिजिटल हो रहा है। तो क्या हमारे त्यौहार, हमारी शुभकामनाएं डिजिटल न होंगी! व्हाट्सएप्प के जरिए हो तो रही हैं। जिसके पास व्हाट्सएप्प नहीं उसे फेसबुक के माध्यम से विश कर दें। विश पहुंची चाहिए चाहे किसी भी सोशल स्तर से पहुंचे।

पहले मुझे भी बड़ा अजीब-सा लगता था व्हाट्सएप्प-जनित शुभकामनाओं को पाकर। ये क्या कि एक ही मैसेज को प्रसाद की तरह हर किसी को बांटे जा रहे हैं। न उनमें भावनाएं हैं न दिली-प्रेम। मगर क्या कर सकते हैं जब पूरी दुनिया ही व्हाट्सएप्प की शुभकामनाओं पर केंद्रित हो चुकी हो! चाहे दिवाली हो या होली; व्हाट्सएप्प कर दीजिए और आपस में मिलने-जुलने से मुक्ति पाइए।

मजा यह है कि ऑनलाइन-ऑफलाइन सेल की तरह व्हाट्सएप्प पर भी बधाई संदेशों की हर वक़्त सेल-सी लगी रहती है। जिस मौके पर जो बधाई संदेश आपको भेजना है उसे चुन कर अगले को व्हाट्सएप्प कर दीजिए। न जेब से एक नया पैसा खर्च होना है न भीड़-भड़क्के में धक्के खाने हैं। घर बैठे मौज लीजिए महाराज।

व्हाट्सएप्प का प्रभाव हमारे जीवन में इतनी तेजी से बढ़ता जा रहा है कि लोग सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक अपनी उंगलियों को आराम नहीं देना चाहते। गजब तो यह है कि अब रोमांस करने के लिए भी किसी एकांत या पेड़ की छांव में जाने की जरूरत नहीं इसका पूरा लुत्फ आप व्हाट्सएप्प पर उठा सकते हैं। न घर वालों की घुड़की का डर न बाहर वालों की छींटाकशी का। यों भी, आज की पीढ़ी के समस्त रोमांस व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर ही तो जवान हो रहे हैं।

आगे वो दिन दूर नहीं जब यमराज को इंसान को लेने आने के लिए उससे व्हाट्सएप्प कर पूछना पड़ेगा कि तुम्हें अभी ले जा सकता हूं या नहीं! क्या मालूम स्वर्ग का भी व्हाट्सएप्पीकरण हो चुका हो अब तक!

व्हाट्सएप्प के युग में त्यौहार के मौके पर कोई भी अपना-पराया छूटना नहीं चाहिए संदेशों को भेजने या पढ़ने से। सेल चाहे कैसी भी क्यों न हो फायदा सभी उठाना चाहेंगे।

मैं तो खैर व्हाट्सएप्पीये शुभकामनाओं का मजा ले ही रह हूं आप भी लीजिए। धरा पर अंधेरा भले ही क्यों न रह जाए मगर व्हाट्सएप्प पर नहीं रहना चाहिए। ठीक है न।

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

किम कने 'हाइड्रोजन बम' है

नॉर्थ कोरिया का तानाशाह गजब का 'बमचक' बंदा है। चेहरे से जितना 'भोला-भाला' जान पड़ता है, दिमाग का उतना ही 'टेढ़ा'। किस बात का कब बुरा मान जाए, उसके फरिश्ते भी न जानते। लोग गुस्से को 'नाक' पर रखकर चलते हैं मगर वो 'हाइड्रोजन बम' पर रखता है। तुरंत हाइड्रोजन बम से उड़ाने का अल्टीमेटम दे डालता है। मानो- हाइड्रोजन बम फेंकना उसके लिए 'गेंद' फेंकने जितना 'सरल' हो!

फिलहाल तो उसने धमकियां दे-देकर ट्रंप चचा की नाक में नकेल डाल रखी है। जब मौका मिलता है, ट्रंप चचा को दो-चार भारी-भरकम धमकियां दे डालता है। उसकी हर धमकी में अमरिका को हाइड्रोजन बम से उड़ाने की ऐंठ काबिज रहती है।

उधर चचा ट्रंप तानाशाह की धमकी सुन-सुनकर दूध के माफिक 'उबाल' मारते रहते हैं। गुस्से में वे भी 'ऊंची धमकी' दे डालते हैं, समूचे नॉर्थ कोरिया को तबाह कर डालने की। दोनों तरफ से धमकियों का खेल फिलहाल अनवरत चल रहा है।

मैं तो यह सोच-सोचकर 'सदमे' में आ लिया हूं कि तानशाह की जनता और उसके घर-परिवार वाले उसे कैसे 'झेलते' होंगे? अगला जरा-जरा सी बात पर तो मारने-उड़ाने की धमकी दे डालता है। सुना है, एक बार उसने अपने मंत्री को महज झपकी लेने के जुर्म में भरी मीटिंग में गोली से उड़ा दिया था। एक हमारे यहां है, मंत्री या अफसर मीटिंग में चाहे सोये या फिल्म देखे कोई डांट-डपटी नहीं। इतना 'मनोरंजन' करने के बाद भी हमारे यहां के मंत्री-अफसर रात-दिन जनता की सेवा में जी-जान से जुटे रहते हैं!

तानाशाह के दिल में यह गम तो कहीं घर किए नहीं रहता कि 'हाइट' में खुद 'नाटा' होने के कारण वो अपने देश को भी अन्य शक्तिशाली देशों के मुकाबले 'नाटा' समझता हो! इसीलिए कभी इस देश तो कभी उस देश को हाइड्रोजन बम से उड़ाने का उलहाना दे डालता हो। मन के किसी कोने में यह सच तो उसके भी दबा पड़ा होगा कि अमरिका जैसे घोर शक्तिशाली मुल्क को खुल्ला ललकारना हंसी खेल नहीं। कभी भी लेने के देने पड़ सकते हैं। मगर तानाशाह की खोपड़ी तो तानाशाह ठहरी। कहां किसी से दबने वाली। अपने जमाने में हिटलर भी कहां किसी से दबा था।

धमकी चचा ट्रंप की भी सही है। इतना पावरफुल मुल्क काहे को पिद्दी भरे देश के तानाशाह के ताने सुनेगा। चचा ट्रंप अगर जरा-सी फूंक भी मार दें तो तानाशाह किम सीधा मंगल ग्रह पर चाय बनाता नजर आएगा। लेकिन अड़ियल किम माने तब न। उसने तो अमरिका पर हाइड्रोजन बम टपकाने की ठान रखी है। वो सपने भी रात-दिन हाइड्रोजन बम गिराने के ही देखा करता होगा।

ऐसे तानाशाह से तो न 'यारी' भली न 'दुश्मनी'। क्या भरोसा कब किस बात का बुरा मान जाए और धमकाने लगे- 'सुन बे, मेरे कने हाइड्रोजन बम है। उड़ाके रख दूंगा।'

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

न मिला साहित्य का नोबेल

साहित्य का नोबेल एक दफा फिर से मेरे देश के साहित्यकारों के हाथों से फिसल गया। एक विदेशी साहित्यकार उस पर कब्जा जमा बैठा। यह जितना क्षोभप्रद हमारे साहित्यकारों के लिए है, उससे कहीं ज्यादा बेचैनी का विषय मेरे लिए है। अपनी बेचैनी का आलम मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। जबकि इस बार मुझे पक्का विश्वास था कि साहित्य का नोबेल मेरे देश के ही किसी साहित्यकार के झोले में गिरेगा। मगर होनी को टालने की हिम्मत भला कौन कर सके है।

देश के साहित्यकार को साहित्य का नोबेल मिलने की दावेदारी मैं यों ही हवा में नहीं छोड़ रहा हूं। इसके पुख्ता कारण हैं मेरे कने। साहित्य का नोबेल बांटने का निर्णय लेने वाली समीति को क्या मालूम नहीं था कि पिछले साल मेरे देश के कितने ही साहित्यकारों-लेखकों ने मात्र ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे पर अपने-अपने पुरस्कार एक झटके में लौटा दिए थे? देश-समाज में असहिष्णुता को न पनपने देने की खातिर साहित्यकारों ने अपनी ऐड़ी-चोटी का बल तक लगा दिया था। लोकतंत्र की रक्षा की खातिर कितने ही साहित्यकारों ने सरकार के विरूद्ध सभाएं-गोष्ठियां कर डालीं।

ये सब करते वक्त साहित्यकारों ने जरा भी यह न सोचा कि ऐसा करने से वे या उनका लेखन खतरे में पड़ सकता है। जेल आदि की हवा भी खानी पड़ सकती है। तरह-तरह की धमकियां मिल सकती हैं।

फिर भी हमारे वीर साहित्यकार एक के बाद एक कर-करके पुरस्कार लौटाते रहे। घोर-संघर्ष के उन दिनों में बहुत से साहित्यकारों ने तो अपना नियमित लेखन भी मुलत्वी कर दिया होगा। ऐसे में भला कहां दिलो-दिमाग लगता है लिखने लिखाने में।

तिस पर भी साहित्य का नोबेल देने वाली ज्यूरी ने मेरे देश के साहित्यकारों के पुरस्कार वापसी के संघर्ष को यों इग्नोर किया जैसे ये सब ‘ठलुआगीरी’ का काम हो। उन्हें पता ही नहीं कि कितना ‘पीड़ादायक’ होता है मिले हुए पुरस्कार को यों मुफ्त में लौटाना। साहित्यकार को कितने-कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं एक-एक पुरस्कार की खातिर। पीठ खुजियाने से लेकर चरण तक छूने तक क्या-क्या नहीं करना पड़ता। तब कहीं जाकर पुरस्कार उनकी झोली में गिरता है।

पुरस्कार वापस करना कोई बच्चों का खेल नहीं महाराज। फिर भी मेरे देश के साहित्यकारों ने यह महान काम किया। मुझे उन पर हर तरह से गर्व है।

नोबेल देने वालों का यह ‘पक्षपाती रवैया’ मुझे वाकई बहुत खरा है। जी तो चाह रहा है, उन्हें मैं एक तगड़ा ‘खुला खत’ लिखूं। किंतु मुझे कुछ सोचकर ही चुप रह जाना पड़ रहा है।

मैं मेरे देश के साहित्यकारों का ‘भला’ चाहता हूं। हर वक्त दिल से यही दुआ करता हूं कि एक रोज उन्हें भी साहित्य का नोबेल मिलते हुए देखूं। इससे नोबेल का कद ही ‘ऊंचा’ होगा।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

खरीदो-खरीदो कि ऑनलाइन मार्केट में सेल लगी है

श्राद्ध निपटते ही सेल ने दरवाजे पर दस्तक दे दी है। खरीद-बेच का दौर शुरू हो गया है। ऑफलाइन से अधिक ऑनलाइन मार्केट हमें लुभाने में लगा है। ऑनलाइन मार्केट की सेल में किस्म-किस्म के ऑफर्स हैं। डिस्काउंट्स हैं। जीरो ईएमआई के सुनहरे वादे हैं। सारा जोर इस बात पर टिका है कि कस्टमर खरीदे। खूब खरीदे। बाहर मार्केट में जाकर नहीं सिर्फ ऑनलाइन खरीदे। ऑनलाइन खरीद में बाहर के धक्के खाने की संभावना न के बराबर रहती है। ऐसा ऑनलाइन परचेजिंग के प्रेमी यदा-कदा बताते रहे हैं।

ऑनलाइन सेल हमारे लिए 'कंफर्ट जोन' की तरह है। न भीड़ में आना न जाना। न एक दुकान से दूसरी दुकान का चक्कर काटना। बस घर बैठे अपने मोबाइल फोन की टच-स्क्रीन पर उंगुलियां ही तो चलानी हैं। ऑनलाइन मार्केटिंग में सारा गेम उंगुलियों का रहता है। जो जितना अधिक उंगुलियां चलाएगा, वो उतना ही बेहतर माल पा लेगा। उंगुलियों का निरंतर प्रेशर झेलते-झेलते एक बार को मोबाइल की टच-स्क्रीन जरूर झल्ला जाती होगी मगर उंगुलियां फिराना हम तब भी बंद नहीं करते।

मूलतः हम सेल, डिस्काउंट और ऑफर्स पसंद सोसाइटी हैं। ऐसा कोई मौका अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते जहां हैवी डिस्कांउट की सेल न लगी हो। एक बार को घर की ईएमआई चुकाने में आना-कानी कर सकते हैं पर सेल से डिस्काउंट का लाभ उठाने का मौका नहीं गंवा सकते। मार्केट का पहला ऊसूल भी तो यही है कि कस्टमर को खरीदने के लिए मजबूर करो ताकि उसके भीतर परचेजिंग पावर की लौ हमेशा जलती रहे।

फेस्टिवल बेशक हमारे लिए उत्सव हैं। मगर बिना ऑनलाइन सेल का लाभ उठाए हर उत्सव फीका है। कोई बात नहीं अगर आपकी जेब खाली है। एकमुश्त चुकाने को रकम नहीं है। तो ईएमआई का फायदा उठाएं न। मार्केट के पास आपकी हर समस्या का तोड़ है। आप पहल तो करें शिरिमानजी।

ऑनलाइन सेल में मिले रहे ऑफर्स को हथिया लें। मौके पे चौक्का मारने में ही होशियारी है। मार्केट में लंबे समय तक टिक वही रह पाएगा, जो ज्यादा से ज्यादा खुद को बेच लेगा। मार्केट का यही शाश्वत सेंस है।

रविवार, 24 सितंबर 2017

अच्छे दिन आएंगे!

सरकार 'अच्छे दिन' लाने को 'कृत-संकल्प' है। हर काम में जी-जान से जुटी है। स्वयं प्रधानमंत्री जी भी अपने प्रत्येक संबोधन में 'अच्छे दिन' लाने की अपनी 'भीष्म-प्रतिज्ञा' को दोहराए बिना नहीं रहते। जनता भी यह सोचकर संतोष कर ही लेती है कि आज नहीं तो कल उसके 'अच्छे दिन' आ ही जाएंगे। जबकि यह हकीकत जनता ब-खूबी जानती है कि उसके 'अच्छे दिन' चुनाव के आसपास ही आते हैं। फिर भी, आस का दीप जलाए रखने में क्या जाता है!

जनता तो फिर भी खुद को दिलासा दे लेती है किंतु विपक्ष और बुद्धिजीवि वर्ग सरकार के 'अच्छे दिन' को महज 'जुमले' से अधिक नहीं देखता। दोनों ही लगातार सरकार को 'अच्छे दिन' के नाम पर गरियाने में लगे रहते हैं।

विपक्ष और बुद्धिजीवि आजकल पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने और बुलेट ट्रैन के अस्तित्व में आने के विचार से ही 'हलकान' हुए पड़े हैं। दोनों को देश और आम जनता के लिए 'खतरनाक' बता रहे हैं। पेट्रोल के रेट में बृद्धि को वे सरकार की सर्वोत्तम विफलता बता रहे हैं। और, बुलेट ट्रेन पर यह कहकर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि इतनी महंगी यात्रा भला आम आदमी कैसे कर पाएगा? जनता को बुलेट ट्रेन से कहीं अधिक जरूरी रोटी, कपड़ा और मकान है।

खामख्वाह ही विपक्ष तेल और बुलेट ट्रैन को तूल देने पर अड़ा है। तेल और बुलेट ट्रेन दोनों ही देश के स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं! वैसे भी, तेल की कीमत इतिहास में पहली बार तो बढ़ी नहीं है। पिछली सरकार में हम बहुत अच्छे से तेल की कीमतों के साथ-साथ महंगाई को बढ़ता हुआ झेल चुके हैं।

फिर भी जनता ने 'चू' न कि। हंसती रही। तेल भरवाती रही। कारें खरीदती रही। महंगा प्याज भी खाती रही। महंगा सिलेंडर भी खरीदती रही। सारी कुढ़न और जलन विपक्ष और बुद्धिजीवि वर्ग को ही है। जनता तो सारे गम बहुत जल्द भूलाकर अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाती है।

कोई माने चाहे न माने पर अपने देश में खर्च करने वाले, भगवान की दया से, बहुत हैं। पेट्रोल चाहे 80 रुपये बिके या बुलेट ट्रेन का किराया 3000 से ऊपर हो लेकिन कमी कहीं कोई नहीं आने की। वो जो अपने देश को 'सोने की चिड़िया' होने का तमगा मिला हुआ है न, ऐसे ही नहीं मिल गया था। ख़र्च करने और बचाने के मामले में हम भारतीयों का जबाव नहीं।

और यह कतई न भूलें कि 'अच्छे दिन' लाने के लिए कुछ तो 'बलिदान' जनता, विपक्ष और बुद्धिजीवियों को देना ही होगा। है कि नहीं...!

क्या जाता है तेल की कीमत के बढ़ने या बुलेट ट्रेन का किराया अधिक होने में जनता अपने हिसाब से सब एडजस्ट कर लेगी। महंगाई वगैरह से आम आदमी की सेहत पर अब कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ विपक्ष और बुद्धिजीवियों पर पड़ता है। वो भी अपनी-अपनी विरोध की दुकानें चलाने के लिए।

निश्चिंत रहें। सरकार 'अच्छे दिन' लाकर ही रहेगी। बाकी दुनिया चाहे कुछ भी कहती रहे।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

वंशवाद की जय

पहले मैं वंशवाद और वंशवादियों को ‘हेय दृष्टि’ से देखा करता था। जाने कितने ही लेख मैंने ‘वंशवाद के विरोध’ में यहां-वहां लिख डाले। कितने ही दोस्तों से अपनी दोस्ती सिर्फ इस बात पर एक झटके में ‘खत्म’ कर दी कि वे बहुत बड़े वाले वंशवादी थे। हमेशा वंशवाद के समर्थन में खड़े रहते थे। मेरे वंशवादी न होने पर अक्सर मुझ पर ‘कटाक्ष’ करते थे।

लेकिन वंशवाद पर जब से मैंने ‘उन्हें’ सुना है तब से मेरा नजरिया वंशवाद पर पूरी तरह से बदल गया है! जैसाकि ‘उन्होंने’ कहा था कि मेरे वंशवाद पर सवाल न उठाइए। वंशवाद की परंपरा हमारे यहां सदियों से रही है। इस बहाने कुछ ऊंचे वशवादियों के नाम भी उन्होंने गिनवा दिए।

मैंने काफी गहराई में जाकर सोचा और महसूस किया कि उन्होंने कुछ ‘गलत’ नहीं कहा। हम ‘वंशवाद-प्रधान’ मुल्क ही हैं। राजनीति से लेकर साहित्य, फिल्मों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों तक में वंशवाद गहरी जड़ें जमाए है। वंशवाद को दो-चार तगड़े लेखों या तीखे भाषणों के सहारे कतई नहीं ‘उखाड़ा’ जा सकता।

कहना न होगा, बहुत से सामाजिक एवं राजनीति मसले वंशवाद के जोर से ही ‘स्लॉव’ हो जाते हैं हमारे यहां।

हालांकि कहने वाले वंशवाद को समाज पर ‘काला धब्बा’ बताते हैं। किस्म-किस्म की ‘बुराईयां’ गिनाते हैं। अच्छाईयां न के बराबर बताते हैं। किंतु ‘सूक्ष्म दृष्टि’ से अगर देखा जाए तो वंशवाद से उत्तम कोई विकल्प है ही नहीं। वंशवाद के तमाम फायदे हैं। खासकर, राजनीति तो ‘वंशवादिये लाभों’ से भरी पड़ी है।

अपवाद को किनारे रख दें तो सौ परसेंट देखा यही गया है कि नेता का बेटा आगे चलकर बनता नेता ही है। राजनीति के जिस बीज को कभी उसके परिवार में बोया गया था आगे आने वाली पीढ़ियां अपने-अपने तरीके से उसे पल्लवित करती रहती हैं। वंश एक ही ढाल पर तना बरसों बरस टिका रहता है। लगभग यही हाल सिनेमाई संसार का भी है। कंगना ने इसी वंश-परंपरा पर ही तो तीखे प्रहार किए हैं। पर कंगना क्या जाने ‘वंशवाद की मलाई’ का स्वाद!

जब से वंशवाद पर हंगामा छिड़ा है, देख रहा हूं, अब वो बड़े नेता और बुद्धिजीवि भी लगभग ‘खामोश’ हैं जो गाहे-बगाहे वंशवाद को गलिया दिया करते थे। चूंकि वंशवाद पर बयान एक ‘ऊंचे कद’ के नेता की तरफ से आया है तो लाजिमी है अन्य लोगों का चुप रह जाना। वंशवाद में सबके अपने-अपने (कम या ज्यादा) फायदे निहित हैं तो भला कोई क्यों बोले?

यह देश, समाज और खुद मैं ‘एहसानमंद’ हूं उन वंशवादी नेताओं-फिल्मवालों का जिन्होंने लाख हाय-तौबा के बाद भी अपने-अपने वंशवाद को ‘जिंदा’ रखा हुआ है। वंशवाद को अस्तित्व में रख वे पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर रहे हैं। मैं तो चाहता हूं पूरी दुनिया हमारे देश के वंशवादियों से वंशवाद को चलाए-बनाए रखने की ‘प्रेरणा’ ले।

वंशवाद की सदा जय हो।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

चुप रहने में भलाई

मैंने अब कम बोलना। कम लिखना। बहस में कम पड़ना शुरू कर दिया है। समय खराब है। किसी का कोई भरोसा नहीं। कब में किस बात या असहमति पर कोई मेरा भी काम तमाम कर डाले। तो प्यारे मेरी भलाई इसी में है कि मैं ‘मुंह पर टेप’ चिपकाए रहूं।

लेखक होकर मेरा यों ‘बिदकना’- जानता हूं- बहुत लोगों को ‘अखर’ रहा होगा। कुछ साथियों ने तो मुझे ‘बुजदिल’ और ‘नपुंसक’ तक करार दे दिया होगा। न केवल मेरे लेखन साथ-साथ मेरी कलम पर भी हजार तरह के फिकरे कसे होंगे। मगर मैं किसी के ‘कहे’ की कतई ‘परवाह’ नहीं करता। यों, दूसरों की परवाह करने के चक्कर में अगर पड़ जाऊंगा तो एक दिन अपनी ही जान से हाथ धो बैठूंगा! जबरन क्रांतिकारी या खुले विचारों का लेखक बनने का मुझे कोई शौक नहीं। क्या समझे...।

ये जो अक्सर हम प्रगतिशील सोच, जनवादी विचारधारा, निष्पक्ष लेखन आदि के चक्करों में पड़ जाते हैं न। बस यही जिद एक दिन ‘कबाड़ा’ कर डालती है। क्या जरूरत है मुझे इन सब आजाद-ख्याल ख्यालों में ‘ख्याली पुलाव’ पकाने की? जितना भर अपने दम पर पका पा रहा हूं काफी है मेरे लिए। पानी में रहकर मगर से बैर रखने में होशियारी नहीं। जब तलक बनाकर चला पा रहे हैं, चलाते रहिए न। कौन-सा क्रांतिकारी लेखक बनकर आप समाज या देश में क्रांति लिख देंगे।

मैं साफ कहता हूं। फिर से कह रहा हूं। लेखन या अपने दम पर क्रांति करना मेरे बस की बात नहीं। वो लोग और ही होते हैं, जो अपनी विचारधारा के दम पर दूसरे की विचारधारा से ‘पंगा’ लेने की हिम्मत रखते हैं। माफी कीजिएगा, ये हिम्मत मेरे में बिल्कुल नहीं। जो शख्स दीवार पर बैठी छिपकली को देख कमरे में न घुसता हो उससे किसी ‘क्रांति’ की उम्मीद रखना पानी के मध्य खड़े होकर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करना है।

‘फ्री स्पीच’ का जिगरा रखने वाले लेखक लोग अलग ही होते हैं। एकदम निडर। सहासी। निष्पक्ष। बिंदास। दुनिया क्या दुश्मन तक उनके आगे पानी मांगते नजर आते हैं। लेकिन मैं किसी को भी अपने समक्ष पानी मंगवाने की तमन्ना नहीं रखना चाहता। जिंदगी जिस ठर्रे पर चैन से चल रही है, चलने देना चाहता हूं। चैन से बड़ा सुख मेरे तईं दूसरा नहीं।

बैठे-ठाले समय की निगाह टेढ़ी होते देर ही कितनी लगती है। न न मैं कतई नहीं चाहता समय की निगाह मेरे प्रति टेढ़ी हो। मैं सीधी-सच्ची लाइफ को ‘एन्जॉय’ करने का आदी हूं। खामखा किसी के फटे में अपनी टांग घुसेड़ मैं जन्म-जिंदगी भर को ‘लूला’ नहीं होना चाहता।

उनकी ‘फ्री स्पीच’ उन्हें और मेरी ‘चुप्पी’ मुझे मुबारक!

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

नोटबंदी की विफलता, जीडीपी का लुढ़का और उनका मुस्कुराना

देख रहा हूं। बैंच पर जमे एक शिरिमानजी निरंतर मुस्कुराए जा रहे हैं। अखबार उनके हाथों में है। मुस्कुराते वक्त उनके दांतों को देख पा रहा हूं। कुछ पीलापन है उन पर। उम्र का तकाजा कह लीजिए या पान-गुटखे की छाप जो उनकी मुस्कुराहट के बीच खुलते-बंद होते दांतों पर साफ दिखलाई पड़ रही है।

हालांकि शिरिमानजी मेरे तईं कतई अनजान हैं। तो क्या...? मैं उनके करीब जाकर लगभग बैठ ही जाता हूं। किंतु वे अभी भी अखबार में नजरें डाले संभवता किसी दिलचस्प खबर को पढ़ मुस्कुराए जा रहे हैं। मेरे करीब में बैठने से अननोन टाइप बने हुए हैं।

बहरहाल, मैं यह पूछ कर उनकी एकाग्रता तोड़ने का प्रयास करता हूं कि ‘शिरिमानजी, आप इतना मुस्कुराए क्यों जा रहे हैं? अखबार या खबर में ऐसा क्या है, जो आपको दीन-दुनिया से बे-खबर बनाए हुए है?’ शिरिमानजी ने अखबार से नजर बचाकर अब मुझ पर जमा दी थी। बिना किंतु-परंतु किए तपाक से बोल पड़ते हैं, ‘वाह! क्या धांसू काम हुआ। सरकार की नोटबंदी तो विफल हुई ही साथ में जीडीपी का भी बैंड बज गया। अब आएगी अक्ल सरकार को।‘

शिरिमानजी के थोड़ा और करीब खीसकते हुए मैं उनसे पूछा- ‘ओह! तो यह कारण था आपके निरंतर मुस्कुराते रहने का। मगर सरकार की किसी विफलता पर यों मुस्कुराना उचित नहीं। यह न केवल चुनी हुई सरकार बल्कि लोकतंत्र व जनता का भी सीधा अपमान है।‘

शिरिमानजी मेरी बात सुन अपने माथे पर बल डालते हुए बोले- ‘मुस्कुराऊं नहीं तो और क्या करूं? सरकार ने काम ही ऐसा किया था। भला क्या आवश्यकता थी नोटबंदी की तानाशाही को थोपने की? उसी का परिणाम है कि जीडीपी मुंह के बल गिरी।‘

मैंने कहा- ‘करेंसी के बदलने का जिक्र तो कभी डा. आंबेडकर ने भी कभी किया था। सरकार ने एक प्रयोग करके देखा था। उसका परिणामा अच्छा भी आया और खराब भी। अगर खराब रहा भी तो इसमें मुस्कुराने का कोई सीन नहीं बनता।‘

शिरिमानजी मुझे रत्तीभर सहमत नहीं थे। वे तो निरंतर सरकार की कथित नीतियों को कोसे जा रहे थे। कोसते-कोसते उनकी खीझ इतना अधिक बढ़ गई थी कि उन्होंने बात ही बात में मुझे ‘भक्त’ तक घोषित कर डाला।

हालांकि उनके कहे का मैंने बुरा नहीं माना। लेकिन उनसे बातचीत को यह कहते हुए विराम दिया कि बड़े मुद्दे किन्हीं स्थापित विचारधारों के तहत न देखे जाते हैं न समझे।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

जूली 2 के पोस्टर में छिपे संस्कार

अखबारों में जूली 2 का पोस्टर आया और छा गया। ऐसा छाया कि संस्कारवान लोग भी उतावले हो उठे उसे देखने-समझने को। सुनाई में आया है कि लोगबाग बड़ी तबीयत से जूली 2 के पोस्टर को अपने-अपने व्हाट्सएप पर एक-दूसरे को आगे-पीछे सरका रहे हैं। पोस्टर पर ‘चटकारे’ यों लिए जा रहे हैं मानो कोई चटपटा-तीखा पदार्थ जीभ पर आन गिरा हो अचानक।

बताता चलू, जूली 2 एक ‘सर्वश्रेष्ठ संस्कारवान फिल्मकार’ की फिल्म है। पिछले दिनों उक्त संस्कारवान फिल्मकार अपनी ‘संस्कारवान छवि’ के लिए अच्छी-खासी चर्चे में रह चुके हैं। अपनी संस्कारी सोच के हिसाब से वे पूरे फिल्म जगत को संस्कारों की घुट्टी पिला देने का मन रखते थे। किंतु किस्म-किस्म के विवादों के कारण बीच ही में उन्हें अपने ‘संस्कारशील पद’ को छोड़ना पड़ा।

खैर...। जूली 2 के पोस्टर पर लौटते हैं। पहली ही नजर में मुझे यह पोस्टर अच्छा-खासा ‘संस्कारयुक्त’ नजर आया। इस पोस्टर को देखने के बाद मेरा ‘संस्कार’ नामक शब्द पर ‘विश्वास’ खासा मजबूत हुआ। मैं सोचने लगा- व्यक्ति को अगर इसी तरह के संस्कार हर रोज या हर पल देखने-समझने को मिलने लगें फिर भला वो ‘अश्लीलताओं’ या ‘कामुकताओं’ के जंजालों में क्यों कर उलझे?

अश्लीलताएं तो मनुष्य के दिमाग की ‘भौतिक कुंठाएं’ हैं। किंतु जूली 2 टाइप के पोस्टर और किताब संग लेटी कन्या को देखने के बाद ‘अंदरूनी संस्कार’ खुद ब खुद दिमाग में विकट हलचल मचाने लगते हैं।

यों भी, संस्कारों का पाठ किसी को पढ़ाया नहीं जा सकता। संस्कार मनुष्य के भीतर स्वयं ही पैदा होते हैं। लेकिन समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनका सवेरा ही संस्कार की घंटी बजाने के साथ शुरू होता है। रात-दिन वे तरह-तरह के संस्कारों पर इस उस को भाषण देते रहते हैं। जबकि खुद उनके संस्कार क्या हैं, कैसे हैं, क्या चाहते हैं; ये सब उनके मोबाइल की ‘लॉक्ड गैलरी’ में झांककर देखा जा सकता है।

जूली 2 का पोस्टर बेहद क्रांतिकारी है। दिमाग में संस्कारों का संचार करता हुआ प्रतित होता है। इमेजिन किया जा सकता है- जब पोस्टर ही इतना संस्कारशाली है फिर फिल्म में तो संस्कारों की पूरी पाठशाला ही स्थापित हुई होगी।


फिर भी, जिन अति-भद्र लोगों को जूली 2 के संस्कारी पोस्टर में से ‘अश्लीलता की बू’ आ रही है, उनसे मुझे सिर्फ इतना ही कहना है- किरपिया संस्कारवान बनिए। सोच को संस्कारी करिए। दिमाग में संस्कार डालिए। बिना संस्कारों की शरण में जाए आपको जूली 2 ही क्या सनी लियोनी के वस्त्रों से भी ‘अश्लीलता’ की ही ‘बू’ आएगी ताउम्र।

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताएं

बहरहाल, निजताओं पर चाहे कितने कानून बना लिए लीजिए। कितनी ही बहस कर लीजिए। एक-दूसरे की निजताओं की कितनी ही दुहाईयां दे लीजिए। मगर फिर भी कुछ सवाल न खत्म हुए हैं। न कभी खत्म हो पाएंगे। ये ऐसे गैर-वाजिब सवाल हैं, जिन्हें हम चाहकर भी 'निजी' नहीं बना सकते। समाज एवं घर-परिवार के बीच गाहे-बगाहे इन सवालों को उछाला जाता ही रहता है। रोक-टोके के बाद भी

समस्या यह है अगर इन सवालों पर आप अगर ‘मौन’ रहते हैं। या हंसकर टाल देते हैं। या अनसुना कर देते हैं। या वक्त की भारी कमी का हवाला देते हैं। तो अगला बिना ज्यादा कुछ समझे-बुझे तुरंत आप पर ‘अंदरूनी शक’ करना प्रारंभ कर देता है। यों भी, किसी पर कैसा भी शक करना समाज का हर शख्स अपना ‘मौलिक अधिकार’ समझता है। शक की एक चिंगारी न केवल नाते-रिश्तेदारों के बीच अपितु गली-मोहल्ले में भी ऐसी फैलती है फिर आपके पास मुंह छिपाने के अतिरिक्त और कोई चारा रह नहीं पाता।

इंसान की निजता को ‘भंग’ करने के लिए दो सवाल सबसे अधिक पूछे जाते हैं। पहला- “और सुनाओ...?” दूसरा- “खुशखबरी कब दे रहे हो...?” इन दो सवालों से हम आदिकाल से जूझ रहे हैं। देश, समाज, दुनिया, मनुष्य कितने ही ‘आधुनिक’ या ‘डिजिटल’ क्यों न हो जाएं किंतु ये दो सवाल गांठ की भांति हमारे पल्लू से बंधे ही रहते हैं। इन सवालों पर न आप मुंह चुरा सकते हैं न किसी पर चौड़े हो सकते। अगला आमने-सामने नहीं पूछेगा तो व्हाट्सएप करके पूछ लेगा। पर पूछेगा जरूर। क्योंकि बिना पूछे हमारे यहां लोगों की दाल-रोटी हजम नहीं होती।

“और सुनाओ...।“ बंदा क्या सुनाए। दस-बारहा घंटे की नौकरी। दो घंटे जाम में फंसने के बाद। अगला जब थका-मंदा घर लौटकर आता है तब तक उसकी हिम्मत की बैंड कर कदर बज चुकी होती है फिर वो न कुछ सुनाने न कुछ सुनने के काबिल रह ही नहीं पाता। रात का खाना खाकर अगले दिन की जद्दोजहद के लिए उसे तैयार होना होता है। मगर लोग हैं कि फोन कर-करके, व्हाट्सएप कर-करके एक ही सवाल “और सुनाओ...” “क्या हाल हैं...” “क्या चल रहा है...” “मैसेज का जवाब क्यों नहीं देते…” बंदे की रगों में ‘भस्स’ भरते रहते हैं।

सुनाना न सुनाना बंदे का ‘निजी मसला’ है। कम से कम इतनी निजता तो उसकी झोली में पड़ी रहने दो यारों।

ठीक ऐसा ही मसला ‘खुशखबरी सुनाने’ का है। लुत्फ देखिए, खुशखबरी जानने की इच्छा जितनी परिवार वालों को नहीं, उससे कहीं ज्यादा रिश्तेदारों को रहती है। कुछ तो इतने ‘गजब’ होते हैं कि बहू के घर में पहला कदम रखते ही खुशखबरी जानने को बेताब हो उठते हैं। मानो- जच्चा-बच्चा का सारा खर्च अकेले वे ही उठाएंगे।

इस सवाल पर जब कभी लड़के या बहू की तरफ से ‘आड़ा-तिरछा’ जवाब मिल जाता है तो ऐसे मुंह बिचका लेते हैं जैसे वे उनके खूंठे पर बंधी बकरी खोल लाए हों। अमां, शादी का पहला और अंतिम उद्देश्य सिर्फ खुशखबरी पर ही नहीं टिका होता। आजकल के जमाने में तो बिल्कुल भी नहीं। इतनी विकट महंगाई में दो बंदों का खर्च पूरा पड़ नहीं पाता और लोगों हैं कि तुरंत खुशखबरी की मिठाई चखने को बेकरार हुए बैठे रहते हैं।

हालांकि ये सब इंसान की ‘व्यक्तिगत निजाताओं’ में आता है। पर सामने वाला इसे ‘निजी’ बना रहने दे तब न। मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताओं को तो कुछ लोग अपनी ‘बपौती’ समझते हैं। जब जहां चाहा कुछ भी पूछ बैठे। बिना सोचे-समझे।

निजता जरूरी है। निकट भविष्य में अगर इन ‘बेढंगें सवालों’ से भी ‘मुक्ति’ मिल जाए फिर ‘निजताएं’ और भी ‘खूबसूरत’ लगने लगेंगी हमें।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

उनकी खामोशी का इमोशनल अत्याचार

वो खामोश हैं। इतने खामोश कि उनकी आवाज न जमीन न टि्वटर कहीं पर भी सुनाई नहीं दे रही। देश-दुनिया में इतना कुछ घटते रहने के बाद भी उनका खामोश रहना न केवल मुझे बल्कि उनके चहाने वालों को भी अब खलने-सा लगा है।

पहले जब वे लगभग हर मुद्दे पर बोलते या ट्वीट करते रहते थे तब हमारे दिलों में यह आस जगी रहती थी कि हमारे बीच कोई तो है जो मुस्तैदी के साथ विरोध कर रहा है। उनकी ट्वीटिया विरोधी भाषा अच्छों-अच्छों के पसीने छुड़ा दिया करती थी। सोशल मीडिया से लेकर गली-मोहल्लों के नुक्कड़ों पर जमने वाले जमघट तक में उनके नाम एवं विरोध के चर्चे छाए रहते थे। मजाल है, जो उनके विरोधी तेवरों से किसी ऊंचे या बड़े नेता की पगड़ी न उछली हो। सड़क से लेकर टि्वटर तक पर सबकी बखिया उधेड़ी है उन्होंने।

लेकिन यकायका उनका लंबी खामोशी में चले जाना किसी को रास नहीं आ रहा। लोग परेशान है कि वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे? मुद्दों पर अपना ‘तगड़ा विरोध’ दर्ज क्यों नहीं करवा रहे? वे बोलते थे तो सबका मन लगा रहता था। लेखकों को लिखने व ठलुओं को मौज लेने के अवसर मिलते रहते थे।

सच कहूं तो उनके यों खामोश बने रहने से मेरा भी मन टि्वटर पर नहीं रमता। उनके टि्वटर पेज पर इस उम्मीद में टहलने चला जाता हूं कि शायद उनका कुछ धांसू-सा लिखा हुआ ट्वीट मिल जाए। कभी-कभार एकाध फॉर्मल ट्वीट को छोड़के ज्यादातर उनके टि्वटर एकांउट पर खामोशी ही पसरी रहती है।

उनकी खामोशी के रहस्य को जनाने का प्रयास मैं उनको ट्वीट करके भी कर चुका हूं। किंतु आज तलक वहां से कोई उत्तर नहीं आया। ऐसे थोड़े न होता है कि आप अपनी जनता को अपनी खामोश का सबब न बतलाएं। जबकि आपके बारे में यह मशहूर है कि आप हर काम जनता से बिना पूछे करते ही नहीं। फिर यह खामोशी क्यों?

उनकी खामोशी धीरे-धीरे कर ‘इमोशनल अत्याचार’ टाइप बनती जा रही है। मुझे डर है, उनकी खामोशी अगर थोड़ी और लंबी खींच ली तो यह देश-दुनिया-समाज कहीं उन्हें ‘विस्मृत’ न कर दे!

सोमवार, 21 अगस्त 2017

जो हो, रात में नहीं निकलूंगा

आदेश लड़कियों के लिए आया था कि वे रात में घर से बाहर न निकलें। किंतु लागू इसे मैं खुद पर कर रहा हूं। आज से या कहूं अभी से मैंने रात में घर से निकलना एवं घर की खिड़की से मुंह निकालकर बाहर देखना तक बंद कर दिया है। सुन रहा हूं कि बाहर का माहौल खराब है। छेड़छाड़ की वारदातें बढ़ती जा रही हैं। हालिया, चोटी काटने की खबर ने तो मुझे इतना डरा-सा दिया है कि घर में भी ‘हैलमेट’ पहनकर ही रहता हूं। तथा, पत्नी को भी सख्त हिदायत दे रखी है कि वो भी घर-बाहर हैलमेट का ही सदपयोग करे।

हालांकि पत्नी ने इसे कतई गंभीरता से नहीं लिया है। उलटा मेरे डरपोक व अंधविश्वासी स्वभाव पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं। चूंकि वो पत्नी है। घर की प्रथम मालकिन है। इस नाते उससे ज्यादा सवाल-जवाब करना मुनासिब इसलिए भी नहीं समझता कहीं खामखा रोटी-पानी के बंद होने की नौबत न आ जाए।

फिर भी, हिदायत बरतना एवं आगाह करना मेरा फर्ज था सो हर एक को कर रहा हूं। मैंने तो अपनी फेसबुक पोस्ट में भी पुरुषों से अपील कर डाली है कि वे रात को घर से बाहर निकलने की गलती न करें।

देखो जी, बुरे वक्त और विपरित चलती हवा का कोई ठौर-ठिकाना न होता कि कहां से, किधर से, किस पर हावी हो जाए। आजकल तो अपनी हिफाजत अपने हाथ होनी चाहिए। सरकार-प्रशासन भला कहां तक एक-एक व्यक्ति के आगे-पीछे साथ-साथ टहलेगा। इसीलिए तो मैंने रात को बाहर न निकलने का डिसिजन लिया।

लेखकों (इसमें मैं खुद को भी शामिल कर रहा हूं) को तो खासतौर पर रात में कहीं नहीं आना-जाना चाहिए। आखिर लेखक साहित्य एवं राष्ट्र की अमूल्य धरोहर टाइप होते हैं। उन पर कलम और शब्दों को सजाने-संवारने का खास जिम्मा होता है। दुश्मन एक बार को चोर-डकैत को छोड़ सकता है। लेकिन लेखक अगर उसके हत्थे चढ़ गया फिर उसकी खैर नहीं।

इस बेढंगे समय में मैं खुद को खोना नहीं चाहता। मुझे अपनी इज्जत बेहद प्यारी है। कोई आवारा मुझे ताड़े, छेड़े या मेरी चोटी तक आए ऐसे में मैं खुद को घर के भीतर सुरक्षित रखना ज्यादा बेहतर मानूंगा। यहां-वहां की खबर बनने से तो अच्छा है अपने कदम वापस खींच लूं। यों भी, बात-बात पर क्रांति या क्रांतिकारी बातें करना मुझे आता नहीं। नितांत ‘सेफ लाइफ’ जीने का मैं बचपन से आदी रहा हूं।

जानता हूं, मेरी बातें सुनकर बहुत लोग मुझसे खफा होंगे। मुझे कायर एवं बुजदिल होने की संज्ञाएं दे रहे होंगे। एकाध ने तो मेरे ऊपर ‘पुरुष बिरादरी के लिए कलंक’ टाइप उदघोष भी जारी कर डाले होंगे। किंतु मैं किसी की ‘परवाह’ नहीं करता।

मुझे रात में घर से बाहर नहीं निकलना तो नहीं ही निकलना है। मैं मेरे फैसले पर अटल हूं।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

भीड़ का सनी लियोनी हो जाना

सड़क कोच्चि की थी। भीड़ भी कोच्चि की थी। मगर सनी लियोनी कोच्चि की नहीं थी। वो तो वहां किसी शोरूम के उद्घाटन के लिए थी। फिर भी उसकी एक झलक भर पाने भर को कोच्चि की सड़क भीड़ से पट गई थी।

सड़क पर इतनी भीड़। कि, लोगों के बस सर ही सर दिखलाई पड़ रहे थे। लोग एक के ऊपर एक कूदे जा रहे थे। हुजूम किसी के रोके नहीं रुक रहा था। सनी लियोनी की कार उस भीड़ में एक ‘सफेद बिंदु’ टाइप नजर आ रही थी। सनी भी अपने लिए इतनी भीड़ को देखकर ‘अभिभूत’ थी। भीड़ की कुछ तस्वीरें उन्होंने अपने टि्वटर हैंडल पर पोस्ट भी कीं। एक फोटू तो ऐसी भी थी, जिसमें कुछ बंदे स्टेज के पर्दे में से झांक-ताक पर उतारू थे। तमन्ना इतनी भर थी कि किसी तरह सनी के नजदीक आकर एक सेल्फी लेने का मौका हाथ आ जाए।

विकट भीड़ को देख बहुत देर तक तो मैं यही सोचता रहा कि सनी लियोनी वहां क्या थी? क्या कोई बहुत बड़ी सेलिब्रिटी? क्या कोई बहुत बड़ी पॉलिटिशियन? क्या किसी देश की राजकुमारी? क्या किसी ऊंचे ब्रांड की ब्रांडअमबेस्डर? न न इनमें से वो कुछ भी नहीं थी। महज कुछ फिल्मों में ज्यादा खास किरदार न निभाने वाली एक अदाकारा ही तो थी। फिर भी कोच्चि के लोग-भीड़ पागल थी, सनी लियोनी को देखने के लिए।

भीड़ सेलिब्रिटी या (पूर्व) पोर्न स्टार में से किसे देखने को उत्तेजित थी? ऐसा भी नहीं हो सकता कि कोच्चि कभी कोई फिल्मी स्टार या सेलिब्रिटी जाता ही न हो। फिर सनी लियोनी के लिए ही भीड़ का इतना पागलपन क्यों? यह सवाल केवल मेरे जहन में ही नहीं बल्कि बहुतेरों के दिलो-दिमाग में अभी तलक छाया होगा। पर सच तो यह है कि भीड़ या लोगों की चाहत का कोई पैमाना नहीं होता। वो किसी को कैसे भी अपने हिसाब से पसंद या नापसंद कर सकती है। उसकी मर्जी।

निश्चित ही भीड़ का क्रेज सनी लियोनी की पोर्न स्टार छवि और उसकी सेक्सुअल्टी पर बेबाक राय से जुड़ा होगा। यों भी, बीच-बीच में यह खबरें भी आती रही थीं कि सनी लियोनी गूगल पर सबसे अधिक सर्च की जाने वाली सेलिब्रिटियों में से एक है। खैर, यह बताने की जरूरत नहीं कि सनी को गूगल या अन्य किसी पोर्न साइट पर क्यों और किसलिए सर्च किया जाता है।

कोच्चि की भीड़ के लॉचिक को समझे बिना ही केवल इतना समझें कि लोगों के बीच पोर्न या पोर्न स्टार का क्रेज जबरदस्त रहता है। पोर्न अब दबी-ढकी चीज नहीं रही। ऐसा तो शायद ही कोई होगा जिसके मोबाइल की गैलरी में एकाध रंगीन टाइप फिल्म या क्लिप न हो। या ऑन-लाइन देखता न हो। यदा-कदा आने वाले ऑन-लाइन सर्वे हमारी ‘अंतर-वासना’ की सारी पोलें खोलकर रख दे रहे हैं।

भीड़ के सनी लियोनी हो जाने पर न आंखें फाड़िए न मुंह को अचंभित मोड में खुला रखिए। इस बात को स्वीकार कीजिए कि सनी लियोनी का सिक्का फिल्म इंडस्ट्री में भले ज्यादा न जमा हो मगर लोगों के दिलो-दिमाग में बेहद मजबूती के साथ जमा हुआ है।


सनी लियोनी की मार्केट में डिमांड है। मार्केट में डिमांड उसी की होती है, जिसे हाथों-हाथ लिया जाता है। भीड़ के सनी लियोनी होने पर दुखी मत होईए बल्कि खुशी जताई कि समाज दकियानुसी प्रतिमानों को ध्वस्त कर आगे निकलने को बेताब है।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

फिक्रमंद होने का बीमारी

लोग भी न फिक्रमंद होने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। अब देखिए, लोग इस बात पर फिक्रमंद हैं कि सिक्का ने इंफोसिस को क्यों छोड़ा? किसलिए छोड़ा? काहे इतनी बड़ी नौकरी को दो सेकंड में लात मार दी? आदि-आदि।

सिक्का ने अगर इंफोसिस को त्यागा तो उसके पीछे कुछ तो ठोस कारण रहे ही होंगे न। वरना इतनी धांसू नौकरी भला कौन छोड़ना चाहेगा। हालांकि नौकरी छोड़ने के कारण उन्होंने स्पष्ट कर दिए हैं। लेकिन लोगों की जुबान पर विराजमान ‘चुल्ल’ का क्या कीजिएगा। उन्हें तो ‘खुजली’ रहती है न एंवई किस न किसी बात या मुद्दे पर ‘लोड’ लेने की। लोड जब ज्यादा बढ़ जाता है फिर डॉक्टरों के चक्कर लगाते फिरते हैं कि हमें नींद नहीं आती। खोपड़ी भारी रहती है। अवसाद घेरे रहता है। आदि-आदि।

सिंपल-सी बात है। मसला इंफोसिस और सिक्का के बीच का है। लड़ाई-टंटें उनके हैं। गुस्सा-नाराजगी उनकी है। फिर, पता नहीं लोग क्यों सिक्का के लिए ‘दुबले’ हुए जा रहे हैं। जबकि वे मस्त हैं। अपनी कंपनी को छोड़ने की रत्तीभर शिकन उनके माथे या चेहरे पर देखने को नहीं मिली। खुलकर अपनी असहमतियों को मीडिया से साझा कर रहे हैं। लेकिन नहीं, लोग भला किसी दूसरे के मामले में अपनी फिक्र की अपनी टांग घुसेड़े बिना कैसे चैन से बैठ सकते हैं। कुछ तो इतने ज्यादा फिक्रमंद होते हैं कि फिक्र करते-करते यमराज के दरवाजे तक पहुंच जाते हैं।

वाकई, लोग अपनी फिक्र से इतना कमजोर नहीं हुआ करते, जितना कि दूसरे की फिक्र में डूबकर।

हां, दलाल स्ट्रीट का सिक्का की विदाई पर ‘फिसल’ पड़ना समझ आता है। उस पर इंफोसिस के शेयर को ठीक-ठाक बनाए-चलाए रखने की जिम्मेदारी जो है। अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अगर वो ही ‘संजीदा’ नहीं होगा तो भला उसके रास्ते से गुजरेगा कौन। हालांकि दलाल पथ से गुजरने वालों को कभी सही मंजिल की तरफ सुरक्षित जाते कम ही देखा है। फिर भी जब रास्ता है तो लोग गुजरेंगे ही। यों भी लोगों का रूझान अपने शेयर इंफोसिस की तरफ तो हो सकता किंतु सिक्का की तरफ न के बराबर ही होगा। मगर सच यह भी है कि कंपनी के बाहर सिक्का के चाहने वाले भी कम नहीं।

मुझसे भी कई लोगों ने पूछा कि आपको सिक्का का इस तरह कंपनी छोड़ना कैसा लगा? मैंने साफ कह दिया कि भइए, न मेरा सिक्का से दूर-पास का कोई रिश्ता है न इंफोसिस का मेरे कने कोई शेयर। तो भला मैं क्यों और किसलिए सिक्का की विदाई पर ‘मातम’ मनाऊं? मैंने तो पिछले दिनों अपनी जेब कट जाने तक पर मातम नहीं मनाया था।

देखो जी, इतना ‘कॉपलेक्स’ होकर जीना अपने बस की बात नहीं। जिंदगी में अपनी मुसीबतें क्या कम हैं, जो इक्का-सिक्का की मुसीबतों को मोल ले खुद को मुसीबतों का गुलाम बना लूं।


इंसान को इतना फिक्रमंद भी नहीं होना चाहिए कि फिक्रमंदी खुद उसके तईं ‘लाइलाज बीमारी’ बन जाए। बाकी सिक्का की सिक्का जानें और इंफोसिस की इंफोसिस।

रविवार, 13 अगस्त 2017

दुनिया मुठ्ठी में

कई साल पहले की बात है। देश की एक आला कंपनी ने देशवासियों को कर लो दुनिया मुठ्ठी में का मंत्र दिया था। मंत्र को हमने न केवल स-हृदय स्वीकारा बल्कि स्वागत भी किया। फिर तो देश के प्रत्येक आमो-खास की मुठ्ठी में एक बे-तार का यंत्र नजर आने लगा। आलम यह था- जिस ओर निगाह दौड़ा दो, उस ओर कर लो दुनिया मुठ्ठी में के इश्तिहारों से दीवारें पटी पड़ी रहती थीं। बे-तार के उस यंत्र पर हम इस कदर ‘मोहित’ थे कि मोहल्ले के नुक्कड़ और गांव-देहात की चौपाल पर उसी की धुनें और चर्चाएं छाई रहती थीं।

सही मायनों में मोबाइल फोन के प्रति हमारे भीषण आकर्षण या कहें दीवानगी की शुरुआत यहीं से हुई थी।

करो लो दुनिया मुठ्ठी में से शुरू हुआ सफर फिलहाल फ्री-हैंडसेट पर आकर टिका है। लेकिन यह अंत नहीं है। अंत हो भी नहीं सकता क्योंकि इंसान की खोपड़ी हर पल कुछ न कुछ नया और अद्भूत इस दिशा में ला रही है। देश में बाकी क्रांतियां का तो नहीं मालूम हां मगर ‘डिजिल-क्रांति’ बहुत तेजी चल रही है। हर घर का तो छोड़िए हर व्यक्ति के हाथ में एक-दो मोबाइल फोन मिल जाना अब सामान्य-सी बात है।

अपने काम-धंधों के बाद लोग कहीं और अगर व्यस्त रहते हैं तो अपने-अपने मोबाइल फोनों में ही। टच-स्क्रीन पर ऊंगलियां हर वक्त कुछ न कुछ या तो खोजती रहती हैं या फिर मैसेजिस लिखती रहती हैं। दीवानगी का आलम यह है कि राह चलते हुए भी लोगों ने अब निगाहें ऊपर कर चलना छोड़ दिया है। फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप हमारी जिंदगी के वो जरूरी हिस्से बन चुके हैं कि अब अपनों को इग्नोर करते जाना हमारी आदत में शामिल हो गया है। हममें से बहुत लोगों को शायद इसका गम न हो। रिश्ते ही तो हैं।

हाल में, नहले पे दहला जियो ने अपने हैंडसैट को आंशिक फ्री कर दीवानगी का एक औ झुनझुना हमें थमा दिया है। मुफ्त डाटा बांटने की होड़ तो चल ही रही थी कंपनियों के बीच अब शायद मुफ्त के हैंडसेट बांटने का अभियान भी चल निकले।

जो हो पर ग्राहक सर से लेकर पैर तक फायदे ही फायदे में है। कभी ऐसा समय भी था जब मात्र ‘हैलो’ कहने के ही दस रुपए झट्ट से कट जाया करते थे। अब वो समय है कि लोग एक-दूसरे से घंटों वीडियो चैट कर लेते हैं वो भी बहुत ही मामूली खर्चे में।

दुनिया जितनी तेजी के साथ डिजिटल हो रही है, उतनी ही तेजी से इंसानों के बीच नजदीकियां बिखर रही हैं। महीनों गुजर जाते हैं हमें एक-दूसरे से मिले या शक्लें देखे हुए। तो क्या...। मुफ्त का हैंडसेट और पर-डे वन जीबी डेटा है न दूरियों को नजदीकियों में बदलने के लिए!

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

निफ्टी, तुम्हें अभी बहुत ऊपर जाना है

मैं सेंसेक्स और निफ्टी दोनों का समान प्रसंशक हूं। यह बात सही है कि मैंने जिस प्रखरता के साथ सेंसेक्स पर लिखा, उतना निफ्टी पर नहीं लिख पाया। निफ्टी पर न लिखने के पीछे किसी प्रकार का किंतु-परंतु नहीं है। पर इससे मेरा निफ्टी के प्रति स्नेह कम नहीं हो जाता। मेरा बचपन से मानना रहा है कि स्टॉक मार्केट में जितना ‘पोटेंशल’ सेंसेक्स का है, निफ्टी का भी कम नहीं।

तमाम बाधाओं को दुलत्ती मार निफ्टी ने जिस वीरता के साथ दस हजार के पहाड़ को पार किया है, वाकई, काबिले-तारीफ है। निफ्टी ने न केवल स्टॉक मार्केट, दलाल स्ट्रीट का मान बढ़ाया है अपितु अपने निवेशकों के दिलों में भी महत्तवपूर्ण जगह बनाई है। वरना, तो अब तलक हर जीत पर सेंसेक्स के ही ‘जयकारे’ लगा करते थे। उसे ही ‘बधाईयां’ दी जाती थीं।

देखा जाए तो स्टॉक मार्केट में सेंसेक्स के मुकाबले निफ्टी का सफर भी इतना आसान नहीं रहा। न जाने कितनी दफा वो सेंसेक्स की भारी-भरकम गिरावटों के बीच दबी-कुचली गई। खूब ध्यान है, आज से कोई 18-19 साल पहले निफ्टी 800-900 के बीच झूलती रहा करती थी। जहां कोई निगेटिव खबर आई नहीं कि निफ्टी सिकुड़कर और छोटी हो जाती थी। हालांकि ऐसी ही चोटें सेंसेक्स ने भी खूब खाईं हैं। पर वजन में वजनदार होने के नाते सेंसेक्स फिर भी झेल जाता था।

बावजूद तमाम दबावों के संघर्ष दोनों करते रहे। संघर्ष का सुफल आज हमारे सामने है।

मेरे लिए निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही न केवल ‘वंदनीय’ बल्कि ‘प्रेरणास्पद’ भी हैं। जीवन में मुझे जब भी प्रेरणा लेने की आवश्यकता महसूस होती है, मैं किसी महा या सिद्धपुरुष से नहीं बल्कि निफ्टी से लेता हूं। निफ्टी ने मुझे एक बहुत ही छोटे लेबल से ठीक-ठाक ऊंचाई पर जाने का मार्ग बताया-दिखाया है।

ध्यान रहे, दस हजार का आंकड़ा निफ्टी के लिए आदि-अंत नहीं है। हालांकि मार्केट में तो चर्चे पंद्रहा से बीस हजार तक जाने के भी हैं। ये तो खैर जितने मुंह उतनी बातें वाला हिसाब-किताब है। मगर सच यही है कि अभी निफ्टी को बहुत ऊपर बहुत ही ऊपर जाना है। देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेशकों के पोर्ट-फोलियों में भी चांद-सितारें लगाने हैं। दुनिया को यह बता देना है कि मुकाबले में निफ्टी भी किसी से कम नहीं।

बहरहाल, उस लेबल तक पहुंचने के लिए निफ्टी को मेरी अग्रिम शुभकामनाएं रहेंगी।

रविवार, 6 अगस्त 2017

यारी-दोस्ती की टशनबाजियां

दोस्तों की किल्लत मुझे बचपन से कभी नहीं रही। लाइफ में एक से बढ़कर एक दोस्त बनाए। जमकर दोस्तबाजियां कीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों की दोस्तियों ने नए मुकाम हासिल किए। मोहल्ले में मैं पतंगबाजी के लिए तो खासा बदनाम था ही, नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ मजमा लगाने के चर्चे भी कम न थे। इस बाबत जाने कितनी दफा मुझे मोहल्ले से बरखास्त किए जाने की चालें चली गईं। मगर मैं न माना। यारबाशियों का दौर यों ही चलता रहा।

मगर हां यारी-दोस्त में इस बात का मैंने खास ख्याल रखा कि कोई भी पढ़ा-लिखा या बुद्धिजीवि टाइप का दोस्त न बने। हालांकि काबिल लौंडों की तरफ से कोशिशें तो बहुत हुईं मुझसे दोस्ती गांठने की किंतु मैंने ही कभी भाव न दिया। वो क्या है, पढ़े-लिखे या काबिल लौंडों से दोस्ती करने के अपने लफड़े हैं। वो या तो हमेशा पढ़ाई-लिखाई की बातें करेंगे या फिर दुनिया-जहान का ज्ञान बांटेंगे। फिल्म, रोमांस, पतंगबाजी, गुल्ली-डंडा, आवारागिर्दी का चेप्टर न उनकी लाइफ में होते हैं न किताबों में। ऐसी महान आत्माओं से मैं दोस्ती के पेच लड़ाना नहीं चाहता, जहां दोस्तीबाजी में मस्तियां- बदमाशियां न हों।

दोस्त ऐसे हों जिनके साथ आप जिंदगी का हर आनंद उठा सकें। जिंदगी के वो पाठ जो आप किताबें पढ़कर न जान पाए, दोस्त लोग हंसते-खेलते सीखा दें। किस्म-किस्म की बदमाशियां दोस्ती की पहली निशानी होती हैं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि जरूरत के वक्त पढ़े-लिखे दोस्तों से कहीं ज्यादा काम बदमाश (बिंदास) टाइप दोस्त आते हैं। पढ़ा-लिखा दोस्त हर मसले में दिमाग पर लोड लेने लगता है। मगर बिंदास दोस्त ‘भाई तू चिंता न कर। जो होगा देखा जाएगा’ कहकर दिली-हौसला बढ़ा देता है।

खूब ध्यान है, स्कूल-कॉलेज में ऐसे कितने ही विकट वाले सीन बने पर बचाया हमेशा बिंदास दोस्तों ने ही। इंटीलेक्चूअल किस्म के दोस्त तो दूर बैठे तमाशा देखते रहे। बाद में जब मिले तो ऊंची-ऊंची नसीहतें और दे गए। नसीहतों से जिंदगी कभी चली है भला। वो तो खुदा का शुक्र रहा कि मैंने कभी पढ़े-लिखे लौंडों की नसीहतों को दिलो-दिमाग पर नहीं लिया। नहीं तो किसी भी सूरत में मैं आज लेखक नहीं बन पाता। मेरे लेखक बनने में मेरे बिगड़ैल टाइप दोस्तों का बहुत बड़ा हाथ है।

न न चौंकिए नहीं। यह हकीकत है। बचपन में- जितना भी बिगड़ैल किस्म का साहित्य मिला उन्हीं दोस्तों की मदद से सब पढ़ डाला। जब ढंग से अक्ल आई भी न थी, तब ही खुशवंत सिंह की चार-पांच किताबें पढ़कर चट्ट कर चुका था। कहने को वो सड़क किनारे बिकने वाला अश्लील या लुगदी किस्म का (काबिल लोगों की नजर में) साहित्य था पर आज भी उन लेखकों की तूती प्रगतिशील या जनवादी लेखकों-साहित्यकारों से कहीं ज्यादा बोलती है। उनसे कहीं अधिक रॉयल्टी पाते हैं। बेस्ट-सेलर हैं। आज भी जमकर पढ़े जाते हैं।

अपना तो शुरू से मानना रहा है कि लेखक बनने के लिए बदमाश और बिंदास टाइप दोस्तों का साथ बेहद जरूरी है। लाइफ का लेसन तो वे ही लोग ढंग से बता पाते हैं। डर को भीतर से बाहर निकाल फेंकने का माआदा रखते हैं।

मगर आजकल की दोस्तियां और दोस्त हमारे बचपन से काफी अलग हैं। अब दोस्तियां ‘जमीनी’ कम ‘डिजिटल’ ज्यादा हैं। दोस्तियां फेसबुक पर गढ़ी जाती हैं। उस बंदे को सम्मान की निगाह से देखा जाता है, जिसकी फ्रेंड-लिस्ट की संख्या चार-पांच हजार के पार निकल चुकी हो। अगला यह कहते फुला नहीं समाता कि आज उसने फेसबुक पर दस-पचास दोस्त बनाए या बीस-पच्चीस को फ्रेंड रिक्यूस्ट भेजी।

डिजिटल दोस्ती का सबसे बड़ा लुत्फ यह है कि आड़े वक्त में ये दोस्तियां पता नहीं किस कुंए में मुंह छिपाए आराम फरमाती रहती हैं। यहां इन-बॉक्स में आकर लंबी-चौड़ी बातें हांकने वाले तो खूब टकराते हैं किंतु साथ में मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पिलाने या गली में गुल्ली-डंडा खेलने वाला कोई नहीं मिलता। आमने-सामने दोस्तों की शक्लें देखे या आवाज सुने ही महीनों-सालों बीत जाते हैं। डिजिटल समय में दोस्त-दोस्तियां औपचारिक-सी होती जा रही हैं।

फिर भी, मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने अब भी वही दोस्त हैं, जिनके साथ बचपन और जवानी किस्म-किस्म की शरारतों और बदमाशियों के साथ गुजरी। मौका मिलता है तो हम आज भी अपने उसी पुराने दौर में लौट जाते हैं। जरा-बहुत सही मन तो ‘बहल’ ही जाता है।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

माफ कीजिएगा, मेरे घर में टमाटर नहीं है

क्या आपके घर में टमाटर है?

यह प्रश्न आजकल मुझे इतना ‘असहज’ किए हुए है कि मैं रातों को सो नहीं पा रहा। निगाहें हर वक्त दरवाजे की देहरे पर टिकी रहती हैं कि कहीं कोई पड़ोसी या रिश्तेदार टमाटर मांगने न आ धमके। आलम यह है कि दफ्तर भी न के बराबर ही जा पा रहा हूं। वहां भी यही डर सताता रहता है कि कोई कुलीग टमाटर की डिमांड न कर दे।

पत्नी को सख्त हिदायत दे रखी है कि मेरी सब्जी में टमाटर का एक छिलका भी नहीं दिखना चाहिए। इस मुद्दे पर कई दफा पत्नी से ‘मुंहजोरी’ हो चुकी है। जो न कहना चाहिए वो सबकुछ वो मेरे बारे में कह चुकी है। इक टमाटर की खातिर वो मुझे दुनिया का सबसे ‘कंजूस पति’ तक मोहल्ले में ‘घोषित’ कर चुकी है। मगर कोई नहीं...। सब मंजूर है। टमाटर की खातिर मैं अपना ‘अपमान’ सहने को ‘स-हर्ष’ तैयार हूं। लेकिन मैंने भी ‘प्रण’ कर रखा है कि चाहे जो हो जाए घर में टमाटर खरीदकर नहीं लाऊंगा तो नहीं ही लाऊंगा।

मानता हूं, टमाटर खाने के तमाम लाभ हैं। टमाटर सलाद की शान है। टमाटर गोरे लाल गालों की खूबसूरत पहचान है। किंतु सिर्फ सेहत की शान की खातिर इतने महंगे टमाटर को खरीदना- मेरी निगाह में- फिजूलखर्ची ही नहीं बल्कि अव्वल दर्जे की मूर्खता है। माफ कीजिएगा, मैं ऐसी मूर्खता करने के पक्ष में कतई नहीं हूं।

यह तो टमाटर की बात रही। ऐसा मैंने तब भी किया था, जब पिछले दिनों दाल और प्याज की बढ़ी कीमतों ने आंखों में पानी ला दिया था। तब भी पत्नी मेरे सिर को आ गई थी। न केवल मोहल्ले बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच कंजूस कहकर मेरी ‘खिल्ली’ उड़ाई गई थी फिर भी मैंने न दाल खरीदी न ही प्याज। हां, काफी दिनों तलक खाना बे-स्वाद टाइप ही रहा। पत्नी ने घर में खाना बनाना न के बराबर कर दिया। मगर मैं न हारा। दाल और प्याज से समानांतर लड़कर मैंने दिखा दिया- महंगाई के आगे समझौता न करने में ही जीत है।

बात बहुत सिंपल-सी है। किंतु हम समझना नहीं चाहते। थोड़े दिनों के लिए अगर हम टमाटर नहीं खाएंगे तो कौन-सा चीन बुरा मान जाएगा? या सब्जीवाला हमें लौकी देने से मना कर देगा? या बॉस दफ्तर से बाहर कर देगा? न जी न। ऐसा कुछ नहीं होगा। दुनिया अपने ठिए पर यों ही चलती रहेगी। चाहे आप टमाटर खाओ या न खाओ। डिसाइड तो हमें करना है कि हमारी जेब टमाटर खाना अलाऊ करती है या लौकी-तुरर्ई।

वैसे, पूरी कोशिश में हूं कि टमाटर की दहशत से खुद को बचाकर रख सकूं। लेकिन फिर भी मुंह के आगे कोई अगर पड़कर मुझसे टमाटर मांग भी लेता है तो मैं दोनों हाथ जोड़कर उससे इतना भर कह देता हूं- माफ कीजिएगा शिरिमानजी, मेरे घर में टमाटर नहीं है।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

बुद्धिजीवि होने के खतरे

मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता जरूर हूं मगर खुद बुद्धिजीवि नहीं हूं। उनसे हमेशा दस-बीस कदम की दूरी रखता हूं। उन्होंने कई दफा कोशिश की कि मैं उनकी बुद्धिजीवि मंडली में शामिल होकर उन जैसा बन जाऊं लेकिन हर दफा मैंने खुद को उनसे बचाया ही लिया। साफ शब्दों में उनसे कह दिया- मुझे बुद्धिजीवि बनने का तो शौक है कोई हसरत। बुद्धिजीवियों जैसी ऐलीट टाइप जिंदगी मैं नहीं जीना चाहता।

हालांकि बुद्धिजीवि होना बड़ा 'साहस' का काम है। मगर साथ ही उसके 'खतरे' भी हैं। साहस और खतरों से मैंने हमेशा बचने की कोशिश की है। बुद्धिजीवि 'शाब्दिक लफ्फबाज़ी' में बेहद सहासी होता है। अपने नेताओं को ही देख लो। मैं देश के प्रत्येक नेता को बुद्धिजीवि मानता हूं! नेताओं की कथनी-करनी में अंतर होने के बावजूद उनमें इतना साहस होता है, जिसके बल पर वो सत्ता में पांच साल तक आराम से टिके रहते हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि नेता नोट और वोट से चुनाव जीतते हैं, मगर मेरा इसपिछड़ी मान्यता’ में कतई विश्वास नहीं। नेता केवलबुद्धि’ के बल पर ही चुनाव जीतते हैं। जनता को रिझाने के लिए किसी नोट या वोट की नहीं सिर्फ बुद्धि की आवश्यकता होती है। किस जरूरी मुद्दे पर जनता को अपनी ओर खींचना है। कैसे उनमें अपने प्रति विश्वास को जीवित रखना है। कैसे उनकी रोटी खाकर उनके झोपड़े में सोना है। इस सब 'त्याग' के लिए बुद्धि की ही जरूरत पड़ती है, नोट की नहीं।

अगर आप बुद्धिजीवि हैं तो वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। आतंकवाद, भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ, खेती-किसानी जैसे मुद्दों पर सेमिनारों में जाकर खुलकर वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजियां करें, कोई आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं, क्योंकि आप बुद्धिजीवि हैं। बुद्धिजीवि बनकर आप कैसे भी वैचारिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि खतरों पर 'सिर्फ चिंता' व्यक्त कर सकते हैं। ध्यान रखें, बुद्धिजीवि कभी सड़कों पर नहीं निकलते। वे ठंडे कमरों में बैठकर ही गर्म योजनाएं बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। 

दूसरी तरफ, हमारे साहित्यकार राजनीतिक बुद्धिजीवियों से दो-चार कदम हमेशा आगे रहते हैं। नेता चाहे जितना बड़ा या छोटा हो पांच साल में एक बार जनता के बीच उसे जाना ही होता है, वोट मांगने। लेकिन साहित्यकार पांच साल तो क्या पचास साल में एक बार भी जनता के बीच जाना पसंद नहीं करता। बात भी सही है, साहित्यकार जनता के बीच क्यों जाए! जनता शायद जानती नहीं कि साहित्यकारों को सामाजिक जनहितैषी मुद्दों को उठाने के लिए किस कदर 'वैचारिक जमा-खर्च' करना पड़ता है। इस काम में बुद्धि तो खर्च होती ही है ! आखिर वे वैचारिक बुद्धिजीवि जो ठहरे। जनता अपनी फिक्र खुद करे। उनकी समस्यों से किसी साहित्यिक बुद्धिजीवि का भला क्या लेना-देना?

इसीलिए मैं हर दम यही गुज़ारिश अपने तमाम पाठकों-मित्रों से करता रहता हूं कि मुझे न 'बुद्धिजीवि' समझें, मानें।


मैं 'साधारण व्यक्ति' के तौर पर ही रहना और मरना चाहता हूं। बुद्धिजीवि बनकर कैसा भी 'पाप' मैं अपने सिर नहीं लेना चाहता। बुद्धिजीवि होना कितना ख़तरनाक है, इसे नेताओं-साहित्यकारों से बेहतर भला कौन जान-समझ सकता है!