रविवार, 13 अगस्त 2017

दुनिया मुठ्ठी में

कई साल पहले की बात है। देश की एक आला कंपनी ने देशवासियों को कर लो दुनिया मुठ्ठी में का मंत्र दिया था। मंत्र को हमने न केवल स-हृदय स्वीकारा बल्कि स्वागत भी किया। फिर तो देश के प्रत्येक आमो-खास की मुठ्ठी में एक बे-तार का यंत्र नजर आने लगा। आलम यह था- जिस ओर निगाह दौड़ा दो, उस ओर कर लो दुनिया मुठ्ठी में के इश्तिहारों से दीवारें पटी पड़ी रहती थीं। बे-तार के उस यंत्र पर हम इस कदर ‘मोहित’ थे कि मोहल्ले के नुक्कड़ और गांव-देहात की चौपाल पर उसी की धुनें और चर्चाएं छाई रहती थीं।

सही मायनों में मोबाइल फोन के प्रति हमारे भीषण आकर्षण या कहें दीवानगी की शुरुआत यहीं से हुई थी।

करो लो दुनिया मुठ्ठी में से शुरू हुआ सफर फिलहाल फ्री-हैंडसेट पर आकर टिका है। लेकिन यह अंत नहीं है। अंत हो भी नहीं सकता क्योंकि इंसान की खोपड़ी हर पल कुछ न कुछ नया और अद्भूत इस दिशा में ला रही है। देश में बाकी क्रांतियां का तो नहीं मालूम हां मगर ‘डिजिल-क्रांति’ बहुत तेजी चल रही है। हर घर का तो छोड़िए हर व्यक्ति के हाथ में एक-दो मोबाइल फोन मिल जाना अब सामान्य-सी बात है।

अपने काम-धंधों के बाद लोग कहीं और अगर व्यस्त रहते हैं तो अपने-अपने मोबाइल फोनों में ही। टच-स्क्रीन पर ऊंगलियां हर वक्त कुछ न कुछ या तो खोजती रहती हैं या फिर मैसेजिस लिखती रहती हैं। दीवानगी का आलम यह है कि राह चलते हुए भी लोगों ने अब निगाहें ऊपर कर चलना छोड़ दिया है। फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप हमारी जिंदगी के वो जरूरी हिस्से बन चुके हैं कि अब अपनों को इग्नोर करते जाना हमारी आदत में शामिल हो गया है। हममें से बहुत लोगों को शायद इसका गम न हो। रिश्ते ही तो हैं।

हाल में, नहले पे दहला जियो ने अपने हैंडसैट को आंशिक फ्री कर दीवानगी का एक औ झुनझुना हमें थमा दिया है। मुफ्त डाटा बांटने की होड़ तो चल ही रही थी कंपनियों के बीच अब शायद मुफ्त के हैंडसेट बांटने का अभियान भी चल निकले।

जो हो पर ग्राहक सर से लेकर पैर तक फायदे ही फायदे में है। कभी ऐसा समय भी था जब मात्र ‘हैलो’ कहने के ही दस रुपए झट्ट से कट जाया करते थे। अब वो समय है कि लोग एक-दूसरे से घंटों वीडियो चैट कर लेते हैं वो भी बहुत ही मामूली खर्चे में।

दुनिया जितनी तेजी के साथ डिजिटल हो रही है, उतनी ही तेजी से इंसानों के बीच नजदीकियां बिखर रही हैं। महीनों गुजर जाते हैं हमें एक-दूसरे से मिले या शक्लें देखे हुए। तो क्या...। मुफ्त का हैंडसेट और पर-डे वन जीबी डेटा है न दूरियों को नजदीकियों में बदलने के लिए!

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

निफ्टी, तुम्हें अभी बहुत ऊपर जाना है

मैं सेंसेक्स और निफ्टी दोनों का समान प्रसंशक हूं। यह बात सही है कि मैंने जिस प्रखरता के साथ सेंसेक्स पर लिखा, उतना निफ्टी पर नहीं लिख पाया। निफ्टी पर न लिखने के पीछे किसी प्रकार का किंतु-परंतु नहीं है। पर इससे मेरा निफ्टी के प्रति स्नेह कम नहीं हो जाता। मेरा बचपन से मानना रहा है कि स्टॉक मार्केट में जितना ‘पोटेंशल’ सेंसेक्स का है, निफ्टी का भी कम नहीं।

तमाम बाधाओं को दुलत्ती मार निफ्टी ने जिस वीरता के साथ दस हजार के पहाड़ को पार किया है, वाकई, काबिले-तारीफ है। निफ्टी ने न केवल स्टॉक मार्केट, दलाल स्ट्रीट का मान बढ़ाया है अपितु अपने निवेशकों के दिलों में भी महत्तवपूर्ण जगह बनाई है। वरना, तो अब तलक हर जीत पर सेंसेक्स के ही ‘जयकारे’ लगा करते थे। उसे ही ‘बधाईयां’ दी जाती थीं।

देखा जाए तो स्टॉक मार्केट में सेंसेक्स के मुकाबले निफ्टी का सफर भी इतना आसान नहीं रहा। न जाने कितनी दफा वो सेंसेक्स की भारी-भरकम गिरावटों के बीच दबी-कुचली गई। खूब ध्यान है, आज से कोई 18-19 साल पहले निफ्टी 800-900 के बीच झूलती रहा करती थी। जहां कोई निगेटिव खबर आई नहीं कि निफ्टी सिकुड़कर और छोटी हो जाती थी। हालांकि ऐसी ही चोटें सेंसेक्स ने भी खूब खाईं हैं। पर वजन में वजनदार होने के नाते सेंसेक्स फिर भी झेल जाता था।

बावजूद तमाम दबावों के संघर्ष दोनों करते रहे। संघर्ष का सुफल आज हमारे सामने है।

मेरे लिए निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही न केवल ‘वंदनीय’ बल्कि ‘प्रेरणास्पद’ भी हैं। जीवन में मुझे जब भी प्रेरणा लेने की आवश्यकता महसूस होती है, मैं किसी महा या सिद्धपुरुष से नहीं बल्कि निफ्टी से लेता हूं। निफ्टी ने मुझे एक बहुत ही छोटे लेबल से ठीक-ठाक ऊंचाई पर जाने का मार्ग बताया-दिखाया है।

ध्यान रहे, दस हजार का आंकड़ा निफ्टी के लिए आदि-अंत नहीं है। हालांकि मार्केट में तो चर्चे पंद्रहा से बीस हजार तक जाने के भी हैं। ये तो खैर जितने मुंह उतनी बातें वाला हिसाब-किताब है। मगर सच यही है कि अभी निफ्टी को बहुत ऊपर बहुत ही ऊपर जाना है। देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेशकों के पोर्ट-फोलियों में भी चांद-सितारें लगाने हैं। दुनिया को यह बता देना है कि मुकाबले में निफ्टी भी किसी से कम नहीं।

बहरहाल, उस लेबल तक पहुंचने के लिए निफ्टी को मेरी अग्रिम शुभकामनाएं रहेंगी।

रविवार, 6 अगस्त 2017

यारी-दोस्ती की टशनबाजियां

दोस्तों की किल्लत मुझे बचपन से कभी नहीं रही। लाइफ में एक से बढ़कर एक दोस्त बनाए। जमकर दोस्तबाजियां कीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों की दोस्तियों ने नए मुकाम हासिल किए। मोहल्ले में मैं पतंगबाजी के लिए तो खासा बदनाम था ही, नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ मजमा लगाने के चर्चे भी कम न थे। इस बाबत जाने कितनी दफा मुझे मोहल्ले से बरखास्त किए जाने की चालें चली गईं। मगर मैं न माना। यारबाशियों का दौर यों ही चलता रहा।

मगर हां यारी-दोस्त में इस बात का मैंने खास ख्याल रखा कि कोई भी पढ़ा-लिखा या बुद्धिजीवि टाइप का दोस्त न बने। हालांकि काबिल लौंडों की तरफ से कोशिशें तो बहुत हुईं मुझसे दोस्ती गांठने की किंतु मैंने ही कभी भाव न दिया। वो क्या है, पढ़े-लिखे या काबिल लौंडों से दोस्ती करने के अपने लफड़े हैं। वो या तो हमेशा पढ़ाई-लिखाई की बातें करेंगे या फिर दुनिया-जहान का ज्ञान बांटेंगे। फिल्म, रोमांस, पतंगबाजी, गुल्ली-डंडा, आवारागिर्दी का चेप्टर न उनकी लाइफ में होते हैं न किताबों में। ऐसी महान आत्माओं से मैं दोस्ती के पेच लड़ाना नहीं चाहता, जहां दोस्तीबाजी में मस्तियां- बदमाशियां न हों।

दोस्त ऐसे हों जिनके साथ आप जिंदगी का हर आनंद उठा सकें। जिंदगी के वो पाठ जो आप किताबें पढ़कर न जान पाए, दोस्त लोग हंसते-खेलते सीखा दें। किस्म-किस्म की बदमाशियां दोस्ती की पहली निशानी होती हैं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि जरूरत के वक्त पढ़े-लिखे दोस्तों से कहीं ज्यादा काम बदमाश (बिंदास) टाइप दोस्त आते हैं। पढ़ा-लिखा दोस्त हर मसले में दिमाग पर लोड लेने लगता है। मगर बिंदास दोस्त ‘भाई तू चिंता न कर। जो होगा देखा जाएगा’ कहकर दिली-हौसला बढ़ा देता है।

खूब ध्यान है, स्कूल-कॉलेज में ऐसे कितने ही विकट वाले सीन बने पर बचाया हमेशा बिंदास दोस्तों ने ही। इंटीलेक्चूअल किस्म के दोस्त तो दूर बैठे तमाशा देखते रहे। बाद में जब मिले तो ऊंची-ऊंची नसीहतें और दे गए। नसीहतों से जिंदगी कभी चली है भला। वो तो खुदा का शुक्र रहा कि मैंने कभी पढ़े-लिखे लौंडों की नसीहतों को दिलो-दिमाग पर नहीं लिया। नहीं तो किसी भी सूरत में मैं आज लेखक नहीं बन पाता। मेरे लेखक बनने में मेरे बिगड़ैल टाइप दोस्तों का बहुत बड़ा हाथ है।

न न चौंकिए नहीं। यह हकीकत है। बचपन में- जितना भी बिगड़ैल किस्म का साहित्य मिला उन्हीं दोस्तों की मदद से सब पढ़ डाला। जब ढंग से अक्ल आई भी न थी, तब ही खुशवंत सिंह की चार-पांच किताबें पढ़कर चट्ट कर चुका था। कहने को वो सड़क किनारे बिकने वाला अश्लील या लुगदी किस्म का (काबिल लोगों की नजर में) साहित्य था पर आज भी उन लेखकों की तूती प्रगतिशील या जनवादी लेखकों-साहित्यकारों से कहीं ज्यादा बोलती है। उनसे कहीं अधिक रॉयल्टी पाते हैं। बेस्ट-सेलर हैं। आज भी जमकर पढ़े जाते हैं।

अपना तो शुरू से मानना रहा है कि लेखक बनने के लिए बदमाश और बिंदास टाइप दोस्तों का साथ बेहद जरूरी है। लाइफ का लेसन तो वे ही लोग ढंग से बता पाते हैं। डर को भीतर से बाहर निकाल फेंकने का माआदा रखते हैं।

मगर आजकल की दोस्तियां और दोस्त हमारे बचपन से काफी अलग हैं। अब दोस्तियां ‘जमीनी’ कम ‘डिजिटल’ ज्यादा हैं। दोस्तियां फेसबुक पर गढ़ी जाती हैं। उस बंदे को सम्मान की निगाह से देखा जाता है, जिसकी फ्रेंड-लिस्ट की संख्या चार-पांच हजार के पार निकल चुकी हो। अगला यह कहते फुला नहीं समाता कि आज उसने फेसबुक पर दस-पचास दोस्त बनाए या बीस-पच्चीस को फ्रेंड रिक्यूस्ट भेजी।

डिजिटल दोस्ती का सबसे बड़ा लुत्फ यह है कि आड़े वक्त में ये दोस्तियां पता नहीं किस कुंए में मुंह छिपाए आराम फरमाती रहती हैं। यहां इन-बॉक्स में आकर लंबी-चौड़ी बातें हांकने वाले तो खूब टकराते हैं किंतु साथ में मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पिलाने या गली में गुल्ली-डंडा खेलने वाला कोई नहीं मिलता। आमने-सामने दोस्तों की शक्लें देखे या आवाज सुने ही महीनों-सालों बीत जाते हैं। डिजिटल समय में दोस्त-दोस्तियां औपचारिक-सी होती जा रही हैं।

फिर भी, मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने अब भी वही दोस्त हैं, जिनके साथ बचपन और जवानी किस्म-किस्म की शरारतों और बदमाशियों के साथ गुजरी। मौका मिलता है तो हम आज भी अपने उसी पुराने दौर में लौट जाते हैं। जरा-बहुत सही मन तो ‘बहल’ ही जाता है।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

माफ कीजिएगा, मेरे घर में टमाटर नहीं है

क्या आपके घर में टमाटर है?

यह प्रश्न आजकल मुझे इतना ‘असहज’ किए हुए है कि मैं रातों को सो नहीं पा रहा। निगाहें हर वक्त दरवाजे की देहरे पर टिकी रहती हैं कि कहीं कोई पड़ोसी या रिश्तेदार टमाटर मांगने न आ धमके। आलम यह है कि दफ्तर भी न के बराबर ही जा पा रहा हूं। वहां भी यही डर सताता रहता है कि कोई कुलीग टमाटर की डिमांड न कर दे।

पत्नी को सख्त हिदायत दे रखी है कि मेरी सब्जी में टमाटर का एक छिलका भी नहीं दिखना चाहिए। इस मुद्दे पर कई दफा पत्नी से ‘मुंहजोरी’ हो चुकी है। जो न कहना चाहिए वो सबकुछ वो मेरे बारे में कह चुकी है। इक टमाटर की खातिर वो मुझे दुनिया का सबसे ‘कंजूस पति’ तक मोहल्ले में ‘घोषित’ कर चुकी है। मगर कोई नहीं...। सब मंजूर है। टमाटर की खातिर मैं अपना ‘अपमान’ सहने को ‘स-हर्ष’ तैयार हूं। लेकिन मैंने भी ‘प्रण’ कर रखा है कि चाहे जो हो जाए घर में टमाटर खरीदकर नहीं लाऊंगा तो नहीं ही लाऊंगा।

मानता हूं, टमाटर खाने के तमाम लाभ हैं। टमाटर सलाद की शान है। टमाटर गोरे लाल गालों की खूबसूरत पहचान है। किंतु सिर्फ सेहत की शान की खातिर इतने महंगे टमाटर को खरीदना- मेरी निगाह में- फिजूलखर्ची ही नहीं बल्कि अव्वल दर्जे की मूर्खता है। माफ कीजिएगा, मैं ऐसी मूर्खता करने के पक्ष में कतई नहीं हूं।

यह तो टमाटर की बात रही। ऐसा मैंने तब भी किया था, जब पिछले दिनों दाल और प्याज की बढ़ी कीमतों ने आंखों में पानी ला दिया था। तब भी पत्नी मेरे सिर को आ गई थी। न केवल मोहल्ले बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच कंजूस कहकर मेरी ‘खिल्ली’ उड़ाई गई थी फिर भी मैंने न दाल खरीदी न ही प्याज। हां, काफी दिनों तलक खाना बे-स्वाद टाइप ही रहा। पत्नी ने घर में खाना बनाना न के बराबर कर दिया। मगर मैं न हारा। दाल और प्याज से समानांतर लड़कर मैंने दिखा दिया- महंगाई के आगे समझौता न करने में ही जीत है।

बात बहुत सिंपल-सी है। किंतु हम समझना नहीं चाहते। थोड़े दिनों के लिए अगर हम टमाटर नहीं खाएंगे तो कौन-सा चीन बुरा मान जाएगा? या सब्जीवाला हमें लौकी देने से मना कर देगा? या बॉस दफ्तर से बाहर कर देगा? न जी न। ऐसा कुछ नहीं होगा। दुनिया अपने ठिए पर यों ही चलती रहेगी। चाहे आप टमाटर खाओ या न खाओ। डिसाइड तो हमें करना है कि हमारी जेब टमाटर खाना अलाऊ करती है या लौकी-तुरर्ई।

वैसे, पूरी कोशिश में हूं कि टमाटर की दहशत से खुद को बचाकर रख सकूं। लेकिन फिर भी मुंह के आगे कोई अगर पड़कर मुझसे टमाटर मांग भी लेता है तो मैं दोनों हाथ जोड़कर उससे इतना भर कह देता हूं- माफ कीजिएगा शिरिमानजी, मेरे घर में टमाटर नहीं है।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

बुद्धिजीवि होने के खतरे

मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता जरूर हूं मगर खुद बुद्धिजीवि नहीं हूं। उनसे हमेशा दस-बीस कदम की दूरी रखता हूं। उन्होंने कई दफा कोशिश की कि मैं उनकी बुद्धिजीवि मंडली में शामिल होकर उन जैसा बन जाऊं लेकिन हर दफा मैंने खुद को उनसे बचाया ही लिया। साफ शब्दों में उनसे कह दिया- मुझे बुद्धिजीवि बनने का तो शौक है कोई हसरत। बुद्धिजीवियों जैसी ऐलीट टाइप जिंदगी मैं नहीं जीना चाहता।

हालांकि बुद्धिजीवि होना बड़ा 'साहस' का काम है। मगर साथ ही उसके 'खतरे' भी हैं। साहस और खतरों से मैंने हमेशा बचने की कोशिश की है। बुद्धिजीवि 'शाब्दिक लफ्फबाज़ी' में बेहद सहासी होता है। अपने नेताओं को ही देख लो। मैं देश के प्रत्येक नेता को बुद्धिजीवि मानता हूं! नेताओं की कथनी-करनी में अंतर होने के बावजूद उनमें इतना साहस होता है, जिसके बल पर वो सत्ता में पांच साल तक आराम से टिके रहते हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि नेता नोट और वोट से चुनाव जीतते हैं, मगर मेरा इसपिछड़ी मान्यता’ में कतई विश्वास नहीं। नेता केवलबुद्धि’ के बल पर ही चुनाव जीतते हैं। जनता को रिझाने के लिए किसी नोट या वोट की नहीं सिर्फ बुद्धि की आवश्यकता होती है। किस जरूरी मुद्दे पर जनता को अपनी ओर खींचना है। कैसे उनमें अपने प्रति विश्वास को जीवित रखना है। कैसे उनकी रोटी खाकर उनके झोपड़े में सोना है। इस सब 'त्याग' के लिए बुद्धि की ही जरूरत पड़ती है, नोट की नहीं।

अगर आप बुद्धिजीवि हैं तो वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। आतंकवाद, भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ, खेती-किसानी जैसे मुद्दों पर सेमिनारों में जाकर खुलकर वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजियां करें, कोई आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं, क्योंकि आप बुद्धिजीवि हैं। बुद्धिजीवि बनकर आप कैसे भी वैचारिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि खतरों पर 'सिर्फ चिंता' व्यक्त कर सकते हैं। ध्यान रखें, बुद्धिजीवि कभी सड़कों पर नहीं निकलते। वे ठंडे कमरों में बैठकर ही गर्म योजनाएं बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। 

दूसरी तरफ, हमारे साहित्यकार राजनीतिक बुद्धिजीवियों से दो-चार कदम हमेशा आगे रहते हैं। नेता चाहे जितना बड़ा या छोटा हो पांच साल में एक बार जनता के बीच उसे जाना ही होता है, वोट मांगने। लेकिन साहित्यकार पांच साल तो क्या पचास साल में एक बार भी जनता के बीच जाना पसंद नहीं करता। बात भी सही है, साहित्यकार जनता के बीच क्यों जाए! जनता शायद जानती नहीं कि साहित्यकारों को सामाजिक जनहितैषी मुद्दों को उठाने के लिए किस कदर 'वैचारिक जमा-खर्च' करना पड़ता है। इस काम में बुद्धि तो खर्च होती ही है ! आखिर वे वैचारिक बुद्धिजीवि जो ठहरे। जनता अपनी फिक्र खुद करे। उनकी समस्यों से किसी साहित्यिक बुद्धिजीवि का भला क्या लेना-देना?

इसीलिए मैं हर दम यही गुज़ारिश अपने तमाम पाठकों-मित्रों से करता रहता हूं कि मुझे न 'बुद्धिजीवि' समझें, मानें।


मैं 'साधारण व्यक्ति' के तौर पर ही रहना और मरना चाहता हूं। बुद्धिजीवि बनकर कैसा भी 'पाप' मैं अपने सिर नहीं लेना चाहता। बुद्धिजीवि होना कितना ख़तरनाक है, इसे नेताओं-साहित्यकारों से बेहतर भला कौन जान-समझ सकता है!